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उत्तराखंडी संस्कृति के अनमोल रंगों से सजी फिल्म ऐना के भावुक टाइटल सॉन्ग ने जीता सबका दिल

अजय ढौंडियाल और स्वर्गीय दीवान कनवाल की जादुई आवाज़ ने पहाड़ के संघर्षपूर्ण जीवन और नैसर्गिक सौंदर्य को सुरों में पिरोकर हर किसी की आँखें नम कर दी हैं जो अब सोशल मीडिया पर तहलका मचा रहा है।

उत्तराखण्ड। हिमालय की कंदराओं से निकलती लोक संगीत की मधुर तान जब आधुनिक सिनेमा के पर्दे पर उतरती है, तो वह केवल मनोरंजन नहीं बल्कि एक जीवंत दस्तावेज बन जाती है। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उत्तराखंड की माटी की खुशबू से सराबोर फिल्म ‘ऐना’ का बहुप्रतीक्षित टाइटल सॉन्ग आज सार्वजनिक कर दिया गया है, जिसने रिलीज होते ही सोशल मीडिया और संगीत प्रेमियों के दिलों में अपनी एक अमिट छाप छोड़ दी है। इस गीत की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सरलता और वह मार्मिकता है, जो सीधे तौर पर पहाड़ के दुर्गम जीवन और वहां की नैसर्गिक सुंदरता के बीच छिपे संघर्ष को बयां करती है। देवभूमि की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का जो प्रयास इस फिल्म के माध्यम से किया गया है, उसकी पहली झलक इस शीर्षक गीत में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। श्रोताओं का कहना है कि यह गीत केवल कानों को सुकून नहीं देता, बल्कि आंखों के सामने उत्तराखंड के उन ऊंचे-नीचे रास्तों, गदेरों और बांज-बुरांश के जंगलों की एक सजीव तस्वीर खड़ी कर देता है, जिन्हें हम अक्सर अपनी भागदौड़ भरी जिंदगी में पीछे छोड़ आए हैं।

पहाड़ी जीवन के अनकहे दर्द और वहां की निश्छल मुस्कुराहट को स्वर देने का काम इस बार गायक अजय ढौंडियाल और संगीत जगत के अविस्मरणीय व्यक्तित्व स्वर्गीय दीवान कनवाल ने किया है। इन दोनों दिग्गजों की जुगलबंदी ने इस रचना में एक ऐसी रूहानी गहराई भर दी है, जिसे सुनकर किसी भी संवेदनशील व्यक्ति की आंखें नम होना स्वाभाविक है। स्वर्गीय दीवान कनवाल की आवाज में जो एक विशेष प्रकार का ठहराव और पहाड़ की मिट्टी की सोंधी महक है, उसे अजय ढौंडियाल ने अपनी आधुनिक गायन शैली के साथ बड़ी खूबसूरती से पिरोया है। यह गीत उत्तराखंड के उन तमाम प्रवासियों के लिए एक भावनात्मक सेतु का कार्य कर रहा है, जो रोजगार की तलाश में अपने गांव-घर से दूर महानगरों में बस गए हैं। गीत की हर धुन में एक पुकार है, जो अपनी जड़ों की ओर वापस लौटने की प्रेरणा देती है। दर्शकों ने इस गीत को जिस तरह से हाथों-हाथ लिया है, उससे यह साफ हो गया है कि आज भी लोक संगीत की मौलिकता में वह शक्ति है जो बड़े-बड़े बॉलीवुड गानों को पीछे छोड़ सकती है।

गीत के शब्दों और उसके फिल्मांकन में पहाड़ी जीवन के उन सूक्ष्म पहलुओं को उकेरा गया है, जिन्हें अक्सर मुख्यधारा के सिनेमा में नजरअंदाज कर दिया जाता है। गीत की पंक्तियों में गोधूलि बेला का जिक्र, खेतों में काम करती महिलाओं का श्रम और पशुपालन के जरिए जीवनयापन करने वाले ग्रामीणों की जीवटता को बड़ी शिद्दत से पिरोया गया है। “झाल दिन गोधार मा प्या खुली का तारमान दिनन है…” जैसी पंक्तियां केवल शब्द नहीं हैं, बल्कि ये उस दैनिक दिनचर्या का हिस्सा हैं जहां धूप की पहली किरण से लेकर शाम के धुंधलके तक पहाड़ का इंसान प्रकृति से जूझता भी है और उसे प्रेम भी करता है। ‘ऐना’ फिल्म का यह शीर्षक गीत हमें उस सादगी की याद दिलाता है, जहां रोटी का स्वाद चूल्हे की आग और अपनों के साथ में बसा होता है। गीत के दृश्यों में जिस तरह से गैया-बछड़ों (गोरु) के साथ चरवाहों का संवाद और घने वनों (घन बन) के बीच की शांति को दिखाया गया है, वह उत्तराखंड की असली पहचान को वैश्विक स्तर पर प्रस्तुत करने का एक साहसिक कदम है।

