देहरादून।दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के प्रांगण में बीते शनिवार की संध्या एक ऐसी ऐतिहासिक और गौरवमयी घटना की गवाह बनी, जिसने संस्कृत साहित्य के अनमोल नक्षत्र महाकवि कालिदास के कालजयी कृतित्व को जीवंत कर दिया। उत्तराखंड राज्य स्थापना के रजत जयंती वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रमों की भव्य श्रृंखला के अंतर्गत इस विशेष सारस्वत उत्सव का आयोजन किया गया, जिसमें साहित्य, संगीत, नृत्य और चित्रकला का एक ऐसा अद्भुत कोलाज देखने को मिला जिसने उपस्थित जनसमूह को मंत्रमुग्ध कर दिया। सभागार की दीवारों से लेकर खुले आसमान के नीचे बने एम्फीथिएटर तक, हर कोना कालिदास की उपमाओं और उनके छंदों की मधुर अनुगूंज से सराबोर नजर आया। इस गरिमामयी आयोजन का उद्देश्य न केवल नई पीढ़ी को संस्कृत की महान विरासत से रूबरू कराना था, बल्कि आधुनिक परिवेश में कालिदास के प्रासंगिक संदेशों को जन-जन तक पहुँचाना भी रहा। कार्यक्रम की भव्यता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें शिक्षाविदों से लेकर शासन के उच्चाधिकारियों और कला प्रेमियों की भारी उपस्थिति दर्ज की गई।
कार्यक्रम के शुरुआती चरण में ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी के वंदन के पश्चात विभिन्न विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों से आए युवा विद्यार्थियों ने सामूहिक रूप से संस्कृत के श्लोकों का इतना मधुर और लयबद्ध गायन किया कि पूरा परिसर आध्यात्मिक शांति से भर उठा। इन युवाओं की प्रस्तुति ने यह सिद्ध कर दिया कि आधुनिकता के दौर में भी संस्कृत की जड़ें हमारी नई पीढ़ी के भीतर अत्यंत गहरी और सुदृढ़ हैं। इसी क्रम में डी.ए.वी. पी.जी. कालेज के कला संकाय के प्रतिभाशाली छात्रों द्वारा लगाई गई चित्रकला प्रदर्शनी आकर्षण का मुख्य केंद्र रही, जहाँ कैनवास पर महाकवि कालिदास के जीवन के विभिन्न पहलुओं और उनकी रचनाओं के काल्पनिक दृश्यों को रंगों के माध्यम से उकेरा गया था। इन चित्रों में कालिदास की विरहिणी यक्ष की व्यथा हो या कुमारसंभव का भव्य हिमालय वर्णन, छात्रों की तूलिका ने हर भाव को बड़ी बारीकी से चित्रित किया था। दर्शकों ने इन कलाकृतियों को निहारते हुए छात्रों की रचनात्मकता और उनकी सूक्ष्म दृष्टि की खुले दिल से प्रशंसा की, जिसने कालिदास के काव्य को एक दृश्य रूप प्रदान कर दिया था।
सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के दूसरे चरण में दून पुस्तकालय के एम्फीथिएटर में कला का वह जादू बिखरा, जिसकी चर्चा लंबे समय तक देहरादून के गलियारों में होती रहेगी। सुप्रसिद्ध नृत्यांगना शर्मिला गांगुली भरतरी और उनकी समर्पित टीम ने मंच पर महाकवि द्वारा रचित ‘मेघदूत’, ‘हिमालय प्रशस्ति’, ‘कुमारसंभव’ और माँ काली की आराधना पर आधारित प्रसंगों को शास्त्रीय नृत्य के माध्यम से इस प्रकार प्रस्तुत किया जैसे स्वयं कालिदास की कविताएं नृत्य कर रही हों। शर्मिला भरतरी के हर मुद्रा और भावभंगिमा में कालिदास के प्रकृति प्रेम और श्रृंगार रस की स्पष्ट झलक दिखाई दे रही थी। इस प्रस्तुति को पूर्णता प्रदान करने में शैलेंद्र रावत, बापुन दत्ता और डॉ. नूतन स्मृति का सहयोग अत्यंत सराहनीय रहा, जिन्होंने संगीत और लय के तालमेल से प्रदर्शन को एक अलौकिक ऊँचाई प्रदान की। एम्फीथिएटर में बैठे दर्शकों ने इस सांस्कृतिक महाकुंभ का आनंद लेते हुए कलाकारों के हुनर की मुक्तकंठ से सराहना की, जिससे वातावरण तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा। यह प्रदर्शन कला और साहित्य के उस अटूट संबंध को दर्शाता था, जहाँ शब्द और मुद्राएं एक-दूसरे के पूरक बन जाते हैं।
