हरिद्वार(सुनील कोठारी)। विश्व प्रसिद्ध और करोड़ों सनातन धर्मावलंबियों की अगाध श्रद्धा के सर्वोच्च केंद्र हरिद्वार स्थित हर की पौड़ी ब्रह्मकुंड से वर्तमान समय में एक ऐसी विचलित करने वाली जमीनी हकीकत सामने आ रही है, जिसने समूचे देश के संतों, विचारकों और आम श्रद्धालुओं को गहरे आत्ममंथन और चिंता में डाल दिया है। मोक्षदायिनी पतित पावनी मां गंगा का यह वही परम पावन दिव्य द्वार है, जहां कदम रखते ही इंसान सांसारिक बंधनों को भूलकर खुद को पूरी तरह ईश्वर के चरणों में समर्पित कर देता है और जहां की अलौकिक आबोहवा में गूंजने वाले वैदिक मंत्रोच्चार, पौराणिक संकल्प और दिव्य गंगा आरती के स्वर अशांत मन को असीम आत्मिक शांति प्रदान करते हैं। परंतु, अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण विषय यह है कि आज इसी परम पवित्र और मोक्ष प्रदाता ब्रह्मकुंड की सनातन मर्यादा, आध्यात्मिक गरिमा और पौराणिक शुचिता पर बहुत बड़े और तीखे सवालिया निशान खड़े होने लगे हैं, क्योंकि इस पावन परिक्षेत्र में अब श्रद्धा का स्थान धीरे-धीरे व्यावसायिक होड़ ने लेना शुरू कर दिया है। स्वतंत्र पत्रकार रामेश्वर गौड़ की पैनी नजरों और प्रखर कलम से सामने आई यह खोजी रिपोर्ट साफ बयां करती है कि जिस पावन स्थली पर चौबीसों घंटे केवल और केवल ईश्वर आराधना और वेदों की ऋचाएं गूंजनी चाहिए थीं, वहां अब चारों तरफ फूलों के दोने बेचने की तीखी आवाजें, मोलभाव की तकरार और दिनभर की कमाई का व्यावसायिक हिसाब-किताब खुलेआम लगाया जा रहा है।
धार्मिक नगरी की इस बिगड़ती सूरत पर जब गहराई से दृष्टि डाली जाती है, तो व्यवस्थाओं को संभालने वाले तंत्र की कथनी और करनी में एक बहुत बड़ा और साफ विरोधाभास उजागर होकर सामने आता है, जो बेहद हैरान करने वाला है। हर की पौड़ी क्षेत्र की संपूर्ण आंतरिक और बाह्य व्यवस्थाओं की देखरेख करने वाली शीर्ष संस्था ‘श्री गंगा सभा’ द्वारा प्रतिदिन लाउडस्पीकरों के माध्यम से समूचे घाट परिसर में बेहद ऊंची आवाज में यह लगातार प्रचार-प्रसार और मुनादी की जाती है कि सभी आने वाले यात्री और श्रद्धालु मां गंगा की पावन पवित्रता, स्वच्छता और निर्मलता को अक्षुण्ण बनाए रखने में अपना सहयोग प्रदान करें और किसी भी प्रकार की गंदगी या वर्जित सामग्री को मोक्षदायिनी नदी में विसर्जित न करें। लेकिन, जमीनी स्तर पर इसके ठीक उलट और बेहद शर्मनाक तस्वीर देखने को मिलती है, जिसे देखकर कोई भी सच्चा सनातनी आहत हुए बिना नहीं रह सकता। ऐसे में बुद्धिजीवियों द्वारा प्रशासन से यह कड़ा सवाल पूछा जा रहा है कि क्या मर्यादा, आचरण और शुचिता का पाठ केवल दूर-दूर से आने वाले अबोध और अनजान श्रद्धालुओं को ही पढ़ाया जा रहा है, और क्या ये कड़े नियम, प्रतिबंध और धार्मिक मर्यादाएं उन पूजनीय मंदिरों के भीतर बैठे लोगों पर लागू नहीं होतीं, जो आस्था की आड़ में इस पवित्रतम क्षेत्र को बाजार में तब्दील करने पर आमादा हैं?
