काशीपुर। उत्तराखंड के मैदानी छोर पर बसे काशीपुर की शांत धरती के भीतर हजारों सालों से दफन एक विशाल गौरवशाली सभ्यता अब पूरी तरह दुनिया के सामने आने को बेताब है, क्योंकि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (ASI) ने इसके कायाकल्प की एक बेहद महत्वाकांक्षी और देश की सबसे बड़ी पुरातात्विक योजनाओं में से एक का खाका पूरी तरह तैयार कर लिया है। लगभग 90 एकड़ के विशाल भूभाग में फैले इस ऐतिहासिक वैभव को वैज्ञानिक खुदाई और गहन सर्वेक्षणों के दौर से गुजारने के बाद अब केंद्र सरकार और पुरातत्व विभाग के आला अधिकारी इसे वैश्विक स्तर के अनुसंधान और एक बड़े पर्यटन केंद्र के रूप में तब्दील करने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रहे हैं। इस अति प्राचीन और चमत्कारी स्थल को लेकर जो रहस्य और तथ्य उजागर हुए हैं, वे न केवल देश के इतिहासकारों को हतप्रभ कर रहे हैं बल्कि आम जनमानस को भी रोमांच से भर रहे हैं, जिसके कारण इस पूरे परिक्षेत्र को लेकर एक नया और बेहद आकर्षक अध्याय शुरू होने जा रहा है जो आने वाले समय में उत्तराखंड को धार्मिक और प्राकृतिक पर्यटन के दायरे से बाहर निकालकर दुनिया के नक्शे पर एक महान ऐतिहासिक धरोहर के रूप में स्थापित कर देगा।
स्थानीय समाज और पीढ़ियों से चली आ रही मान्यताओं में काशीपुर के इस रहस्यमयी और अलौकिक जलाशय को लेकर द्वापर युग की बेहद दिलचस्प कथाएं बहुत गहराई से जुड़ी हुई हैं, जिसके अनुसार महाभारत काल के दौरान जब पांडव यहां अज्ञातवास और शिक्षा के दौरान रह रहे थे तब उन्होंने अपने परम पूजनीय अस्त्र-शस्त्र गुरु द्रोणाचार्य की पावन स्मृति को हमेशा के लिए जीवंत बनाए रखने के लिए अपने बाहुबल से एक बेहद विशाल और अलौकिक कुंड का निर्माण किया था। सदियों तक इस पूरे इलाके के लोग इसे महज आस्था, पूजा-पाठ और धार्मिक महत्व का केंद्र मानकर श्रद्धा से शीश झुकाते रहे, लेकिन जैसे ही आधुनिक काल में वैज्ञानिकों और पुरातत्वविदों ने अत्याधुनिक उपकरणों के साथ इस जमीन की परतों को खंगालना और वैज्ञानिक उत्खनन करना प्रारंभ किया, वैसे ही इस पवित्र धरती के अंतर्गर्भ से एक बेहद विशाल, बहुस्तरीय और चौंकाने वाला प्रागैतिहासिक साम्राज्य निकलकर बाहर आ गया। यही वजह है कि आज इस पूरे अद्भुत परिक्षेत्र को बेहद सम्मान और वैज्ञानिक भाषा में “गौविषाण टीला द्रोणासागर” के नाम से पुकारा जाता है, जिसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने राष्ट्रीय महत्व की एक बेहद संवेदनशील और अनमोल संरक्षित साइट घोषित कर इसकी सुरक्षा का जिम्मा पूरी तरह अपने हाथों में ले लिया है।

