spot_img
दुनिया में जो बदलाव आप देखना चाहते हैं, वह खुद बनिए. - महात्मा गांधी
Homeउत्तराखंडचार पदों की सौगात फिर भी सन्नाटा महानगर कांग्रेस की खामोशी ने...

चार पदों की सौगात फिर भी सन्नाटा महानगर कांग्रेस की खामोशी ने खोली अंदरूनी कलह की पोल, पूरी कहानी जानने के लिए पढ़ें पूरी खबर…

प्रदेश कार्यकारिणी में काशीपुर को मिली बड़ी हिस्सेदारी के बावजूद स्वागत और अभिनंदन न होने से संगठन की एकजुटता, नेतृत्व की स्वीकार्यता और 2027 की तैयारियों पर उठे तीखे सवाल।

काशीपुर। उत्तराखंड की सियासत में काशीपुर को महज एक विधानसभा क्षेत्र या स्थानीय राजनीतिक केंद्र मानना शायद पूरी तस्वीर को छोटा करके देखने जैसा होगा। यह वह राजनीतिक जमीन है, जहां उठने वाली हलचल अक्सर कुमाऊं की राजनीति से लेकर पूरे प्रदेश के सत्ता समीकरणों तक असर डालती है। ऐसे में हाल ही में कांग्रेस की प्रांतीय कार्यकारिणी में काशीपुर को मिली चार महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों के बाद जिस तरह का राजनीतिक माहौल दिखाई दे रहा है, उसने उपलब्धि से ज्यादा संगठनात्मक खामोशी को चर्चा का विषय बना दिया है। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी और प्रदेश नेतृत्व ने काशीपुर के राजनीतिक प्रभाव, संगठनात्मक क्षमता और जमीनी आधार को महत्व देते हुए एक पुरुष उपाध्यक्ष, एक महिला उपाध्यक्ष, एक पुरुष सचिव और एक महिला सचिव को प्रदेश संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दीं। चार पद, चार चेहरे और काशीपुर के लिए प्रदेश संगठन में इतनी बड़ी हिस्सेदारी सामान्य परिस्थितियों में कांग्रेस कार्यकर्ताओं के लिए गर्व, उत्साह और जश्न का कारण बननी चाहिए थी। मगर तस्वीर ऐसी नहीं दिखी। सबसे ज्यादा निगाहें काशीपुर महानगर कांग्रेस पर टिक गईं, जहां इन नियुक्तियों के बाद अपेक्षित उत्साह, सामूहिक स्वागत और अभिनंदन का वह माहौल नजर नहीं आया, जिसकी राजनीतिक तौर पर उम्मीद की जा रही थी। सवाल इसलिए बड़ा है क्योंकि मुद्दा केवल स्वागत समारोह का नहीं, बल्कि उस राजनीतिक संदेश का है जो महानगर कांग्रेस की चुप्पी जनता के बीच पहुंचा रही है। क्या चार अहम पद मिलने के बाद भी संगठन के भीतर खुशी का साझा भाव पैदा नहीं हो पाया? क्या प्रदेश नेतृत्व के फैसले और महानगर कांग्रेस की सोच के बीच कोई अदृश्य दीवार खड़ी है? या फिर मामला उससे कहीं ज्यादा गहरा है, जिसकी परतें अब धीरे-धीरे सामने आ रही हैं?

