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परिसीमन के नाम पर छोटे राज्यों के वजूद से खिलवाड़ कर रही भाजपा: अलका पाल

महिला आरक्षण की आड़ में परिसीमन का बड़ा खेल नाकाम, अलका पाल ने मोदी सरकार के 'गुप्त मिशन' पर किया सर्जिकल स्ट्राइक। आखिर क्यों आधी आबादी के हक को 2029 तक लटकाना चाहती है भारतीय जनता पार्टी?

काशीपुर। संसद के गलियारों में शुक्रवार को एक ऐसा राजनीतिक भूकम्प आया जिसने सत्ता पक्ष के आत्मविश्वास को हिलाकर रख दिया और विपक्ष के तेवरों को नई धार दे दी। महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े बहुचर्चित ‘संविधान (131वां) संशोधन विधेयक 2026’ का लोकसभा में गिरना भारतीय संसदीय इतिहास की एक विरल घटना बन गई है, क्योंकि पिछले 12 वर्षों में यह पहली बार हुआ है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा पेश किया गया कोई संवैधानिक संशोधन विधेयक सदन की दहलीज पार नहीं कर पाया। दो दिनों तक चली तीखी और मैराथन बहस के बाद जब मत विभाजन की घड़ी आई, तो सदन का दृश्य पूरी तरह बदल गया। विधेयक के पक्ष में जहाँ 298 सदस्यों ने अपने मत दिए, वहीं विरोध में 230 मत पड़े, जिसके कारण दो-तिहाई बहुमत की अनिवार्य शर्त पूरी नहीं हो सकी और यह महत्वपूर्ण मसौदा धराशायी हो गया। इस हार ने न केवल सरकार की रणनीति पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि विपक्षी खेमे में एक नई ऊर्जा का संचार कर दिया है, जिससे अब यह मुद्दा केवल संसद तक सीमित न रहकर देश की सड़कों और चौराहों की सियासत में एक बड़े उबाल के रूप में तब्दील हो चुका है।

काशीपुर की राजनीति में गहरी पैठ रखने वाली कांग्रेस की फायरब्रांड नेत्री और महानगर जिला अध्यक्ष अलका पाल ने इस घटनाक्रम पर अपनी पैनी प्रतिक्रिया देते हुए भारतीय जनता पार्टी की घेराबंदी शुरू कर दी है। उन्होंने इस पूरे विधेयक को भाजपा का एक सुनियोजित ‘राजनीतिक छल’ करार दिया और कहा कि यह वास्तव में महिला सशक्तिकरण के नाम पर बुना गया एक ऐसा जाल था जिसका उद्देश्य देश के संघीय ढांचे और भाषाई संतुलन को तहस-नहस करना था। अलका पाल का मानना है कि इस विधेयक का गिरना भाजपा के उस गुप्त एजेंडे की करारी हार है जो लोकतंत्र के लिए एक बड़ा खतरा बन सकता था। उन्होंने विपक्ष की एकजुटता की सराहना करते हुए स्पष्ट किया कि विपक्षी दलों ने इस दोषपूर्ण मसौदे के विरुद्ध मतदान करके भारत के उन छोटे राज्यों और दक्षिण भारतीय क्षेत्रों के राजनीतिक वजूद को बचा लिया है, जिन्हें परिसीमन की आड़ में सत्ता की भूख मिटाने के लिए निशाना बनाया जा रहा था। उनके अनुसार, भाजपा महिलाओं को सम्मान देने का केवल ढोंग कर रही थी, जबकि उनकी असली मंशा अपनी राजनीतिक बिसात बिछाकर विपक्ष को मात देना था।

