काशीपुर। लोकतंत्र की जननी कहे जाने वाले भारत के संसदीय इतिहास में 17 अप्रैल 2026 की तारीख एक काले अध्याय के रूप में दर्ज हो गई है, जब नारी शक्ति के सपनों को पंख देने वाला ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ (131वां संविधान संशोधन विधेयक) राजनीति की भेंट चढ़ गया। काशीपुर की सड़कों से लेकर उत्तराखंड के गलियारों तक इस समय आक्रोश की ज्वाला भड़क रही है, क्योंकि जिस महिला आरक्षण बिल से यह उम्मीद थी कि वह पितृसत्तात्मक बेड़ियों को काटकर महिलाओं को नीति-निर्धारण की मुख्यधारा में लाएगा, उसे विपक्षी दलों के कड़े प्रतिरोध के चलते धराशायी कर दिया गया। राइजिंग फाउंडेशन और संगिन क्लब की जुझारू महिलाओं ने इस विफलता को केवल एक विधायी हार नहीं, बल्कि देश की आधी आबादी के आत्म-सम्मान पर सीधा प्रहार करार दिया है। स्थानीय महिला शक्ति का मानना है कि यह बिल मात्र एक कानूनी दस्तावेज नहीं था, बल्कि वह कुंजी थी जो पंचायतों से लेकर संसद तक महिलाओं के लिए नेतृत्व के द्वार खोलने वाली थी, लेकिन राजनीतिक स्वार्थों ने करोड़ों भारतीय महिलाओं की आकांक्षाओं का गला घोंट दिया है।
भारतीय जनता पार्टी ने अब इस मुद्दे को लेकर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के खिलाफ एक आक्रामक मोर्चा खोल दिया है, जिसमें स्पष्ट आरोप लगाया गया है कि कांग्रेस ने हमेशा नारी शक्ति को केवल एक वोट बैंक समझा है और जब उन्हें वास्तव में सशक्त करने का समय आया, तो वे पीछे हट गए। राइजिंग फाउंडेशन की अध्यक्ष सुधा राय ने अत्यंत व्यथित मन से कहा कि आज का परिदृश्य बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक है, जहाँ एक ओर हम वैश्विक मंच पर भारत को विश्वगुरु बनाने की बात करते हैं, वहीं दूसरी ओर महिलाओं के बुनियादी हक को छीन लिया गया है। उन्होंने कड़े शब्दों में प्रहार करते हुए कहा कि कांग्रेस द्वारा इस हार को अपनी जीत बताना दरअसल गांधी परिवार और उन ताकतों की संकुचित मानसिकता को दर्शाता है, जो राजनीति को अपनी निजी जागीर समझते हैं। इन परंपरागत राजनीतिक परिवारों को डर है कि यदि आम घरों की शिक्षित और जागरूक महिलाएं सदन में पहुँच गईं, तो उनकी विरासत और परिवारवाद का खेल हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगा, इसीलिए वे महिलाओं को समाज की चहारदीवारी तक ही सीमित रखना चाहते हैं।
इस पूरे प्रकरण पर काजल गिरी ने कांग्रेस के रवैये को ‘दोगलापन’ करार देते हुए कहा कि साल 2023 में जब इस अधिनियम की रूपरेखा तैयार हुई थी, तब जनगणना और परिसीमन जैसी प्रक्रियाओं को इसके क्रियान्वयन का आधार बनाया गया था, लेकिन अब जब मोदी सरकार इन बाधाओं को पार कर वास्तविक धरातल पर आरक्षण लागू करने की दिशा में बढ़ी, तो विपक्ष ने नए-नए बहाने बनाकर इसमें रोड़े अटका दिए। काजल का तर्क है कि जब विपक्ष में बैठी पार्टियां सरकार के नेक इरादों और संशोधनों पर भरोसा करने के बजाय केवल अवरोध पैदा करती हैं, तो जनता के पास यह समझने के लिए पर्याप्त कारण हैं कि असली मंशा सशक्तिकरण की नहीं बल्कि सत्ता के स्वार्थ की है। उन्होंने जोर देकर कहा कि महिलाओं को अब सिर्फ झंडे उठाने और रैलियों में भीड़ जुटाने का साधन नहीं समझा जा सकता, क्योंकि आज की नारी एक अनुशासित सेना की तरह अपने अधिकारों को पहचानती है और वह जानती है कि अपना हक कैसे मांगा जाता है और कैसे छीना जाता है।
सामाजिक संरचना में इस बिल के दूरगामी प्रभावों की चर्चा करते हुए स्थानीय महिला संगठनों ने स्पष्ट किया कि यदि यह आरक्षण कानून का रूप ले लेता, तो भारतीय समाज में एक युगांतरकारी बदलाव देखने को मिलता, जहाँ महिलाओं का प्रतिनिधित्व केवल सांकेतिक न होकर वास्तविक और सामान्य होता। इस बदलाव से सदियों पुरानी रूढ़िवादी सोच का खात्मा होता और स्वास्थ्य, शिक्षा तथा सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दों पर निर्णय लेने की शक्ति उन हाथों में होती जो इन समस्याओं को सबसे करीब से महसूस करती हैं। सुधा राय और उनके सहयोगियों का मानना है कि पुरुषों की वर्चस्ववादी मानसिकता आज भी महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने से कतराती है, लेकिन वे यह भूल रहे हैं कि नारी अब अबला नहीं बल्कि सबला बन चुकी है, जो चंडी और दुर्गा का प्रचंड रूप धारण करना भी जानती है और ममता की मूरत बनकर समाज का सृजन करना भी। समाज का ढांचा मातृशक्ति के बिना अधूरा है और उसे हाशिए पर रखकर राष्ट्र निर्माण की कल्पना करना बेमानी है।