इस रहस्यमयी टीले और विशाल जलाशय के ऐतिहासिक महत्व की जड़ें कितनी गहरी हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देहरादून सर्कल के अधीक्षण पुरातत्वविद् मोहन जोशी ने इसके प्राचीन दस्तावेजों को खंगालते हुए बेहद सनसनीखेज खुलासे किए हैं, जिनके मुताबिक छठी शताब्दी के दौरान भारत की आध्यात्मिक यात्रा पर आए दुनिया के सबसे मशहूर चीनी यात्री ह्वेनसांग (Xuanzang) ने अपने वैश्विक यात्रा वृत्तांतों और डायरियों में इस खास जगह का बहुत ही विस्तार से और सम्मानपूर्वक उल्लेख किया था। चीनी यात्री के इन ऐतिहासिक और प्रामाणिक दस्तावेजों से यह बात पूरी तरह शीशे की तरह साफ हो जाती है कि आज से लगभग डेढ़ हजार साल पहले भी यह पूरा क्षेत्र उत्तर भारत का एक बेहद समृद्ध, प्रभावशाली, सांस्कृतिक और धार्मिक गतिविधियों का सबसे बड़ा केंद्र बिंदु रहा होगा जहां देश-विदेश से लोग आते थे। इतना ही नहीं, ब्रिटिश काल के दौरान जब भारत में पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की स्थापना हुई तो इसके पहले महानिदेशक और भारतीय पुरातत्व के जनक कहे जाने वाले सर अलेक्जेंडर कन्निंघम (Alexander Cunningham) ने भी इस भूमि की जादुई बनावट को देखकर अपने विशेष सर्वेक्षणों में इस स्थल को प्रमुखता से शामिल किया था और यहां की प्राचीन ईंटों को चिह्नित करते हुए साल 1939-40 में पहली बार एक व्यवस्थित खुदाई की नींव रखी थी, जिसमें विशाल दीवारें और भव्य मंदिर जैसी संरचनाएं आंशिक रूप से बाहर आई थीं।
बीती सदी के मध्य में शुरू हुआ यह खोजी सफर यहीं नहीं रुका, बल्कि साल 1960 के स्वर्णिम दशक और उसके बाद साल 1971-72 के दौरान एक बार फिर देश के सबसे बड़े विज्ञानियों और शोधकर्ताओं की देखरेख में बेहद आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों के जरिए इस टीले की दोबारा गहरी और व्यापक खुदाई का काम शुरू करवाया गया। इस अभूतपूर्व और ऐतिहासिक उत्खनन के दौरान धरती का सीना चीरकर जो अद्भुत अवशेष और ढाँचे बाहर निकलकर आए, उन्होंने देश-दुनिया के बड़े-बड़े पुरातत्वविदों और वास्तुकला के विशेषज्ञों को दांतों तले उंगली दबाने पर मजबूर कर दिया क्योंकि वहां एक बेहद विशाल और अद्वितीय “पंचायतन शैली” का भव्य मंदिर परिसर पूरी तरह सुरक्षित अवस्था में पाया गया। भारतीय सनातन संस्कृति और स्थापत्य कला के इतिहास में इस पंचायतन निर्माण शैली को अत्यंत ही पवित्र और ऊंचे दर्जे का माना जाता है, जिसमें मुख्य आराध्य देव के केंद्रीय गर्भगृह वाले विशाल मंदिर के चारों कोनों पर चार अन्य छोटे लेकिन बेहद खूबसूरत सहायक मंदिरों का निर्माण योजनाबद्ध तरीके से किया जाता था, और यह विशिष्ट स्थापत्य कला मुख्य रूप से गुप्तकालीन राजवंश के चरम उत्कर्ष और उसके बाद के स्वर्ण युग में भारतवर्ष के भीतर तेजी से विकसित और पल्लवित हुई थी।

