उत्तराखंड के नैनीताल जनपद स्थित रामनगर वन प्रभाग से एक हृदयविदारक और सनसनीखेज मामला प्रकाश में आया है, जिसने वन्यजीव प्रेमियों और वन महकमे की रातों की नींद उड़ा दी है। कालाढूंगी वन रेंज के घने और दुर्गम जंगलों के बीच एक विशालकाय भालू का निर्जीव शरीर मिलने से पूरे इलाके में हड़कंप मच गया है। जैसे ही यह खबर जंगल की आग की तरह फैली, वन विभाग के आला अधिकारी और कर्मचारी तुरंत हरकत में आ गए और आनन-फानन में घटनास्थल की ओर कूच कर दिया। इस घटना ने एक बार फिर हिमालयी जंगलों में वन्यजीवों की सुरक्षा और उनकी आकस्मिक मृत्यु के कारणों पर गंभीर विमर्श छेड़ दिया है। हालांकि प्रथम दृष्टया मामला प्राकृतिक दुर्घटना का प्रतीत हो रहा है, परंतु वन विभाग की टीम गहनता से हर उस पहलू की पड़ताल कर रही है जो इस मौत के पीछे का रहस्य खोल सके। कालाढूंगी की शांत वादियों में इस वन्यजीव की मृत्यु ने पर्यावरण प्रेमियों को झकझोर कर रख दिया है और सभी की नजरें अब आगामी चिकित्सकीय जांच पर टिकी हुई हैं।
जंगल के भीतर बहने वाली एक शांत नदी के समीप इस दुखद घटना का मंजर तब सामने आया जब कालाढूंगी रेंज की एक महत्वपूर्ण बीट में सन्नाटा पसरा हुआ था। बताया जा रहा है कि एक सफारी वाहन अपनी नियमित गश्त या भ्रमण पर था, तभी उसमें तैनात चौकस गार्ड की नजर नदी किनारे पड़े एक काले रंग के भारी-भरकम ढेर पर पड़ी। करीब जाकर देखने पर गार्ड के होश उड़ गए क्योंकि वह कोई पत्थर नहीं बल्कि एक विशालकाय भालू का शव था, जो बेसुध अवस्था में वहां पड़ा था। गार्ड ने बिना एक पल की देरी किए अपने उच्चाधिकारियों को इस अनहोनी की सूचना वायरलेस और फोन के माध्यम से दी, जिसके बाद वन विभाग की रेस्क्यू टीम आवश्यक साजो-सामान के साथ मौके पर पहुंच गई। वन्यजीव प्रेमियों और स्थानीय ग्रामीणों का हुजूम भी इस दृश्य को देखने के लिए उमड़ पड़ा, जिसके बाद वन कर्मियों ने पूरे क्षेत्र को घेरे में लेकर साक्ष्य जुटाने की प्रक्रिया शुरू की और मृत भालू को सुरक्षित रूप से वाहन में लादकर पोस्टमार्टम के लिए रवाना किया।
कालाढूंगी वन विश्राम गृह के परिसर में जब भालू के शव को लाया गया, तो वहां का माहौल काफी गमगीन और तनावपूर्ण था। यहां वन्यजीवों के स्वास्थ्य और सुरक्षा के प्रति समर्पित चिकित्सकों की एक विशेषज्ञ टीम पहले से ही तैनात थी, जिन्होंने पूरी कानूनी औपचारिकताएं निभाते हुए पंचनामा भरने की प्रक्रिया पूरी की। नैनीताल से विशेष रूप से बुलाए गए पशु चिकित्सा विशेषज्ञ डॉक्टर हिमांशु पंक्ति और डॉक्टर राहुल सती ने अपनी देखरेख में शव परीक्षण की जटिल प्रक्रिया को अंजाम दिया। इन विशेषज्ञों ने भालू के शरीर का बारीकी से निरीक्षण किया ताकि किसी भी बाहरी चोट, संघर्ष के निशान या जहर के लक्षणों की पहचान की जा सके। पूरी टीम ने वैज्ञानिक पद्धति का अनुसरण करते हुए साक्ष्य एकत्रित किए और इस बात पर ध्यान केंद्रित किया कि क्या यह मौत किसी आपसी संघर्ष का परिणाम थी या फिर इसके पीछे कोई अन्य रहस्यमयी कारण छिपा है, जिसकी पुष्टि के लिए अंगों के नमूने भी लिए गए हैं।