काशीपुर महानगर कांग्रेस के सामने इस समय सबसे बड़ा संकट शायद विपक्षी दल से मुकाबले का नहीं, बल्कि अपने ही संगठनात्मक घर को व्यवस्थित करने का दिखाई दे रहा है। प्रदेश कार्यकारिणी में चार महत्वपूर्ण पदों की घोषणा को कांग्रेस के लिए राजनीतिक ताकत में बदलने का अवसर माना जाना चाहिए था। महानगर कांग्रेस चाहती तो एक भव्य स्वागत कार्यक्रम आयोजित कर सकती थी, चारों नवनियुक्त पदाधिकारियों को एक मंच पर खड़ा कर सकती थी, वरिष्ठ नेताओं और पुराने कार्यकर्ताओं को साथ बैठाकर यह संदेश दे सकती थी कि काशीपुर कांग्रेस में मतभेद हो सकते हैं, लेकिन संगठन सर्वोपरि है। मगर जब ऐसी तस्वीर सामने नहीं आती और उसकी जगह चुप्पी दिखाई देती है, तो राजनीतिक सवाल पैदा होना स्वाभाविक है। यह चुप्पी क्या महज संयोग है या संगठन के भीतर असंतोष का संकेत? क्या महानगर कांग्रेस प्रदेश नेतृत्व द्वारा किए गए चयन को पूरी राजनीतिक आत्मीयता के साथ स्वीकार कर पाई है? अगर स्वीकार किया है तो फिर चारों पदाधिकारियों को सार्वजनिक रूप से बधाई देने और सम्मानित करने में ऐसी बेरुखी क्यों दिखाई दी? राजनीति में प्रतीक बहुत मायने रखते हैं। एक माला, एक मंच, एक सामूहिक तस्वीर और एक साझा बयान कई बार संगठन के भीतर की दूरी मिटाने का काम कर सकते हैं। लेकिन यहां तो तस्वीर ही उलट नजर आ रही है। जिस नियुक्ति को काशीपुर कांग्रेस की उपलब्धि बनना चाहिए था, वही अब महानगर संगठन की कार्यशैली पर सवालों की वजह बन गई है।

पहला बड़ा सवाल महानगर कांग्रेस से यही है कि जब काशीपुर को प्रदेश संगठन में चार महत्वपूर्ण पद मिले, तो इन चारों नवनियुक्त पदाधिकारियों के स्वागत और अभिनंदन में महानगर कांग्रेस की सामूहिक पहल कहां गायब हो गई? यह सवाल किसी व्यक्ति विशेष के सम्मान का नहीं, बल्कि पूरे संगठन की राजनीतिक मर्यादा और सामूहिक जिम्मेदारी का है। यदि राष्ट्रीय और प्रदेश नेतृत्व ने काशीपुर से चार नेताओं को महत्वपूर्ण दायित्व सौंपे हैं तो महानगर संगठन को इस निर्णय को अपनी ताकत के रूप में पेश करना चाहिए था। आखिर प्रदेश में काशीपुर की हिस्सेदारी बढ़ना किसी एक नेता की निजी उपलब्धि नहीं, बल्कि पूरे शहर के कांग्रेस संगठन के लिए सम्मान की बात है। यदि महानगर कांग्रेस के पास कार्यक्रम आयोजित करने का समय नहीं था तो क्या एक संयुक्त प्रेस बयान जारी नहीं किया जा सकता था? क्या चारों पदाधिकारियों को एक साथ बधाई देने के लिए कार्यकर्ताओं को नहीं जुटाया जा सकता था? क्या महानगर के वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी में एक साझा संदेश नहीं दिया जा सकता था? राजनीति में जब किसी पार्टी को अपने ही लोगों की उपलब्धियों पर सार्वजनिक खुशी जाहिर करने में संकोच होने लगे, तब सवाल केवल कार्यक्रम का नहीं रहता, बल्कि संगठनात्मक मानसिकता का बन जाता है। यही वजह है कि काशीपुर की राजनीतिक फिजा में अब यह चर्चा तेज है कि आखिर वह कौन-सी मजबूरी है जिसने महानगर कांग्रेस को ऐसी महत्वपूर्ण नियुक्तियों पर भी खुलकर जश्न मनाने से रोक दिया?

