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मनसा देवी मंदिर में महिला श्रद्धालुओं की सुरक्षा और सम्मान के लिए ऐतिहासिक फैसला

अब आशीर्वाद के नाम पर भक्तों को छू नहीं सकेंगे पुजारी और गर्भगृह में एक बार चढ़ाया गया पावन नारियल या फूल दोबारा बेचना हुआ पूरी तरह से प्रतिबंधित।

हरिद्वार। विश्व प्रसिद्ध और आस्था की पावन नगरी हरिद्वार से एक बेहद ही सनसनीखेज और धार्मिक जगत को झकझोर कर रख देने वाली बड़ी खबर सामने आ रही है, जिसने पूरे देश के श्रद्धालुओं और मंदिर प्रशासकों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। धर्मनगरी के विहंगम नील पर्वत पर विराजमान मां भगवती के सुप्रसिद्ध सिद्धपीठ मनसा देवी मंदिर में सदियों से चली आ रही पूजा-अर्चना, दर्शन लाभ और भक्तों द्वारा चढ़ाए जाने वाले पावन प्रसाद के नियमों में एक बहुत ही युगांतकारी और कड़ा बदलाव लागू कर दिया गया है। मंदिर प्रशासन द्वारा उठाए गए इस अप्रत्याशित और सख्त कदम के तहत अब यहां आने वाली किसी भी महिला श्रद्धालु को कोई भी व्यक्ति या अन्य दर्शनार्थी किसी भी परिस्थिति में शारीरिक रूप से स्पर्श नहीं कर सकेगा। सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि अक्सर धार्मिक स्थलों पर आशीर्वाद देने की आड़ में महिला भक्तों को छूने की कोशिश करने वाले पुजारियों पर भी अब प्रशासन की पैनी नजर रहेगी और ऐसे किसी भी कृत्य को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया गया है। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के सर्वोच्च पदाधिकारी होने के साथ-साथ मां मनसा देवी मंदिर ट्रस्ट के शक्तिशाली अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाल रहे श्रीमहंत रविंद्रपुरी महाराज ने इस पूरे मामले को अत्यंत गंभीरता से लेते हुए बेहद स्पष्ट, दो-टूक और कड़े निर्देश जारी कर दिए हैं, जिससे पूरे मंदिर परिसर के सेवादारों और पुजारियों के बीच अचानक से हड़कंप की स्थिति पैदा हो गई है।

धार्मिक मर्यादा को तार-तार होने से बचाने के लिए उठाए गए इस बेहद ही साहसिक और कड़े कदम की कमान खुद संभालते हुए श्रीमहंत रविंद्रपुरी महाराज ने दो-टूक शब्दों में चेतावनी जारी की है कि गर्भगृह या मंदिर परिसर का कोई भी मुख्य अथवा सहायक पुजारी किसी भी महिला श्रद्धालु या आम भक्तों को आशीर्वाद प्रदान करने के बहाने से बिल्कुल भी छुएगा नहीं। उन्होंने इस व्यवस्था को तत्काल प्रभाव से लागू करते हुए साफ कर दिया है कि यदि भविष्य में किसी भी कोने से या किसी भक्त के माध्यम से इस तरह की अशोभनीय हरकत की कोई भी प्रामाणिक शिकायत सामने आती है, तो बिना कोई स्पष्टीकरण मांगे संबंधित दोषी पुजारी को तत्काल प्रभाव से मंदिर की सभी धार्मिक सेवाओं से दूध में से मक्खी की तरह बाहर निकाल फेंका जाएगा। इसके साथ ही मंदिर में चढ़ावे के नाम पर चलने वाले पुराने ढर्रे को पूरी तरह से ध्वस्त करते हुए प्रशासन ने यह भी कड़ा नियम बना दिया है कि भक्तों द्वारा माता के चरणों में अर्पित किया गया कोई भी नारियल, पावन फूल या अन्य किसी भी प्रकार की खाद्य सामग्री का प्रसाद, दोबारा किसी अन्य श्रद्धालु के माध्यम से गर्भगृह में नहीं पहुंचाया जा सकेगा। मंदिर में प्रतिदिन टनों की संख्या में एकत्रित होने वाले इन नारियलों के सदुपयोग के लिए एक बेहद आधुनिक और अनूठी योजना तैयार की गई है, जिसके तहत इन सभी नारियलों को मंदिर की सीमा के भीतर ही पूरी तरह से रिसाइकिल यानी पुनर्चक्रित करके अन्य उपयोगी सामग्रियों में तब्दील कर दिया जाएगा।