जमीन के नीचे दफन इस भव्य मंदिर परिसर की ईंटों, मिट्टी के लेप और दीवारों की विशेष बनावट का जब प्रयोगशालाओं में गहन अध्ययन किया गया, तो यह बात पूरी तरह प्रमाणित हो गई कि शुरुआत में यहां गुप्तकाल के दौरान केवल ईंटों की एक बुनियादी और सुदृढ़ संरचना खड़ी की गई थी, लेकिन आने वाली अगली कई शताब्दियों में अलग-अलग राजाओं और साम्राज्यों के दौर में इसका निरंतर विस्तार और आधुनिकीकरण होता चला गया। यही कारण है कि छठी और सातवीं शताब्दी के आते-आते इस सामान्य संरचना ने एक बेहद विशाल, अलौकिक और गगनचुंबी मंदिर परिसर का रूप अख्तियार कर लिया था, जिसकी दीवारों में कुषाण काल की बेहद मजबूत और खास तकनीक से पकी हुई ईंटें साफ तौर पर देखी जा सकती हैं जो गुप्तकालीन वास्तुकला के साथ मिलकर एक अद्भुत संगम पेश करती हैं। इन तमाम वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर इतिहासकारों ने यह बेहद ठोस और बड़ा निष्कर्ष निकाला है कि काशीपुर का यह महान स्थल किसी एक राजा या किसी एक सीमित समय की देन नहीं है, बल्कि यह अलग-अलग युगों और कालखंडों में मानव सभ्यता के क्रमिक विकास और निरंतर बदलती निर्माण शैलियों का एक बेहद खूबसूरत और जीता-जागता गवाह है।
द्रोणसागर की इस पूरी वैज्ञानिक खुदाई के दौरान जो सबसे बड़ी, क्रांतिकारी और दुनिया को हिला देने वाली कामयाबी हाथ लगी, वह थी यहां की मिट्टी की सबसे निचली परतों से बरामद हुए अत्यंत प्राचीन मिट्टी के बर्तनों के अवशेष जिन्हें पुरातत्व विज्ञान की तकनीकी भाषा में अति विशिष्ट पॉट्री कहा जाता है। इतिहास और पुरातत्व की दुनिया में पॉट्री का मतलब केवल मिट्टी के साधारण बर्तन नहीं होता, बल्कि यह उस काल के इंसानों की तकनीकी क्षमता का पैमाना होते हैं जिन्हें विशेष प्रकार की चिकनी मिट्टी से चाक पर गढ़ने के बाद बेहद ऊंचे तापमान की भट्ठियों और आग में पकाकर लोहे जैसा ठोस और टिकाऊ रूप दिया जाता था, जिनमें घड़े, मटके, कलात्मक कटोरे, पतली गर्दन वाली सुराही, पूजा के दीये, नक्काशीदार प्लेट और हांडी जैसी दैनिक जीवन की चीजें शामिल हैं। दुनियाभर के विशेषज्ञों के लिए ये बर्तन किसी भी प्राचीन सभ्यता की जीवनशैली, खान-पान, आर्थिक संपन्नता, सुदूर देशों के साथ उनके व्यापारिक रिश्तों और उनकी वैज्ञानिक सोच को समझने का सबसे बड़ा टाइम कैप्सूल माने जाते हैं, क्योंकि हर युग में बर्तनों की गोलाई, उनके ऊपर की जाने वाली पेंटिंग, रंगों के रसायन और मिट्टी को पकाने का हुनर पूरी तरह बदल जाता था जो इतिहास की सटीक तारीखें तय करने में मदद करता है।
काशीपुर के इस चमत्कारी स्थल से मिले बर्तनों के इन टुकड़ों में पुरातत्वविदों को “पेंटेड ग्रे वेयर” यानी चित्रित धूसर मृदभांड संस्कृति के बेहद दुर्लभ और पुख्ता अवशेष प्राप्त हुए हैं, जिनकी वैज्ञानिक जांच और कार्बन डेटिंग करने के बाद विशेषज्ञों ने इन्हें लगभग 700 ईसा पूर्व यानी आज से तकरीबन 2700 साल से भी ज्यादा पुराना और प्राचीन माना है। यह खोज पूरी दुनिया के इतिहास जगत में इसलिए एक बहुत बड़ा मील का पत्थर मानी जा रही है क्योंकि इस विशिष्ट पेंटेड ग्रे वेयर संस्कृति को सीधे तौर पर उत्तर भारत की सबसे पहली संगठित और विकसित सभ्यताओं के साथ-साथ महाभारत काल के तमाम ऐतिहासिक संदर्भों और भौगोलिक घटनाओं से जोड़कर