दूसरा सवाल इससे भी ज्यादा तीखा है कि क्या काशीपुर महानगर कांग्रेस और प्रदेश नेतृत्व के बीच सब कुछ सामान्य है, या फिर चार नियुक्तियों के पीछे संगठनात्मक असहमति की कोई ऐसी कहानी है जिसे सार्वजनिक नहीं किया जा रहा? राजनीतिक दलों में मतभेद असामान्य नहीं हैं। हर पार्टी में अलग-अलग विचार, नेतृत्व की महत्वाकांक्षाएं और संगठनात्मक प्राथमिकताएं होती हैं। लेकिन जब राष्ट्रीय और प्रदेश स्तर से कोई फैसला सामने आता है तो अनुशासित राजनीतिक संगठन उससे सामंजस्य बैठाने की कोशिश करते हैं। असहमति हो सकती है, लेकिन संगठनात्मक निर्णय को सार्वजनिक रूप से सम्मान देना राजनीतिक परिपक्वता का हिस्सा माना जाता है। काशीपुर में यदि चार पद मिलने के बाद भी महानगर स्तर पर सामूहिक उत्साह का अभाव है, तो इससे यह धारणा मजबूत होती है कि कहीं न कहीं संगठन के भीतर फैसलों को लेकर खिंचाव मौजूद है। यदि ऐसा नहीं है तो महानगर कांग्रेस को स्वयं आगे आकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। आखिर कार्यकर्ताओं और जनता को यह जानने का अधिकार है कि प्रदेश में काशीपुर का कद बढ़ने के बावजूद स्थानीय संगठन की प्रतिक्रिया इतनी ठंडी क्यों रही? क्या स्थानीय नेतृत्व को इन नियुक्तियों से कोई शिकायत है? क्या चयन प्रक्रिया को लेकर कोई असंतोष है? या फिर यह केवल कार्यक्रम न होने का मामला है? जब सवाल लगातार उठ रहे हों, तब चुप्पी जवाब नहीं बन सकती।

काशीपुर महानगर कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह अपने भीतर मौजूद कथित खेमेबाजी की चर्चाओं को किस तरह समाप्त करती है। राजनीति में संगठन तभी मजबूत दिखाई देता है जब अलग-अलग विचारधाराओं और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के बावजूद सभी नेता एक साझा लक्ष्य के लिए साथ खड़े होते हैं। लेकिन यदि पार्टी के भीतर ही पद, प्रभाव, पहचान और राजनीतिक भविष्य को लेकर खींचतान शुरू हो जाए तो संगठन का मूल ढांचा कमजोर पड़ने लगता है। आज काशीपुर में जिस तरह महानगर कांग्रेस को लेकर सवाल उठ रहे हैं, उसका सीधा संबंध इसी धारणा से जोड़ा जा रहा है। चार पदाधिकारी प्रदेश संगठन में पहुंचे हैं, मगर क्या महानगर कांग्रेस उनके साथ उसी आत्मीयता से खड़ी है? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 2027 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए निर्णायक परीक्षा बनने वाला है। पार्टी यदि सत्ता में वापसी का सपना देख रही है तो उसे हर विधानसभा क्षेत्र में मजबूत संगठन की आवश्यकता होगी। बूथ से लेकर महानगर तक कार्यकर्ताओं में उत्साह पैदा करना होगा। लेकिन अगर पद मिलने पर भी पार्टी अपने ही नेताओं को लेकर सामूहिक तस्वीर नहीं बना पाती, तो चुनावी मैदान में वह किस तरह एकजुट होकर जनता के सामने जाएगी? चुनाव केवल भाजपा के खिलाफ नारों से नहीं जीता जाता। चुनाव जीतने के लिए संगठन की प्रत्येक परत को एक-दूसरे पर भरोसा करना पड़ता है।

इसी संदर्भ में तीसरा बड़ा सवाल सामने आता है कि जब कांग्रेस 2027 में भाजपा को सत्ता से हटाकर सरकार बनाने का दावा कर रही है, तो क्या वह पहले काशीपुर महानगर के भीतर की कथित दूरी, गुटबाजी और आपसी खींचतान को खत्म करने के लिए तैयार है? जनता को महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और महिला सशक्तीकरण जैसे मुद्दों पर कांग्रेस का आंदोलन दिखाई देता है, लेकिन जनता यह भी देखती है कि आंदोलन के दौरान कौन किसके साथ खड़ा है और कौन दूरी बनाए हुए है। राजनीतिक संदेश केवल भाषणों से नहीं बनता, नेताओं के व्यवहार से भी बनता है। यदि कांग्रेस जनता से एकजुट होने की अपील करती है लेकिन स्वयं के नेता एक-दूसरे के साथ सहज नहीं दिखते, तो उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। काशीपुर जैसे महत्वपूर्ण राजनीतिक केंद्र में यह स्थिति कांग्रेस के लिए और भी गंभीर है। यहां संगठन को अपनी ताकत का प्रदर्शन करना चाहिए, कमजोरी का नहीं। अगर कांग्रेस के भीतर कोई मतभेद हैं तो उन्हें बैठकर सुलझाना होगा। व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा को संगठन से ऊपर रखने की प्रवृत्ति पर रोक लगानी होगी। पुराने और नए नेताओं के बीच संवाद बढ़ाना होगा। क्योंकि चुनावी समय में टिकट की दावेदारी, नेतृत्व की खींचतान और व्यक्तिगत समीकरण यदि संगठन से बड़े हो गए तो नुकसान किसी एक नेता का नहीं, पूरी कांग्रेस का होगा।