हर की पौड़ी ब्रह्मकुंड के पौराणिक मंदिरों के भीतर का परिदृश्य तो आज इतना अधिक बदल चुका है कि वहां की प्राचीन सात्विक शांति अब पूरी तरह से गायब हो चुकी है और उसकी जगह विशुद्ध रूप से एक हॉट कमर्शियल मार्केट ने ले ली है। इन मुख्य मंदिरों के गर्भगृह और प्रांगण में बैठने वाले कई कथित पुजारियों और पुरोहितों का पूरा ध्यान अब मुख्य पूजा-पाठ, यजमानों के कल्याण के लिए किए जाने वाले शुद्ध संकल्पों और वैदिक मंत्रोच्चार से पूरी तरह भटक चुका है और उनका शत-प्रतिशत ध्यान केवल और केवल फूलों के दोने और पूजा सामग्री की अधिकाधिक बिक्री करने की व्यावसायिक कला पर केंद्रित हो गया है। प्राचीन समय में जहां श्रद्धालुओं के कानों में प्रवेश करते ही आत्मा को तृप्त करने वाली मंत्रों की पावन ध्वनि सुनाई देती थी, वहां आज हर पल बेहद आक्रामक अंदाज में ‘₹21 का दोना ले लो’, ‘₹51 का विशेष प्रसाद ले लो’ और ‘₹101 की वीआईपी पूजा करवा लो’ जैसी बाजारू आवाजें लगातार कानों में गूंजती रहती हैं, जो किसी धार्मिक तीर्थ की नहीं बल्कि किसी सब्जी मंडी की याद दिलाती हैं। स्थिति इतनी भयावह है कि जैसे ही एक श्रद्धालु को महंगे दामों पर दोना थमाया जाता है, तुरंत कौतूहल के साथ दूसरा दोना सजाने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है और भगवान के विग्रह के ठीक सामने ही प्रतिबंधित प्लास्टिक की थैलियों और फूलों का विशाल ढेर किसी कूड़े के समान लगा दिया जाता है, जो यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या अब हमारी महान आस्था भी पूरी तरह से चंद रुपयों के लालच और व्यापार की भेंट चढ़ चुकी है?

इस पूरे घिनौने खेल का सबसे स्याह पहलू यह है कि यह सब कुछ देश की सर्वोच्च कानूनी और पर्यावरणीय संस्थाओं के कड़े आदेशों की खुलेआम धज्जियां उड़ाते हुए धड़ल्ले से अंजाम दिया जा रहा है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने मां गंगा के अस्तित्व और उसकी पारिस्थितिकी को बचाने के लिए बेहद कड़े शब्दों में यह स्पष्ट आदेश जारी कर रखा है कि नदी के मुख्य प्रवाह में किसी भी प्रकार के फूल, पत्तियां, प्लास्टिक या अन्य कोई भी पूजा सामग्री डालना पूर्ण रूप से प्रतिबंधित और दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है। इसके बावजूद, जमीनी हकीकत यह है कि हर की पौड़ी पर चौबीसों घंटे बिना किसी डर के भारी मात्रा में टनों फूल और रासायनिक रंगों से युक्त सामग्रियां सीधे मां गंगा के सीने पर प्रवाहित की जा रही हैं, जिससे नदी का पानी प्रदूषित हो रहा है। अब जनता यह तीखा सवाल पूछ रही है कि जब देश की सर्वोच्च पर्यावरण अदालत का इतना सख्त प्रतिबंध लागू है, तो फिर आखिर किसकी शह पर, किस प्रशासनिक अधिकारी की मौन अनुमति से और किसके वरदहस्त के कारण रोज सुबह से लेकर रात तक यह विनाशकारी सिलसिला जारी है? और जब स्वयं पवित्र मंदिरों के भीतर से ही इन फूलों के दोनों को खुलेआम बेचा जा रहा हो, तो भला कोई भी बाहरी तंत्र या सफाई अभियान मां गंगा की नैसर्गिक स्वच्छता और निर्मलता को कैसे बचा पाएगा?