देखा जाता रहा है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस साइट से केवल एक ही युग के नहीं, बल्कि कुषाण काल, गुप्त काल और उसके बाद के मध्यकालीन राजवंशों के समय की भी बेहद खूबसूरत और रंग-बिरंगी पॉट्री भारी मात्रा में मिली है, जिसका सीधा और निर्विवाद मतलब यह निकलता है कि यह पूरा मैदानी इलाका हजारों सालों तक कभी उजाड़ नहीं हुआ, बल्कि यहां मानव सभ्यता की सांसें लगातार चलती रहीं और इंसानी गतिविधियां बिना रुके सदियों तक अनवरत जारी रहीं।
इस रोमांचक और ऐतिहासिक उत्खनन के दौरान केवल बड़े-बड़े मंदिरों के अवशेष या मिट्टी के बर्तन ही हाथ नहीं लगे हैं, बल्कि उस दौर के इंसानों के सामाजिक रहन-सहन और उनके पारिवारिक ढांचे को बयां करने वाली दैनिक जीवन की बेहद खूबसूरत और बेशकीमती वस्तुएं भी मलबे से बाहर निकलकर आई हैं। मुख्य मंदिर की विशाल प्राचीर और ढही हुई दीवारों के पास जमा सदियों पुराने मलबे की जब बारीक छनाई की गई, तो वहां से चमकीले तांबे और प्राचीन कांच से निर्मित बेहद खूबसूरत चूड़ियां, महिलाओं द्वारा पहनी जाने वाली तांबे की कलात्मक अंगूठियां, पकी हुई मिट्टी यानी टेराकोटा और कीमती पत्थरों को तराशकर बनाए गए चमकीले मनके, लोहे की बेहद मजबूत कीलें और पत्थरों को काटने वाली लोहे की मजबूत छेनियां बरामद हुईं। इन छोटी-बड़ी तमाम वस्तुओं से वैज्ञानिकों को यह बहुत ही मजबूत और अकाट्य संकेत मिलता है कि प्राचीन काल में यह केवल सन्यासियों या पुजारियों का कोई अलग-थलग धार्मिक केंद्र भर नहीं था, बल्कि यह एक बेहद सुव्यवस्थित, अमीर और घनी आबादी वाली इंसानी बस्ती थी जहां लोग अपने परिवारों के साथ रहते थे, दूर-दराज के राज्यों से व्यापार करते थे और उच्च स्तर की शिल्पकारी व धातु कर्म से जुड़े वैज्ञानिक कार्यों में पारंगत थे।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों और वैज्ञानिकों के मुताबिक, गौविषाण टीला द्रोणासागर का यह पूरा ऐतिहासिक साम्राज्य लगभग 90 एकड़ के एक बेहद विशाल और विस्तृत मैदानी क्षेत्र में चारों तरफ फैला हुआ है, जिसकी सबसे अद्भुत और अनोखी विशेषता यह है कि यहां कोई एक अकेला स्मारक या मंदिर नहीं है बल्कि इसके भीतर एक पूरी की पूरी खोई हुई महान सभ्यता के जीवंत प्रमाण और अवशेष मौजूद हैं। इस विशाल संरक्षित साइट पर यदि कोई घूमकर देखे तो आज भी कई जगहों पर जमीन की सतह पर प्राचीन काल के गोल कुएं, पत्थरों को तरतीब से जोड़कर बनाए गए चौड़े रास्ते, राजप्रासादों की विशाल दीवारें और बड़े-बड़े नगरों के मलबे साफ तौर पर अपनी कहानी खुद बयां करते नजर आते हैं। इन दृश्यों को देखकर देश के बड़े-बड़े शोधकर्ता और इतिहासकार यह पक्का अनुमान लगा रहे हैं कि बीते युगों में यहां एक बहुत ही आधुनिक, सुव्यवस्थित और भव्य नगर नियोजन या एक विशाल धार्मिक-सांस्कृतिक राजधानी फल-फूल रही थी, और विशेषज्ञों का यह भी दृढ़ विश्वास है कि यदि इस पूरे 90 एकड़ के इलाके में बेहद बड़े पैमाने पर और आधुनिक तकनीकों के साथ दोबारा संपूर्ण खुदाई और वैज्ञानिक अध्ययन किया जाए तो उत्तराखंड ही नहीं बल्कि पूरे देश के प्राचीन इतिहास को बदलने वाले कई नए और चौंकाने वाले तथ्य दुनिया के सामने आ सकते हैं।