रामनगर की वन उप प्रभाग अधिकारी यानी एसडीओ कामिनी आर्य ने इस पूरे घटनाक्रम पर मीडिया को विस्तृत जानकारी देते हुए बताया कि शुरुआती जांच और भौतिक निरीक्षण के आधार पर मृत जीव की पहचान एक स्लाथ बीयर के रूप में हुई है। कामिनी आर्य के अनुसार, भालू के शरीर की स्थिति और घटनास्थल के आसपास के भौगोलिक हालातों को देखते हुए ऐसा अंदेशा जताया जा रहा है कि भालू शायद किसी ऊंचे पेड़ से संतुलन बिगड़ने के कारण गिर गया होगा, जिससे उसे आंतरिक गंभीर चोटें आई होंगी। हालांकि, उन्होंने पूरी जिम्मेदारी के साथ यह भी स्पष्ट किया कि यह केवल एक प्रारंभिक अनुमान है और मौत के वास्तविक एवं वैज्ञानिक कारणों का खुलासा तभी संभव हो पाएगा जब विस्तृत पोस्टमार्टम रिपोर्ट विभाग के हाथों में होगी। एसडीओ कामिनी आर्य ने यह भी आश्वासन दिया कि विभाग वन्यजीवों के संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध है और इस मामले में किसी भी तरह की लापरवाही या बाहरी हस्तक्षेप की गुंजाइश को जांच के दायरे में रखा गया है।
वन विभाग के रिकॉर्ड और शारीरिक माप के अनुसार, यह मृत भालू एक पूर्ण वयस्क नर था जिसकी लंबाई लगभग 176 सेंटीमीटर मापी गई है और उसकी आयु करीब 10 वर्ष के आसपास आंकी गई है। वन अधिकारियों के लिए सबसे बड़ी राहत और संतोष की बात यह रही कि भालू के शरीर के सभी महत्वपूर्ण अंग, नाखून, दांत और खाल पूरी तरह सुरक्षित पाए गए हैं। इस तथ्य ने उन आशंकाओं को काफी हद तक खारिज कर दिया है जिसमें किसी शिकारी गिरोह की संलिप्तता या अवैध शिकार की बात सोची जा रही थी, क्योंकि तस्कर आमतौर पर इन कीमती अंगों के लिए ही वन्यजीवों को निशाना बनाते हैं। उप रेंजर वीरेंद्र बिष्ट और उनकी टीम ने घटनास्थल का चप्पा-चप्पा छाना लेकिन वहां किसी भी तरह की संदिग्ध गतिविधि या इंसानी दखल के निशान नहीं मिले, जिससे विभाग ने फिलहाल इसे एक प्राकृतिक मौत की श्रेणी में रखा है, लेकिन सतर्कता अभी भी बरकरार है।
इस पूरी कार्यवाही के दौरान कालाढूंगी वन रेंज के उप रेंजर वीरेंद्र बिष्ट सहित वन विभाग के दर्जनों कर्मचारी और अधिकारी मुस्तैदी से डटे रहे, ताकि पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रहे और किसी भी नियम का उल्लंघन न हो। वन विभाग अब पूरी तरह से प्रयोगशाला की रिपोर्ट और पोस्टमार्टम के अंतिम निष्कर्षों पर निर्भर है, क्योंकि वही वह निर्णायक दस्तावेज होगा जो इस भालू की मौत के पीछे छिपे असली सच से पर्दा उठाएगा। स्थानीय स्तर पर वन्यजीव प्रेमियों में इस घटना को लेकर गहरा दुख है, क्योंकि कालाढूंगी का यह क्षेत्र जैव विविधता से समृद्ध है और यहां के भालू पर्यटकों के लिए मुख्य आकर्षण का केंद्र रहते हैं। अब सभी को उस रिपोर्ट का इंतजार है जो यह तय करेगी कि क्या वास्तव में यह एक महज हादसा था या फिर जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र में कोई नया बदलाव आ रहा है जिसके प्रति विभाग को और अधिक सजग होने की आवश्यकता है।