अगर हम स्थानीय नगर निगम के नियमों और कानूनों के दस्तावेज को पलटकर देखें, तो इस पूरे क्षेत्र में चल रही व्यावसायिक गतिविधियां पूरी तरह से गैर-कानूनी और वैधानिक रूप से पूरी तरह अवैध साबित होती हैं। नगर निगम एक्ट के साफ और स्पष्ट नियमों के मुताबिक, हर की पौड़ी के पूरे घाट परिक्षेत्र और उसके आसपास के संवेदनशील क्षेत्रों में किसी भी प्रकार की व्यावसायिक दुकानदारी, क्रय-विक्रय अथवा किसी भी वस्तु का लेन-देन करना कानूनी तौर पर पूरी तरह से वर्जित और प्रतिबंधित माना गया है। परंतु, इस कड़े कानून के वजूद में होने के बावजूद, यदि कोई व्यक्ति ब्रह्मकुंड का चक्कर लगाए तो उसे चारों तरफ नियमों का मखौल उड़ता साफ दिखाई दे जाएगा, जहां हर कोने में महंगे फूलों के दोने बेचे जा रहे हैं, सरेआम प्रसाद का बड़ा व्यापार संचालित हो रहा है, पर्यावरण को नष्ट करने वाली खतरनाक पॉलिथीन का बेधड़क इस्तेमाल किया जा रहा है और मंदिरों के ठीक भीतर तक आलीशान और पक्की दुकानें सजाकर खुली दुकानदारी चलाई जा रही है। इस अराजकता को देखकर यह सवाल उठना बेहद लाजिमी हो जाता है कि क्या इस देश के कड़े नियम, जुर्माने और कानून केवल उन सीधे-साधे और गरीब आम श्रद्धालुओं की जेबें ढीली करने के लिए ही बनाए गए हैं जो दूर-दराज से यहां आते हैं, और रसूखदार व्यापारियों के लिए प्रशासन ने अपनी आंखें पूरी तरह से बंद कर ली हैं?

इस पूरे गंभीर और संवेदनशील मामले में सबसे ज्यादा निराशाजनक और संदेहास्पद भूमिका उस संस्था की दिखाई दे रही है, जिसे समाज ने सबसे ऊंचा दर्जा देकर इस पावन क्षेत्र की रक्षा का दायित्व सौंपा था। ‘श्री गंगा सभा’ जैसी प्रतिष्ठित और प्राचीन संस्था, जिसके कंधों पर हर की पौड़ी की एक-एक व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने, उसकी मर्यादा को अक्षुण्ण रखने और उसकी सनातन पवित्रता को आंच न आने देने की अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक जिम्मेदारी है, वह इस पूरे अवैध व्यापारिक साम्राज्य को अपनी आंखों के सामने फलते-फूलते देखकर भी पूरी तरह से मौन साधे हुए बैठी है। यदि मंदिरों के भीतर और घाटों पर हो रही यह खुली दुकानदारी, प्लास्टिक का उपयोग और गंगा का प्रदूषण पूरी तरह से गलत और नियमों के विरुद्ध है, तो आखिर इस संस्था के पदाधिकारियों द्वारा आज तक इसका पुरजोर विरोध क्यों नहीं किया गया और दोषियों के खिलाफ कोई ठोस दंडात्मक कार्रवाई क्यों नहीं अमल में लाई गई? यही कारण है कि अब देश के कौने-कौने से आने वाले प्रबुद्ध श्रद्धालुओं और स्थानीय निवासियों के बीच यह गंभीर चर्चा बेहद तेज हो गई है कि क्या इस पूरे अवैध और अपवित्र व्यापार के पीछे व्यवस्थापकों और कुछ जिम्मेदार रसूखदार लोगों का गुप्त मौन समर्थन और आपसी साठगांठ काम कर रही है, जिसके कारण नियम केवल कागजों तक ही सीमित रह गए हैं?