संगठन की आंतरिक स्थिति का असर मीडिया से रिश्तों पर भी पड़ता दिखाई देने की चर्चाएं हैं। काशीपुर में पत्रकारों के साथ कांग्रेस नेताओं के व्यवहार को लेकर समय-समय पर असंतोष की बातें सामने आती रही हैं। किसी पत्रकार की शिकायत दूसरे पत्रकार से करना, एक पत्रकार को दूसरे के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश करना या वरिष्ठ पत्रकारों की सलाह को सकारात्मक सुझाव के बजाय हस्तक्षेप मान लेना किसी भी राजनीतिक संगठन के लिए आत्मघाती प्रवृत्ति हो सकती है। मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है और राजनीतिक दलों को पत्रकारों से सवाल सुनने, आलोचना स्वीकार करने और तथ्यात्मक जवाब देने की आदत विकसित करनी चाहिए। चौथा बड़ा सवाल महानगर कांग्रेस से यही है कि क्या वह आलोचना और सुझाव में फर्क करना सीखेगी, या फिर हर असहमत आवाज को विरोधी मानकर उससे दूरी बनाती रहेगी? कोई वरिष्ठ पत्रकार यदि पार्टी की कमियां बताता है, संगठन की कमजोरी की ओर ध्यान दिलाता है या भविष्य के लिए सुझाव देता है तो उस पर व्यक्तिगत नाराजगी दिखाने के बजाय कांग्रेस को आत्ममंथन करना चाहिए। पत्रकार का काम केवल प्रशंसा करना नहीं है। वह सवाल करेगा, आईना दिखाएगा और जनता की आवाज उठाएगा। यदि किसी राजनीतिक दल को केवल अनुकूल खबरें चाहिए और असहज सवाल पसंद नहीं हैं, तो यह लोकतांत्रिक संवाद की कमजोरी है। कांग्रेस को यह समझना होगा कि मीडिया से टकराव करके वह अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत नहीं कर सकती।

इसके विपरीत भारतीय जनता पार्टी की संगठनात्मक कार्यशैली काशीपुर कांग्रेस के लिए राजनीतिक सबक बनती दिखाई देती है। भाजपा के भीतर भी मतभेद और महत्वाकांक्षाएं हो सकती हैं, लेकिन संगठनात्मक फैसलों के बाद सार्वजनिक रूप से एकजुटता दिखाने की उसकी क्षमता विपक्ष के सामने स्पष्ट रहती है। नए पदाधिकारियों की नियुक्ति के बाद स्वागत, अभिनंदन, मिठाई वितरण और कार्यकर्ताओं की मौजूदगी के जरिए यह संदेश दिया जाता है कि संगठन व्यक्तिगत समीकरणों से बड़ा है। यही राजनीतिक प्रबंधन चुनाव के समय काम आता है। कांग्रेस के सामने समस्या यह है कि उसे केवल भाजपा की नीतियों की आलोचना नहीं करनी, बल्कि भाजपा की संगठनात्मक ताकत का मुकाबला भी करना है। यदि भाजपा अपने कार्यकर्ताओं को एक मंच पर खड़ा करने में सफल रहती है और कांग्रेस अपने ही नेताओं की उपलब्धियों पर सामूहिक उत्सव नहीं मना पाती, तो अंतर जनता को खुद दिखाई देगा। राजनीति में विरोधी की कमजोरी तलाशना आसान है, लेकिन अपनी कमजोरी पहचानना कठिन। काशीपुर महानगर कांग्रेस को अब इसी कठिन काम की जरूरत है। उसे देखना होगा कि क्या उसकी प्राथमिकता संगठन को मजबूत करना है या व्यक्तिगत राजनीतिक समीकरणों को बचाए रखना। 2027 की लड़ाई में जनता केवल यह नहीं देखेगी कि कौन भाजपा के खिलाफ बोल रहा है, बल्कि यह भी देखेगी कि कौन अपने साथियों को साथ लेकर चल सकता है।