सनातन धर्म की पवित्रता और देवस्थानों की गिरती साख पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए इस ऐतिहासिक फैसले के पीछे की मुख्य वजहों पर से पर्दा उठाते हुए श्रीमहंत रविंद्रपुरी महाराज ने बड़े ही बेबाक अंदाज में कहा कि अक्सर देश के विभिन्न कोनों में स्थित कुछ बड़े और नामचीन मंदिरों से पुजारियों द्वारा भोली-भाली महिला श्रद्धालुओं को अवांछित रूप से स्पर्श करने की शर्मनाक और विचलित कर देने वाली शिकायतें लगातार आती रहती हैं, जो कि पूरी मानवता और सनातन संस्कृति के लिए अत्यंत ही निंदनीय और दुखद पहलू है। उन्होंने अत्यंत कड़े लहजे में कहा कि किसी भी पावन देवालय की सदियों पुरानी गरिमा, उसकी पवित्र मर्यादा और दूर-दराज से आने वाले करोड़ों श्रद्धालुओं की अटूट धार्मिक भावनाओं का सम्मान करना हर एक सेवादार के लिए सर्वोपरि और अनिवार्य कर्तव्य होना चाहिए। नील पर्वत पर स्थित इस पावन दरबार में आने वाले तमाम भक्त अपने घरों से मीलों दूर का सफर तय करके पूर्ण आस्था, अगाध श्रद्धा और एक गहरे विश्वास के साथ मां भगवती के दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं, ताकि उन्हें मानसिक शांति मिल सके। ऐसे में किसी भी धार्मिक स्थल पर आस्था की आड़ में पुजारियों या किसी भी अन्य व्यक्ति द्वारा किया जाने वाला किसी भी प्रकार का अनुचित आचरण, अशोभनीय व्यवहार या अमर्यादित कृत्य किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और ऐसे तत्वों के खिलाफ कानूनन और प्रशासनिक स्तर पर सबसे कठोरतम दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।

मंदिर की सुरक्षा व्यवस्था को चाक-चौबंद करने और महिलाओं के सम्मान की रक्षा को अपनी सबसे पहली प्राथमिकता घोषित करते हुए ट्रस्ट के अध्यक्ष ने यह साफ कर दिया है कि मंदिर प्रशासन अब श्रद्धालुओं की सुरक्षा, उनके मान-सम्मान और गरिमा को सर्वोच्च पायदान पर रख रहा है। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए परिसर में तैनात सभी छोटे-बड़े पुजारियों और कर्मचारियों को बेहद अनुशासित और मर्यादित व्यवहार करने के सख्त और लिखित निर्देश थमा दिए गए हैं ताकि कोई भी अपनी लक्ष्मण रेखा को लांघने का दुस्साहस न कर सके। उन्होंने गर्व के साथ इस बात का उल्लेख भी किया कि मां मनसा देवी का यह पावन सिद्धपीठ केवल उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व और देश भर के करोड़ों सनातनी श्रद्धालुओं की अटूट आस्था और अटूट विश्वास का एक बहुत ही प्रमुख और जाग्रत केंद्र है। यहां कदम रखने वाले प्रत्येक भक्त को, चाहे वह अमीर हो या गरीब, पुरुष हो या महिला, एक पूरी तरह से सुरक्षित, भयमुक्त और अत्यंत सम्मानजनक वातावरण मिलना ही चाहिए, जो कि उनका बुनियादी अधिकार भी है। मंदिर की प्राचीन गौरवशाली परंपराओं, वैदिक रीति-रिवाजों और आवश्यक धार्मिक मर्यादाओं का अक्षरशः पालन करना इस परिसर में रहने वाले सभी लोगों के लिए पूरी तरह से अनिवार्य होगा और यदि किसी भी भक्त के साथ कोई अभद्रता होती है, तो उस शिकायत को सर्वोच्च प्राथमिकता के साथ गंभीरता से लेते हुए तत्काल और ऑन-द-स्पॉट सख्त एक्शन लिया जाएगा।

इस पूरे क्रांतिकारी बदलाव की गहराइयों को आम जनता और मीडिया के सामने और अधिक स्पष्ट करते हुए पूज्य श्रीमहंत रविंद्रपुरी महाराज ने एक बहुत ही तार्किक और आंखें खोल देने वाली बात बताई कि मंदिर की चौखट पर माथा टेकने आने वाले करोड़ों भक्तों की असली और सच्ची आस्था केवल और केवल साक्षात मां मनसा देवी के चरणों में है, न कि वहां पूजा कराने वाले किसी साधारण पुजारी या पंडों में। इसलिए अब से यह नई और पारदर्शी व्यवस्था लागू की जा रही है कि जो कोई भी श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए मंदिर की मुख्य कतार में आएगा, पुजारी केवल उससे पूजा की थाली और प्रसाद को ससम्मान अपने हाथों में स्वीकार करेंगे और उसे पूरी मर्यादा के साथ मां भगवती के चरणों में स्पर्श कराकर तुरंत ही वापस उस भक्त को सौंप देंगे। भक्तों को आशीर्वाद देने की इस नई प्रक्रिया में अब शरीर को स्पर्श करने की रूढ़िवादी और विवादास्पद प्रथा को पूरी तरह से विदा कर दिया गया है और इसकी जगह पर पुजारियों को केवल दूर से मंत्रोच्चारण करने और भक्तों के माथे पर पूरी पवित्रता के साथ केवल रोली-चंदन का पावन टीका लगाने की ही अनुमति प्रदान की गई है, जिससे शारीरिक संपर्क की संभावना को जड़ से ही खत्म किया जा सके।