इन्हीं तमाम असीमित संभावनाओं को देखते हुए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (ASI) अब इस समूचे ऐतिहासिक और पौराणिक स्थल को एक बेहद भव्य और अंतरराष्ट्रीय स्तर के शोध व पर्यटन केंद्र के रूप में तब्दील करने के लिए दिन-रात एक कर रहा है, जिसके तहत सबसे पहले इन प्राचीन स्मारकों के केमिकल कंजर्वेशन और रासायनिक संरक्षण का काम युद्धस्तर पर शुरू कर दिया गया है। इस महायोजना के अंतर्गत द्रोणसागर के आसपास फैले जंगलों, अनचाही झाड़ियों और गंदगी को पूरी तरह साफ करके पूरे परिक्षेत्र को एक बेहद खूबसूरत और आकर्षक रूप दिया जा रहा है, साथ ही देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों की सहूलियत के लिए पत्थरों के सुंदर पैदल रास्ते, आधुनिक सूचना पट्ट, डिजिटल गाइड प्रणाली और इतिहास को समझाने वाले विशेष इन्फॉर्मेशन सेंटर तैयार किए जा रहे हैं। इसके साथ ही पुरातत्व विभाग दुनिया भर के बड़े विश्वविद्यालयों के शोधकर्ताओं, इतिहासकारों और पुरातत्व के युवा विद्यार्थियों के लिए इस साइट पर विशेष व्यावहारिक कार्यशालाएं, सेमिनार और उच्च स्तरीय अध्ययन कार्यक्रम आयोजित करने की एक बेहद व्यापक और दूरगामी योजना पर भी काम कर रहा है, जिससे इस अनमोल धरोहर की परतों के नीचे छिपे अनसुलझे रहस्यों पर और ज्यादा प्रामाणिक शोध किया जा सके।
आमतौर पर देवभूमि उत्तराखंड को पूरी दुनिया के भीतर केवल चारधाम यात्रा, गगनचुंबी बर्फीले पहाड़ों, पवित्र नदियों और प्राकृतिक खूबसूरती के लिए ही एक बड़े पर्यटन स्थल के रूप में जाना जाता रहा है, लेकिन काशीपुर की पावन धरती पर मौजूद द्रोणसागर जैसी ये विहंगम और प्राचीन साइटें अब पूरी दुनिया के सामने यह अकाट्य सच्चाई साबित कर रही हैं कि यह पावन भूमि ऐतिहासिक, वैज्ञानिक और पुरातात्विक दृष्टिकोण से भी उतनी ही महान और समृद्ध रही है जितनी कि दुनिया की अन्य प्राचीन सभ्यताएं। काशीपुर का यह गौरवशाली और अद्भुत स्थल आज इतिहास के पन्नों, सनातन आस्था के धागों और आधुनिक विज्ञान की कसौटियों का एक ऐसा बेजोड़ और अलौकिक संगम बन चुका है, जहां सदियों पुरानी मिट्टी के नीचे दबी हुई हर एक छोटी-बड़ी ईंट और बर्तन का टुकड़ा हजारों साल पुराने महान भारतवर्ष की अनकही और गौरवमयी दास्तान को बयां कर रहा है। यह द्रोणसागर महज पत्थरों और ईंटों का कोई बेजान ढांचा या कोई साधारण पुरातात्विक स्थल नहीं है, बल्कि यह उस महान और जीवंत भारतीय सभ्यता का साक्षात प्रमाण है जिसने सदियों तक इस धरती पर जीवन के नए आयाम गढ़े, कला और संस्कृति को सींचा और इंसानी आस्था को एक बेहद मजबूत और अटूट आधार प्रदान किया।