काशीपुर कांग्रेस की रीढ़ माने जाने वाले पुराने, निष्ठावान और जमीन से जुड़े कार्यकर्ताओं की स्थिति भी इस पूरे घटनाक्रम में महत्वपूर्ण है। कोई भी संगठन केवल पदाधिकारियों से नहीं चलता। असली ताकत वे कार्यकर्ता होते हैं जो वर्षों तक बिना पद और प्रचार के पार्टी के लिए मैदान में काम करते हैं। चुनाव के समय बूथ संभालते हैं, मतदाताओं से संपर्क करते हैं, पोस्टर लगाते हैं, बैठकों में भीड़ जुटाते हैं और हार-जीत दोनों में संगठन के साथ खड़े रहते हैं। यदि यही कार्यकर्ता धीरे-धीरे कार्यक्रमों से दूरी बनाने लगें, तो इसे गंभीर चेतावनी के रूप में देखा जाना चाहिए। आज यदि कुछ पुराने कांग्रेसियों के कार्यक्रमों से दूर रहने की चर्चा है तो महानगर नेतृत्व को इसे व्यक्तिगत नाराजगी मानकर नजरअंदाज करने के बजाय संवाद का अवसर समझना चाहिए। उन्हें बुलाना चाहिए, उनकी बात सुननी चाहिए और यह समझना चाहिए कि असंतोष की जड़ कहां है। संगठन में सम्मान केवल पद पाने वालों का नहीं, बल्कि उन लोगों का भी होना चाहिए जिन्होंने वर्षों तक पार्टी का झंडा उठाया है। यदि पुराने कार्यकर्ताओं को लगे कि संगठन में उनकी जरूरत केवल चुनाव के समय पड़ती है, तो उनके भीतर पैदा हुई दूरी भविष्य में वोटों और बूथ प्रबंधन दोनों पर असर डाल सकती है।

पांचवां और सबसे निर्णायक सवाल महानगर कांग्रेस से यह है कि अगर वह अपने ही नेताओं, वरिष्ठ कार्यकर्ताओं और संगठन के अलग-अलग धड़ों को एक मंच पर नहीं ला सकती, तो जनता उसके 2027 में सरकार बनाने के दावे पर भरोसा क्यों करे? यही वह सवाल है जिससे बचना अब संभव नहीं होगा। कांग्रेस के पास जनता के बीच उठाने के लिए अनेक मुद्दे हैं। महंगाई हो, बेरोजगारी हो, भ्रष्टाचार हो, महिलाओं की सुरक्षा और सशक्तीकरण हो या युवाओं के भविष्य का प्रश्न—विपक्ष के पास सरकार को घेरने के लिए पर्याप्त राजनीतिक सामग्री है। लेकिन इन मुद्दों की ताकत तभी बढ़ेगी जब कांग्रेस खुद एक भरोसेमंद और संगठित विकल्प के रूप में सामने आएगी। जनता किसी ऐसे दल को सत्ता सौंपने से पहले कई बार सोचती है जिसके नेता आपस में ही तालमेल नहीं बैठा पा रहे हों। यदि कांग्रेस को लगता है कि जनता उसके साथ है तो उसे सबसे पहले अपने संगठन के भीतर यह भरोसा पैदा करना होगा कि सभी नेता एक-दूसरे के साथ खड़े हैं। चार प्रदेश स्तरीय नियुक्तियां इस दिशा में शानदार अवसर थीं। इन्हें लेकर एक बड़ा संयुक्त कार्यक्रम किया जा सकता था। सभी नेताओं को मंच पर बैठाया जा सकता था। पुराने कार्यकर्ताओं को सम्मान दिया जा सकता था। मीडिया के सामने संयुक्त संदेश दिया जा सकता था। लेकिन यदि अवसर हाथ से निकल गया है तो अभी भी देर नहीं हुई। महानगर कांग्रेस चाहे तो इस कथित दूरी को संवाद और संगठनात्मक एकता के अभियान में बदल सकती है।