काशीपुर की प्रखर वक्ता तन्वी अग्रवाल ने इस स्थिति को ‘समय की पुकार’ बताते हुए कहा कि कांग्रेस और उसके सहयोगियों ने जिस तरह से नारी शक्ति वंदन अधिनियम की राह रोकी है, उससे हर महिला का मन गहराई से आहत हुआ है। उन्होंने विपक्षी खेमे पर कटाक्ष करते हुए उन्हें ‘विधर्मी’ और ‘नारी विरोधी’ की संज्ञा दी, जो आज सदन में बिल के गिरने पर जश्न मना रहे हैं और नारी विरोधी परचम फहरा रहे हैं। तन्वी ने आह्वान किया कि अब हमारी शक्ति के वास्तविक प्रदर्शन का समय आ चुका है और यदि हम एकजुट हो जाएं, तो बड़े-बड़े पर्वतों को हिलाने का सामर्थ्य रखते हैं। उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि जो लोग हमें कमजोर समझ रहे हैं, वे शायद यह भूल गए हैं कि हम उसी माँ चंडी का रूप हैं जिसने अधर्म का नाश किया था। देश के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जहाँ हमारे सपनों को साकार करने के लिए दिन-रात प्रयासरत हैं, वहीं कांग्रेस उन सपनों को कुचलने के कुचक्र रच रही है, जिसे हम सफल नहीं होने देंगे।
विधानसभा और लोकसभा की सीटों पर पुरुषों के साथ बराबरी से बैठने का जो सपना भारतीय महिलाओं ने देखा था, उसे पूरा करने के लिए अब आंदोलन की राह पकड़ने की तैयारी शुरू हो चुकी है। श्रीमती तन्वी अग्रवाल और उनके साथियों ने संकल्प लिया है कि चाहे इसके लिए सड़कों पर उतरना पड़े, अनशन करना पड़े या फिर सामूहिक शक्ति प्रदर्शन करना पड़े, वे अपना हक लेकर ही रहेंगी और इस लड़ाई को अंजाम तक पहुँचाएंगी। सोमा कामबोज ने अपनी काव्यमयी वाणी में नारी की महिमा का बखान करते हुए कहा कि ज्ञान का स्वरूप माँ शारदा, समृद्धि की दात्री माँ लक्ष्मी और संहार की शक्ति माँ काली—ये सभी नारी के ही विभिन्न रूप हैं, फिर भला लोकसभा और विधानसभा की चौखट से नारी को दूर क्यों रखा जा रहा है। उनका मानना है कि पुरुषों के बराबर आना अब नारी का एकमात्र लक्ष्य नहीं है, क्योंकि वह अपनी योग्यता और क्षमता से हर क्षेत्र में पुरुषों पर भारी पड़ती है, उसे तो बस अपना वह संवैधानिक अधिकार चाहिए जो लंबे समय से लंबित है।
काजल गिरी ने इस पूरे आंदोलन को एक नई परिभाषा देते हुए कहा कि ‘नारी’ केवल एक शब्द नहीं है, बल्कि वह पूरी सृष्टि का आधार है और जिस समाज में उसका सम्मान होता है, वहीं वास्तविक संस्कारों का वास होता है। उनके साथ शैली अग्रवाल, सालनी गुप्ता, हेमा बक्सी और प्रेमलता मिश्रा जैसी जागरूक महिलाओं ने एक सुर में कहा कि 17 अप्रैल 2026 का दिन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक ऐसे दिन के रूप में याद रखा जाएगा, जब बेनकाब चेहरों ने महिला सशक्तिकरण के मार्ग में कांटे बिछाए। यह विधेयक महज एक विधायी प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि यह करोड़ों महिलाओं के उस भरोसे की कसौटी थी जो वे व्यवस्था पर करती हैं। जब पूरा राष्ट्र उन्नति के पथ पर अग्रसर होना चाहता है, तब तुच्छ राजनीति के कारण ऐसे ऐतिहासिक अवसरों को गंवाना राष्ट्र के भविष्य के साथ खिलवाड़ है, क्योंकि नारी शक्ति का सम्मान किसी एक राजनीतिक दल की बपौती नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की सामूहिक जिम्मेदारी है।
अंत में, काशीपुर की इन प्रखर नारी शक्तियों ने समाज को एक स्पष्ट संदेश दिया है कि ‘अब नहीं तो कभी नहीं’ के मंत्र को आत्मसात करने का वक्त आ गया है। महिलाओं को केवल देवी मानकर मंदिरों में पूजना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें समाज में बराबरी का हक, उत्कृष्ट शिक्षा और पुख्ता सुरक्षा प्रदान करना अनिवार्य है। यह वह समय है जब महिलाओं को घर की चहारदीवारी के भीतर सीमित रखने वाली सोच को त्यागकर उन्हें राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार बनाना होगा। नारी शक्ति अब जागरूक हो चुकी है और वह अपने अधिकारों के प्रति किसी भी प्रकार के समझौते के मूड में नहीं है। ‘नारी शक्ति जिंदाबाद’ और ‘भारत माता की जय’ के नारों के साथ काशीपुर की इन महिलाओं ने यह साफ कर दिया है कि वे तब तक चैन से नहीं बैठेंगी जब तक ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ धरातल पर लागू होकर उन्हें उनका उचित सम्मान नहीं दिला देता।