फिल्म के इस संगीत में केवल विरह नहीं है, बल्कि इसमें एक ऐसी ममता और स्नेह का अहसास भी है जो केवल पहाड़ की वादियों में ही मिल सकता है। “सागर रे ममता तेरी इसकी लपख मेरी…” जैसे बोल मां की ममता और जन्मभूमि के प्रति उस अगाध प्रेम को दर्शाते हैं, जो किसी भी धन-दौलत से ऊपर है। संगीतकारों ने पारंपरिक वाद्य यंत्रों का जो कुशलतापूर्वक प्रयोग किया है, वह गीत की आत्मा को और अधिक प्रगाढ़ बना देता है। इस भावनात्मक सफर में ‘ऐना’ का नायक अपने अतीत और वर्तमान के बीच एक ऐसा संतुलन बनाने की कोशिश करता है, जो दर्शकों को अपनी स्वयं की कहानी लगने लगती है। गीत में प्रयुक्त स्थानीय शब्दावली जैसे ‘पुलख’, ‘भटटनी’ और ‘किसानता’ इसे एक क्षेत्रीय पहचान तो देती ही है, साथ ही यह भाषा के संरक्षण की दिशा में भी एक बड़ा योगदान है। दर्शकों के बीच इस गीत की लोकप्रियता का एक मुख्य कारण यह भी है कि इसमें वास्तविकता का पुट है, कोई बनावटीपन नहीं है, जिससे आम पहाड़ी जनमानस खुद को सीधे तौर पर जुड़ा हुआ महसूस कर रहा है।

सिनेमाई दृष्टि से देखा जाए तो ‘ऐना’ का यह टाइटल ट्रैक उत्तराखंडी फिल्म उद्योग के लिए एक मील का पत्थर साबित हो सकता है। फिल्म के निर्देशक और तकनीकी टीम ने जिस बारीकी से पहाड़ की छोटी-छोटी बारीकियों को कैमरे में कैद किया है, वह काबिले तारीफ है। चाहे वह कोहरे से ढकी चोटियां हों या फिर घर के आंगन में फैला सन्नाटा, हर फ्रेम एक कहानी कहता है। इस गीत के माध्यम से यह संदेश देने का प्रयास किया गया है कि विकास की इस अंधी दौड़ में हमें अपनी संस्कृति और उन पुराने रास्तों को नहीं भूलना चाहिए जिन्होंने हमें पहचान दी है। “देखी देखी है ना मननी छ ख वि देखी है ना…” की गूंज दर्शकों के अंतर्मन को झकझोर देती है, जिससे एक सुखद अहसास और एक गहरी कसक एक साथ पैदा होती है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर लोग इस गाने को साझा करते हुए अपनी यादें ताजा कर रहे हैं और फिल्म की रिलीज का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।

अंततः, फिल्म ‘ऐना’ का यह गीत उत्तराखंड की लोक कला और आधुनिक तकनीक का एक अद्भुत संगम है। गायक अजय ढौंडियाल ने अपनी प्रतिभा से यह सिद्ध कर दिया है कि वे लोक संगीत की विरासत को आगे ले जाने में पूरी तरह सक्षम हैं, वहीं स्वर्गीय दीवान कनवाल की उपस्थिति इस गीत को एक अमर कृति बना देती है। यह केवल एक फिल्म का प्रचार मात्र नहीं है, बल्कि यह देवभूमि की जीवनशैली, उसके संघर्ष, उसकी मर्यादा और उसके असीम सौंदर्य का एक काव्यात्मक उत्सव है। यदि आप भी अपनी जड़ों से जुड़ना चाहते हैं और पहाड़ की उस रूहानी शांति को महसूस करना चाहते हैं, तो यह गीत आपके लिए एक अनिवार्य अनुभव है। फिल्म निर्माताओं को इस साहसिक और भावनात्मक प्रस्तुति के लिए चहुंओर से सराहना मिल रही है, और यह उम्मीद की जा रही है कि पूरी फिल्म भी इसी तरह दर्शकों के दिलों को जीतने में सफल रहेगी। यह गीत आने वाले लंबे समय तक पहाड़ की वादियों और हर उत्तराखंडी की जुबां पर अपनी मधुर उपस्थिति बनाए रखेगा।

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