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जसपुर और काशीपुर में लाइट खरीद के नाम पर हुआ खौफनाक खेल क्या खुलेगा भ्रष्टाचार का काला राज

अंधेरे को चीरती RTI की सनसनीखेज लहर से कांप उठे भ्रष्टाचारी क्या जसपुर और काशीपुर की ग्राम पंचायतों में विकास के नाम पर हुआ करोड़ों का लाइट घोटाला अब अफसरों की गर्दन तक पहुंचेगा।

काशीपुर। जसपुर और काशीपुर क्षेत्र की शांत वादियों में इन दिनों एक ऐसा सियासी और प्रशासनिक तूफान उठा है जिसने सत्ता के गलियारों से लेकर ग्राम पंचायतों की चौपालों तक हलचल पैदा कर दी है। विकास खंड जसपुर और काशीपुर के ग्रामीण अंचलों को रोशनी से जगमगाने के नाम पर जो खेल खेला गया है, उसकी गूंज अब दूर-दूर तक सुनाई दे रही है क्योंकि स्ट्रीट लाइट और सोलर लाइट की खरीद में करोड़ों के गोलमाल की बू आ रही है। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा आग की तरह फैल रही है कि अंधेरे को मिटाने के लिए आए सरकारी बजट को भ्रष्टाचार के अंधेरे ने निगल लिया है, जिससे न केवल जनता के विश्वास को ठेस पहुँची है बल्कि पूरे तंत्र की पारदर्शिता पर भी एक बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा हो गया है। ग्राम पंचायतों में लगी इन लाइटों की चमक जितनी फीकी है, उससे कहीं ज्यादा गहरा इस खरीद प्रक्रिया के पीछे का रहस्य नजर आ रहा है, जिसे सुलझाने के लिए अब स्थानीय जागरूक नागरिक और विपक्षी दल लामबंद होने लगे हैं। इस पूरे प्रकरण ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या वास्तव में विकास कार्यों का लाभ धरातल पर पहुँच रहा है या फिर यह केवल कागजी खानापूर्ति और चंद रसूखदारों की जेबें भरने का जरिया बनकर रह गया है।

मामले की गहराई में उतरें तो पता चलता है कि ग्राम पंचायतों में सोलर और स्ट्रीट लाइट लगाने के नाम पर जो भारी-भरकम बजट आवंटित किया गया था, उसका उपयोग किस तरह किया गया यह अपने आप में एक सस्पेंस फिल्म की तरह उलझा हुआ है। सूत्रों के हवाले से जो चौंकाने वाली जानकारियां सामने आ रही हैं, उनके अनुसार लाइटों की खरीद से लेकर उनके इंस्टालेशन तक में मानकों की जमकर अनदेखी की गई है और कार्य की गुणवत्ता इतनी दोयम दर्जे की है कि कई स्थानों पर उद्घाटन के कुछ समय बाद ही लाइटें शोपीस बनकर रह गई हैं। स्थानीय निवासियों का गुस्सा सातवें आसमान पर है क्योंकि जिन रास्तों को रोशन करने का वादा किया गया था, वहां आज भी शाम ढलते ही सन्नाटा पसर जाता है और जो लाइटें लगी भी हैं, वे केवल सरकारी रिकॉर्ड में चमक रही हैं। भ्रष्टाचार के इस कथित खेल ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर किस आधार पर इन घटिया उपकरणों को पास किया गया और भुगतान की प्रक्रिया इतनी आनन-फानन में कैसे पूरी कर ली गई? क्या यह संभव है कि बिना उच्च अधिकारियों की मौन सहमति के इतना बड़ा अनियमितता का खेल ग्राम पंचायत स्तर पर खेल लिया जाए?

अब इस पूरे रहस्यमयी घोटाले की परतों को उधेड़ने के लिए सूचना के अधिकार यानी आरटीआई का ब्रह्मास्त्र निकाल लिया गया है, जिसने भ्रष्टाचारियों की नींद हराम कर दी है। क्षेत्र के कुछ जुझारू कार्यकर्ताओं और ग्रामीणों ने मोर्चा खोलते हुए आरटीआई के तहत ऐसे तीखे सवाल पूछे हैं जिनका जवाब देना प्रशासन के लिए गले की हड्डी बन गया है। पहले ही कुछ महत्वपूर्ण आवेदन दायर किए जा चुके हैं और अब अतिरिक्त साक्ष्य जुटाने के लिए दस्तावेजों की एक लंबी फेहरिस्त तैयार की जा रही है, जिससे इस खरीद कांड का कच्चा चिट्ठा जनता के सामने आ सके। इन आरटीआई आवेदनों के माध्यम से यह जानने की कोशिश की जा रही है कि लाइटों की खरीद किस कंपनी से की गई, क्या उसके लिए कोई पारदर्शी टेंडर प्रक्रिया अपनाई गई थी या फिर चहेतों को लाभ पहुँचाने के लिए नियमों को ताक पर रख दिया गया। माना जा रहा है कि जैसे ही सरकारी फाइलों के पन्ने बाहर आएंगे, वैसे ही उन चेहरों से नकाब उतर जाएगा जिन्होंने जनता के टैक्स के पैसे पर डाका डाला है और इस पूरे प्रकरण में हुई अवैध वसूली की सच्चाई दुनिया के सामने होगी।