इतिहास के झरोखों से झांकते हुए महानगर अध्यक्ष अलका पाल ने बड़े ही गौरव के साथ यह रेखांकित किया कि महिला आरक्षण का वास्तविक विचार और उसकी नींव सबसे पहले पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी जी ने ही रखी थी। उन्होंने याद दिलाया कि महिलाओं को नीति-निर्धारण के शीर्ष स्तर तक पहुँचाने का जो सपना राजीव गांधी जी ने देखा था, उसे धरातल पर उतारने का कार्य कांग्रेस ने ही किया, जिसका सबसे बड़ा प्रमाण पंचायती राज व्यवस्था में महिलाओं को मिला आरक्षण है। अलका पाल ने इस मशाल को आगे बढ़ाने के लिए सोनिया गांधी जी के संघर्षों का भी उल्लेख किया, जिन्होंने संसद में महिलाओं के लिए स्थान आरक्षित करने हेतु एक लंबी और थका देने वाली कानूनी व राजनीतिक लड़ाई लड़ी। उन्होंने सत्ता पक्ष पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि जो लोग आज इस बिल का श्रेय लेने के लिए उतावले हो रहे हैं, वे वही लोग हैं जिन्होंने अतीत में कांग्रेस के नेक इरादों के मार्ग में निरंतर कांटे बोने का काम किया था। उनके अनुसार, कांग्रेस ने केवल वादे नहीं किए, बल्कि देश को पहली महिला प्रधानमंत्री, पहली महिला राष्ट्रपति और पहली महिला लोकसभा स्पीकर देकर अपनी प्रतिबद्धता को चरितार्थ किया है।

विधेयक के भीतर छिपे तकनीकी पेच और ‘परिसीमन’ जैसे विवादित विषयों पर सरकार को आड़े हाथों लेते हुए अलका पाल ने कई गंभीर सवाल दाग दिए हैं। उन्होंने हैरानी जताते हुए पूछा कि यदि भाजपा सरकार वास्तव में महिलाओं की सच्ची हितैषी थी, तो उसने इस आरक्षण को 2024 के लोकसभा चुनाव से ही प्रभावी क्यों नहीं किया और इसे 2029 तक के लिए क्यों टाल दिया गया? कांग्रेस नेत्री ने एक सनसनीखेज विश्लेषण पेश करते हुए दावा किया कि भाजपा इस विधेयक के माध्यम से हिंदी भाषी राज्यों में अपनी सीटों का कृत्रिम विस्तार करना चाहती थी, जिससे देश के राजनीतिक मानचित्र पर उनका एकाधिकार स्थापित हो सके। उनके मुताबिक, इस प्रक्रिया से दक्षिण भारत और उत्तर-पूर्व के राज्यों को भारी नुकसान उठाना पड़ता और देश में एक गहरी क्षेत्रीय असमानता पैदा हो जाती। अलका पाल ने जोर देकर कहा कि यदि नीयत साफ होती, तो मौजूदा 543 सीटों पर ही तत्काल प्रभाव से 33 प्रतिशत आरक्षण लागू किया जा सकता था, लेकिन भाजपा का मुख्य लक्ष्य महिलाओं का कल्याण नहीं, बल्कि सीटों के नए गणित के जरिए अपना वर्चस्व स्थायी बनाना था, जिसे विपक्ष ने समय रहते भांप लिया।

राजनीतिक भविष्य और महिला नेतृत्व की चुनौतियों पर चर्चा करते हुए अलका पाल ने दिल्ली की वर्तमान स्थिति और केरल के आगामी विधानसभा चुनावों का हवाला देकर भाजपा की विचारधारा पर चोट की। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा और उससे प्रेरित संगठनों में महिलाओं के लिए कभी भी कोई निर्णयात्मक या सम्मानजनक भूमिका नहीं रही है, और यह बात उनके संगठनात्मक ढांचे से स्पष्ट झलकती है। दिल्ली की मुख्यमंत्री के संदर्भ में की गई चयन प्रक्रिया पर प्रश्न उठाते हुए उन्होंने कहा कि भाजपा केवल दिखावे के लिए महिलाओं को आगे करती है, जबकि कांग्रेस पार्टी का विजन राहुल गांधी जी के उन विचारों में स्पष्ट है जहाँ वे केरल जैसे राज्यों में एक सशक्त और सक्षम महिला मुख्यमंत्री को देखने की इच्छा रखते हैं। अलका पाल ने स्थानीय स्तर पर राहुल गांधी जी के ‘संगठन सृजन’ अभियान की प्रशंसा की, जिसके माध्यम से ज़मीनी स्तर की महिलाओं को प्रशिक्षित कर उन्हें मुख्यधारा की राजनीति के लिए तैयार किया जा रहा है। उनके अनुसार, कांग्रेस महिलाओं को केवल एक ‘वोट बैंक’ नहीं बल्कि समाज को बदलने वाली एक ‘शक्ति पुंज’ के रूप में देखती है, जो देश के भविष्य का नेतृत्व करने में सक्षम हैं।