चढ़ावे के नाम पर मंदिर परिसरों में होने वाले बड़े व्यापारिक खेल और भ्रष्टाचार की जड़ों पर कड़ा प्रहार करते हुए श्रीमहंत रविंद्रपुरी महाराज ने मंदिर में भारी मात्रा में चढ़ाए जाने वाले श्रीफलों यानी नारियलों के एक बहुत ही बेहतर, पारदर्शी और कुशल प्रबंधन के लिए उन्हें आधुनिक तकनीकों के माध्यम से रिसाइकिल करने के बेहद कड़े निर्देश जारी कर दिए हैं। उन्होंने इस कड़वी सच्चाई को उजागर करते हुए कहा कि इस पावन सिद्धपीठ में प्रतिदिन हजारों-लाखों की संख्या में देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालु बड़ी ही श्रद्धा के साथ माता रानी को नारियल अर्पित करते हैं, ऐसे में उन तमाम चढ़ाए गए नारियलों का एक बहुत ही व्यवस्थित और धार्मिक रूप से उचित उपयोग होना बेहद आवश्यक है। अक्सर इस तरह के बड़े मंदिरों में यह एक बेहद ही घृणित और अवांछनीय खेल देखा जाता है कि कुछ असामाजिक और लालची प्रवृत्ति के लोग मंदिर में एक बार चढ़ाए गए नारियल को पिछले रास्ते से दोबारा दुकानदारों को बेहद कम दामों में फिर से बेच देते हैं और वही पुराना नारियल घूम-फिरकर बार-बार नए श्रद्धालुओं के माध्यम से मंदिर के भीतर चढ़ाया जाता रहता है। ठीक इसी प्रकार का एक बहुत बड़ा और अपवित्र चक्र मंदिर में चढ़ाए जाने वाले ताजे फूलों और गेंदे की मालाओं के साथ भी लगातार चलता रहता है, जिससे आस्था के नाम पर केवल व्यापार फलता-फूलता है।

धार्मिक आस्था के इस बाजारीकरण और खिलवाड़ को हमेशा-हमेशा के लिए समाप्त करने के उद्देश्य से अध्यक्ष महोदय ने आनन-फानन में एक उच्च स्तरीय और जवाबदेह विशेष कमेटी का गठन कर दिया है और इस कमेटी को यह कड़े निर्देश दिए हैं कि वे मंदिर परिसर के भीतर और बाहर की सभी गतिविधियों पर चौबीसों घंटे अपनी पैनी नजर बनाए रखें। इस नवगठित कमेटी को यह सुनिश्चित करने की बड़ी जिम्मेदारी दी गई है कि मंदिर में एक बार श्रद्धापूर्वक चढ़ाया गया कोई भी पावन प्रसाद, फूल या नारियल किसी भी चोर रास्ते से दोबारा बाजार में दुकानदारों द्वारा कतई न बेचा जा सके और न ही कोई उसका दुरुपयोग कर पाए। उन्होंने बेहद कड़े और भावुक शब्दों में कहा कि जो महाप्रसाद एक बार जगदंबा के चरणों में अर्पित होकर लोक-कल्याण के लिए समर्पित हो गया, उसे दोबारा मुनाफे के लिए बेचना और फिर से मंदिर के गर्भगृह में चढ़ाना, सीधे तौर पर करोड़ों भक्तों की पवित्र आस्था और सनातन धर्म के सिद्धांतों के खिलाफ एक बहुत बड़ा पाप और घोर अपराध है। इन तमाम अनैतिक और अमर्यादित गतिविधियों पर पूरी तरह से पूर्णविराम लगाने के लिए और सिद्धपीठ की दिव्यता को बनाए रखने के लिए मंदिर प्रशासन द्वारा कई बेहद ही अभूतपूर्व, सख्त और ऐतिहासिक कदमों को धरातल पर पूरी ताकत के साथ उतार दिया गया है, जिसकी चारों तरफ सराहना हो रही है।

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