आज के इस बौद्धिक विमर्श की अध्यक्षता उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति डॉ. सुधा रानी पांडेय ने की, जिन्होंने अपने संबोधन में देहरादून जैसे आधुनिक शहर में संस्कृत साहित्य के प्रति बढ़ती रुचि को एक सकारात्मक संकेत बताया। उन्होंने कहा कि दून पुस्तकालय का यह अभिनव प्रयास न केवल सराहनीय है, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक जड़ों को सींचने का कार्य भी कर रहा है। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित उत्तराखंड शासन के संस्कृत शिक्षा सचिव श्री दीपक गैरोला ने अपने विचार साझा करते हुए कहा कि कालिदास के व्यापक कृतित्व को वर्तमान पीढ़ी तक पहुँचाने की दिशा में यह आयोजन एक सफल मील का पत्थर साबित हुआ है। उन्होंने संस्कृत साहित्य के गौरवशाली इतिहास पर प्रकाश डालते हुए राज्य सरकार द्वारा इस देवभाषा के संरक्षण और संवर्धन के लिए किए जा रहे निरंतर प्रयासों को रेखांकित किया। उन्होंने जोर देकर कहा कि संस्कृत केवल एक भाषा नहीं बल्कि हमारी जीवन पद्धति का आधार है, जिसे प्रोत्साहित करना हम सभी का सामूहिक उत्तरदायित्व है।
मुख्य वक्ता के रूप में डी.ए.वी. (पीजी) कॉलेज के संस्कृत विभाग के आचार्य डॉ. रामविनय सिंह ने कालिदास के साहित्य के गूढ़ रहस्यों को बड़े ही रोचक ढंग से श्रोताओं के समक्ष रखा। उन्होंने अपने व्याख्यान में प्रतिपादित किया कि कालिदास को वैश्विक स्तर पर श्रृंगार रस के सर्वोच्च कवि के रूप में निर्विवाद मान्यता प्राप्त है। यद्यपि उनके जन्म के सटीक समय और स्थान को लेकर विद्वानों में मतभेद और विभिन्न मतांतर रहे हैं, किंतु उनकी रचनाओं की उत्कृष्टता उन्हें भारत के नवरत्नों में श्रेष्ठ सिद्ध करती है। डॉ. सिंह ने स्थानीय लोक मान्यताओं का उल्लेख करते हुए बताया कि उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले के कविल्ठा गाँव का संबंध उनकी जन्मभूमि और कर्मभूमि से जोड़कर देखा जाता है, जो हमारे राज्य के लिए अत्यंत गर्व का विषय है। उन्होंने राजा भोज की मिथ्या मृत्यु से जुड़े कालिदास के चर्चित प्रसंग को सुनाकर सदन में कवित्व की शक्ति का लोहा मनवाया और साथ ही ‘ऋतु संसार’, ‘अभिज्ञान शाकुन्तलम्’ और ‘मेघदूत’ के विभिन्न मार्मिक पक्षों पर विस्तार से प्रकाश डाला, जिससे श्रोताओं को कालिदास के विराट व्यक्तित्व को समझने में सहायता मिली।
इस पूरे भव्य आयोजन की रूपरेखा तैयार करने और इसके मुख्य सूत्रधार की भूमिका निभाने वाली एमकेपी (पीजी) कॉलेज की पूर्व प्राचार्या डॉ. इन्दु सिंह ने कार्यक्रम की सफलता पर प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने उपस्थित सभी प्रबुद्ध जनों और आगंतुकों का भावपूर्ण अभिनंदन करते हुए कालिदास की प्रासंगिकता पर संक्षिप्त किंतु प्रभावशाली विचार रखे। कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ. भारती मिश्रा ने अपनी ओजस्वी वाणी से किया, जिन्होंने हर कड़ी को बड़ी कुशलता से जोड़ा। आयोजन के प्रारंभ में दून पुस्तकालय के कार्यक्रम अधिकारी चन्द्रशेखर तिवारी ने सभी अतिथियों का औपचारिक स्वागत किया और उनकी उपस्थिति के प्रति आभार प्रकट किया। अंत में दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के मानद निदेशक श्री एन. रवि शंकर ने मंच पर आसीन मुख्य अतिथियों, विद्वान वक्ताओं और अपनी कला से मंत्रमुग्ध करने वाले कलाकारों को स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया। उनकी इस पहल ने कार्यक्रम में गरिमा का एक नया अध्याय जोड़ा और संस्थान की प्रतिबद्धता को प्रदर्शित किया।
कार्यक्रम में उपस्थित जनसमूह की विविधता और विशिष्टता इसकी सफलता का सबसे बड़ा प्रमाण रही। इस अवसर पर उत्तराखंड की मुख्य सूचना आयुक्त श्रीमती राधा रतूड़ी, पूर्व मुख्य सचिव श्री अनिल रतूड़ी, और नृप सिंह नपलच्याल जैसे उच्चाधिकारियों ने शिरकत कर आयोजन की शोभा बढ़ाई। इनके अतिरिक्त राजीव भरतरी, अजय जोशी, सोमवारी लाल उनियाल, डॉ. सुशील उपाध्याय, सोहन सिंह रजवार, कल्याण बुटोला, शैलेन्द्र नौटियाल, कमला पंत, भारती आनंद, दिनेश भट्ट, सुन्दर सिंह बिष्ट, नरेन्द्र सिंह, डॉली डबराल, नीता कुकरेती, जय भगवान गोयल, जगदीश सिंह महर, और अनिल कुमार सहित देहरादून के अनेक प्रसिद्ध संस्कृतिविद्, लेखक, साहित्यकार और जागरूक नागरिक बड़ी संख्या में मौजूद रहे। देर शाम तक चले इस कार्यक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया कि साहित्य और कला का आकर्षण आज भी हर वर्ग के व्यक्ति को जोड़ने की शक्ति रखता है। दून पुस्तकालय की यह पहल निश्चित रूप से राज्य के सांस्कृतिक इतिहास में एक सुनहरे पृष्ठ के रूप में दर्ज की जाएगी, जिसने महाकवि कालिदास की अमर वाणी को पुनः हिमालय की वादियों में गुंजायमान कर दिया।