सड़क से संसद तक महिला सुरक्षा और न्याय के ज्वलंत मुद्दों पर सत्ता पक्ष को घेरते हुए अलका पाल ने उन घटनाओं का जिक्र किया जिन्होंने देश की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया था। उन्होंने जंतर-मंतर पर अपनी गरिमा की लड़ाई लड़ रही अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त महिला पहलवानों के दर्द को साझा किया और कहा कि जो प्रधानमंत्री मंचों से महिला सम्मान के नारे देते हैं, उन्होंने उन बेटियों को न्याय देने के बजाय चुप्पी साधे रखी। बृजभूषण सिंह जैसे नेताओं को भाजपा द्वारा दिए जा रहे कथित संरक्षण पर उन्होंने गहरा आक्रोश व्यक्त किया और इसे भाजपा के ‘दोहरे चरित्र’ का जीता-जागता सबूत बताया। इसके साथ ही, उन्होंने उत्तराखंड की बेटी अंकिता भंडारी के दुखद मामले का उल्लेख करते हुए भावुक स्वर में कहा कि देवभूमि की उस बेटी को इंसाफ दिलाने के लिए राहुल गांधी जी ने अपनी ‘भारत जोड़ो यात्रा’ का पूरा एक दिन समर्पित कर दिया था, जबकि स्थानीय सरकार और केंद्र का नेतृत्व इस संवेदनहीन मामले पर मूकदर्शक बना रहा। कुलदीप सेंगर और प्रज्वल रेवन्ना जैसे मामलों का उदाहरण देते हुए उन्होंने सवाल किया कि क्या अपराधियों के पक्ष में खड़े रहना ही भाजपा का असली महिला सम्मान है?

अपने वक्तव्य के अंतिम चरण में अलका पाल ने समाज के वंचित वर्गों की महिलाओं के अधिकारों की पुरजोर वकालत की और साफ़ कहा कि बिना ‘कोटे के भीतर कोटा’ के यह आरक्षण पूरी तरह से अधूरा और छलावा मात्र है। उन्होंने भाजपा पर यह आरोप लगाया कि वह पिछड़ों और दलितों की आवाज को दबाने की मंशा रखती है और 2026 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर ओबीसी वर्ग के बढ़ते प्रभाव को कुचलना चाहती है। उन्होंने चेतावनी दी कि जब तक समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़ी महिला को उसकी भागीदारी का हक नहीं मिलता, तब तक कांग्रेस चैन से नहीं बैठेगी। अलका पाल ने देश की जनता और विशेषकर महिलाओं को आगाह किया कि वे भाजपा के इस चुनावी ढोंग और छलावे को समझें, जो केवल सत्ता के लालच में लाया गया था। उन्होंने अपनी पार्टी की प्रतिबद्धता दोहराते हुए कहा कि कांग्रेस ही एकमात्र ऐसी शक्ति है जो वास्तव में महिलाओं को राजनीतिक रूप से सशक्त बनाने और उन्हें देश के सर्वोच्च पदों पर आसीन करने के लिए ईमानदारी से संघर्ष करती रहेगी, ताकि लोकतंत्र की गरिमा अक्षुण्ण बनी रहे।

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