हरिद्वार की इस पावन भूमि पर हर शाम का नजारा तो इतना अधिक विरोधाभासी होता है कि वह किसी भी संवेदनशील इंसान के दिल को झकझोर कर रख दे, क्योंकि यहां धर्म के नाम पर केवल दिखावे का पाखंड ज्यादा नजर आने लगा है। प्रत्येक शाम जब वैश्विक स्तर पर प्रसिद्ध दिव्य गंगा आरती का भव्य आयोजन होता है, तब वहां मौजूद हजारों-लाखों श्रद्धालुओं से लाउडस्पीकर के जरिए दोनों हाथ ऊपर उठवाकर मां गंगा को स्वच्छ, निर्मल, अविरल और प्रदूषण मुक्त बनाए रखने की अत्यंत भावुक और गंभीर शपथ दिलाई जाती है। परंतु, विडंबना की पराकाष्ठा देखिए कि जिस पवित्र स्थल पर खड़े होकर यह पवित्र कसम खाई और दिलाई जा रही होती है, ठीक उसी के समानांतर और उसी समय पर चारों तरफ प्लास्टिक का तांडव, फूलों का अवैध व्यापार, प्रसाद की जबरन बिक्री और दोना संस्कृति का काला कारोबार पूरी सहजता के साथ धड़ल्ले से जारी रहता है। यह दृश्य देखकर मन में यह तीखा विचार कौंधता है कि क्या मंदिरों के ऊंचे आसनों पर बैठे ये पुजारी और पुरोहित इस पावन शपथ के शब्दों को अपने कानों से नहीं सुनते, या फिर उनके लिए इन शब्दों का कोई मोल नहीं है? ऐसा प्रतीत होता है कि यह पवित्र शपथ केवल और केवल आम जनता को रिझाने और कैमरों के सामने ढोंग रचने के लिए है, जबकि परदे के पीछे केवल और केवल धन का लालच काम कर रहा है।
अंततः, यह पूरा विषय अब सीधे तौर पर सनातन धर्म की शुद्ध आस्था बनाम इंसानी लालच के बीच छिड़े एक बहुत बड़े और खतरनाक महायुद्ध का रूप धारण कर चुका है, जिसमें फिलहाल आस्था हारती हुई दिखाई दे रही है। हम सभी को यह भली-भांति समझना होगा कि हर की पौड़ी का यह पावन ब्रह्मकुंड केवल नदी का कोई साधारण पक्का घाट या मनोरंजन के लिए बनाया गया कोई पर्यटन स्थल नहीं है, बल्कि यह इस धरा पर निवास करने वाले करोड़ों-करोड़ सनातनी हिंदुओं की अटूट आस्था, अगाध विश्वास, उनके पूर्वजों के पिंडदान और जीवन के अंतिम मोक्ष का सर्वोच्च और अत्यंत संवेदनशील केंद्र है। लेकिन, जब हमारे इन परम पूजनीय और परम पवित्र पूजा स्थलों पर ही विशुद्ध रूप से व्यापार और धन कमाने की भूख पूरी तरह से हावी होने लगे, जब भगवान के गर्भगृह के भीतर विग्रहों के सामने श्रद्धा के आंसुओं के बजाय फूलों की पॉलिथीन और रुपयों-पैसों का नफा-नुकसान और हिसाब-किताब ज्यादा दिखाई देने लगे, तो समाज में यह सवाल उठना बेहद स्वाभाविक और लाजिमी हो जाता है कि क्या हमारी सदियों पुरानी महान आध्यात्मिक आस्था धीरे-धीरे पूरी तरह से एक संगठित और क्रूर व्यापार में तब्दील होती जा रही है? स्वतंत्र पत्रकार रामेश्वर गौड़ की कलम से निकला यह अंतिम निष्कर्ष समूचे तंत्र के मुंह पर एक बहुत बड़ा तमाचा है कि जब ब्रह्मकुंड जैसे मोक्ष प्रदाता स्थल में ईश्वर के दिव्य मंत्रों से अधिक व्यापार और सिक्कों की खनक गूंजने लगे, तब यह साफ समझ लेना चाहिए कि अब केवल गंगा का पानी ही मैला नहीं हो रहा है, बल्कि इंसानों की अंतरात्मा और उनकी पावन आस्था भी पूरी तरह से प्रदूषित और भ्रष्ट हो चुकी है, जिसे समय रहते बचाना बेहद जरूरी है।