नियमों की धज्जियां उड़ाने का यह सिलसिला यहीं नहीं रुकता, बल्कि इस खरीद प्रक्रिया में अपनाई गई कार्यप्रणाली पर भी गंभीर तकनीकी सवाल खड़े हो रहे हैं जो सीधे तौर पर भ्रष्टाचार की ओर इशारा करते हैं। क्या प्रशासन ने इस बात की पुष्टि की थी कि खरीदी गई लाइटें निर्धारित मानक और वारंटी की शर्तों को पूरा करती हैं या फिर केवल कमीशन के चक्कर में बिना किसी भौतिक सत्यापन के भुगतान कर दिया गया? टेंडर प्रक्रिया की पारदर्शिता पर उठते सवाल यह बताते हैं कि शायद प्रतिस्पर्धा को जानबूझकर खत्म किया गया ताकि एक निश्चित सिंडिकेट को ही यह ठेका मिल सके। गुणवत्ता और मात्रा का सत्यापन न होना इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि विकास खंड जसपुर और काशीपुर के इन विकास कार्यों में जवाबदेही नाम की कोई चीज नहीं बची है। जब नियम केवल कागजों तक सीमित रह जाते हैं और धरातल पर उनकी अनदेखी की जाती है, तो ऐसे ही घोटालों का जन्म होता है जो अंततः सरकार की छवि को धूमिल करते हैं। अब सवाल यह है कि क्या उन जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई होगी जिन्होंने अपनी आंखों पर पट्टी बांधकर इस धांधली को होने दिया?

ग्रामीण इलाकों में इस मुद्दे को लेकर आक्रोश की लहर दौड़ गई है और लोग अब सड़कों पर उतरकर अपने अधिकारों की मांग करने के लिए तैयार हैं। ग्रामीणों का स्पष्ट कहना है कि वे किसी भी कीमत पर भ्रष्टाचार को बर्दाश्त नहीं करेंगे क्योंकि यह उनके गांवों के विकास से जुड़ा सीधा मामला है। सरकारी योजनाओं का लाभ पात्र लोगों तक पहुँचने के बजाय बिचौलियों और भ्रष्ट अधिकारियों की भेंट चढ़ जाना एक पुरानी बीमारी है, लेकिन जसपुर और काशीपुर के लोगों ने अब इस बीमारी का इलाज करने की ठान ली है। गांव के बुजुर्गों से लेकर युवाओं तक का एक ही सवाल है कि जब बजट पूरा था तो काम अधूरा और घटिया क्यों? इस नाराजगी ने अब एक बड़े आंदोलन का रूप लेना शुरू कर दिया है, जिससे स्थानीय राजनीति में भी उबाल आ गया है। जनता की मांग है कि विकास कार्यों में शत-प्रतिशत पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए और भविष्य में ऐसी लूट को रोकने के लिए एक मजबूत निगरानी तंत्र बनाया जाए, ताकि सरकारी धन का सदुपयोग केवल जनहित में ही हो सके।

जैसे-जैसे आरटीआई के माध्यम से नए-नए खुलासे होने की उम्मीद बढ़ रही है, वैसे-वैसे इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष और उच्च स्तरीय जांच की मांग भी तेज होती जा रही है। स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों ने शासन से अपील की है कि एक विशेष टीम का गठन कर इन सभी ग्राम पंचायतों में लगी लाइटों का भौतिक निरीक्षण किया जाए और दोषी पाए जाने वाले प्रत्येक व्यक्ति को सलाखों के पीछे भेजा जाए। यह मामला केवल कुछ लाइटों की खरीद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस पूरे तंत्र की विफलता का प्रतीक है जिसे भ्रष्टाचार का दीमक अंदर ही अंदर खोखला कर रहा है। क्या जिम्मेदार अधिकारी इस प्रकरण में अपनी जवाबदेही तय करेंगे या फिर हमेशा की तरह जांच के नाम पर मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा? बड़ा सवाल यह भी है कि क्या मुख्यमंत्री के ‘भ्रष्टाचार मुक्त उत्तराखंड’ के संकल्प को ये निचले स्तर के अधिकारी अपनी मनमानी से चुनौती दे रहे हैं? आने वाला समय बताएगा कि जसपुर और काशीपुर की ये लाइटें भ्रष्टाचार के काले चेहरों को उजागर कर पाती हैं या फिर सच की रोशनी एक बार फिर फाइलों के अंधेरे में कहीं खो जाती है।

इस पूरे प्रकरण ने लोकतंत्र के उस चौथे स्तंभ को भी झकझोर दिया है जो जनता की आवाज उठाता है, क्योंकि अब यह मीडिया की जिम्मेदारी है कि वह इस महाघोटाले के हर पहलू को बेनकाब करे। लाइट खरीद में हुए इस कथित भ्रष्टाचार ने विकास खंड की कार्यप्रणाली को संदेह के घेरे में खड़ा कर दिया है और अब हर किसी की नजर आने वाली जांच रिपोर्ट पर टिकी है। क्या विभाग उन कंपनियों को ब्लैकलिस्ट करेगा जिन्होंने घटिया माल की आपूर्ति की? क्या उन पैसों की वसूली संभव हो पाएगी जो बिना काम किए डकार लिए गए? भ्रष्टाचार के विरुद्ध छिड़ी यह जंग अब निर्णायक मोड़ पर पहुँच चुकी है और जसपुर-काशीपुर की जनता न्याय की आस में बैठी है। सरकारी धन की एक-एक पाई का हिसाब देना उन अधिकारियों की नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी है जो इन पदों पर बैठकर जनता की सेवा की कसम खाते हैं। अब देखना यह होगा कि आरटीआई के पन्नों से निकलने वाला सच इस भ्रष्टाचार के अंधेरे साम्राज्य को कितनी जल्दी खत्म करता है और क्या वास्तव में दोषियों को उनके किए की सजा मिल पाती है या नहीं।

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