अब समय आ गया है कि काशीपुर महानगर कांग्रेस अपने भीतर झांककर देखे कि आखिर वह किस दिशा में जा रही है। प्रदेश संगठन में चार महत्वपूर्ण पद मिलना किसी भी शहर के लिए बड़ी राजनीतिक उपलब्धि है। इसे विवाद, नाराजगी और चुप्पी में बदलने के बजाय संगठन की ताकत में बदला जाना चाहिए। महानगर कांग्रेस को चाहिए कि वह चारों नवनियुक्त पदाधिकारियों के साथ खुले मंच पर संवाद करे, स्वागत-अभिनंदन का आयोजन करे, वरिष्ठ कार्यकर्ताओं को साथ लाए और यह स्पष्ट संदेश दे कि व्यक्तिगत मतभेद संगठन की सामूहिक शक्ति से बड़े नहीं हैं। मीडिया से सम्मानजनक संवाद कायम करना भी उतना ही जरूरी है। पत्रकारों को अपना विरोधी समझना बंद करके उन्हें लोकतांत्रिक संवाद का साझेदार मानना होगा। अगर कोई सवाल असहज है तो उसका जवाब दिया जाए, अगर कोई सुझाव गलत है तो तर्क से खारिज किया जाए, लेकिन व्यक्तिगत हमले और आपसी शिकायतों की राजनीति से संगठन मजबूत नहीं होगा। कांग्रेस यदि वास्तव में 2027 में सत्ता परिवर्तन चाहती है तो उसे काशीपुर से ही एकजुटता का संदेश देना होगा। क्योंकि जिस काशीपुर को वह राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानती है, उसी काशीपुर में संगठनात्मक दरारें बनी रहीं तो प्रदेशव्यापी सत्ता संघर्ष का सपना कमजोर पड़ सकता है।

अंततः काशीपुर की जनता अब केवल भाषण नहीं, राजनीतिक व्यवहार भी देखेगी। चार महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्तियां कांग्रेस के लिए अवसर थीं; अब यह महानगर कांग्रेस पर निर्भर है कि वह उन्हें शक्ति का प्रतीक बनाती है या अंदरूनी खींचतान की कहानी। 2027 का चुनाव अभी सामने है, लेकिन उसकी तैयारी आज से ही तय होगी। कांग्रेस यदि अपने पुराने कार्यकर्ताओं को सम्मान देती है, नए पदाधिकारियों को स्वीकार करती है, प्रदेश नेतृत्व के फैसलों का सम्मान करती है, मीडिया के साथ स्वस्थ संवाद स्थापित करती है और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से ऊपर संगठन को रखती है तो काशीपुर से एक नई राजनीतिक ऊर्जा पैदा हो सकती है। मगर यदि स्वागत की जगह सन्नाटा, संवाद की जगह नाराजगी, संगठन की जगह गुट और जनहित की जगह व्यक्तिगत राजनीति हावी रही तो जनता के सामने सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि जो दल अपना घर नहीं संभाल पा रहा, वह प्रदेश कैसे संभालेगा? अब गेंद महानगर कांग्रेस के पाले में है। उसे तय करना है कि वह 2027 के रण में एकजुट कांग्रेस के रूप में उतरना चाहती है या फिर चुनाव से पहले ही अपने भीतर की दरारों की राजनीतिक कीमत चुकाने को तैयार है। काशीपुर में उठ रहे ये सवाल केवल कांग्रेस के भीतर की बहस नहीं हैं; आने वाले चुनाव में ये उसकी राजनीतिक विश्वसनीयता का पैमाना भी बन सकते हैं।

संबंधित ख़बरें
स्वच्छ, सुंदर और विकसित काशीपुर के संकल्प संग गणतंत्र दिवस

लेटेस्ट

ख़ास ख़बरें

error: Content is protected !!