काशीपुर। हल्द्वानी में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की प्रस्तावित रैली के दौरान कांग्रेस कार्यकर्ताओं और पुलिस-प्रशासन के बीच कथित नोकझोंक को लेकर काशीपुर में सियासी पारा चढ़ गया। आठ अगस्त को हल्द्वानी के रामलीला ग्राउंड में आयोजित कार्यक्रम को लेकर कांग्रेस कार्यकर्ताओं का आरोप है कि रैली में शामिल होने जा रहे पार्टी नेताओं और समर्थकों को रास्ते में रोकने तथा उनकी बसों को रोककर कार्यक्रम में पहुंचने में बाधा डालने का प्रयास किया गया। इसी घटनाक्रम से नाराज काशीपुर महानगर कांग्रेस कमेटी के कार्यकर्ताओं और नेताओं ने महाराणा प्रताप चौक पर जोरदार प्रदर्शन करते हुए सरकार के खिलाफ नारेबाजी की और पुतला दहन किया। प्रदर्शन के दौरान कांग्रेस कार्यकर्ताओं के हाथों में पार्टी के झंडे और सरकार विरोधी तख्तियां दिखाई दीं। जैसे-जैसे कार्यकर्ताओं की संख्या बढ़ती गई, चौक का माहौल भी राजनीतिक नारों से गूंजने लगा। कांग्रेस नेताओं ने पूरे घटनाक्रम को लोकतांत्रिक अधिकारों से जोड़ते हुए पुलिस-प्रशासन की भूमिका पर सवाल खड़े किए। उनका कहना था कि किसी राजनीतिक दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष के कार्यक्रम में शामिल होने के लिए जा रहे कार्यकर्ताओं और नेताओं को रोकना लोकतांत्रिक व्यवस्था की भावना के विपरीत है। प्रदर्शनकारियों ने स्पष्ट किया कि उनका विरोध केवल किसी एक घटना तक सीमित नहीं है, बल्कि वे राजनीतिक कार्यक्रमों में विपक्षी दलों के साथ कथित भेदभावपूर्ण व्यवहार के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। पुतला दहन के दौरान कार्यकर्ताओं में खासा आक्रोश नजर आया और नेताओं ने चेतावनी दी कि यदि ऐसे घटनाक्रम दोहराए गए तो कांग्रेस आंदोलन को और व्यापक स्वरूप देने से पीछे नहीं हटेगी।
प्रदेश उपाध्यक्ष अनुपम शर्मा ने प्रदर्शन के दौरान आरोप लगाया कि हल्द्वानी में कांग्रेस की रैली को कमजोर करने और उसमें लोगों की भागीदारी प्रभावित करने के लिए भारतीय जनता पार्टी की ओर से कथित तौर पर ऐसे प्रयास किए गए, जिनमें पार्टी कार्यकर्ताओं को लेकर जा रही बसों को रोकने की कोशिश शामिल थी। उन्होंने दावा किया कि पुलिस-प्रशासन की कार्रवाई से कांग्रेस कार्यकर्ताओं में नाराजगी पैदा हुई और उनके अनुसार उधम सिंह नगर के एसपी तथा भारतीय जनता पार्टी के जिला अध्यक्ष की भूमिका को लेकर भी सवाल उठते हैं। अनुपम शर्मा ने कहा कि कांग्रेस कार्यकर्ता इस पूरे घटनाक्रम को लेकर चुप नहीं बैठेंगे और इसी आक्रोश के चलते महाराणा प्रताप चौक पर सरकार का पुतला दहन किया गया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुट चुकी है और पार्टी जनता के बीच लगातार जा रही है। उनके अनुसार जब विपक्ष अपनी राजनीतिक गतिविधियां तेज करता है और उसके कार्यक्रमों में बड़ी संख्या में लोग शामिल होते हैं, तो उसे रोकने के बजाय लोकतांत्रिक तरीके से कार्यक्रम संपन्न होने देना चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि कांग्रेस कार्यकर्ताओं को रैली में जाने से रोका जाएगा तो उनके सामने विरोध दर्ज कराने के अलावा क्या विकल्प बचेगा। अनुपम शर्मा ने कहा कि कार्यकर्ता सड़क पर इसलिए आए हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि उनकी राजनीतिक गतिविधियों और आवाज को प्रभावित करने का प्रयास किया गया। हालांकि पुलिस-प्रशासन या भाजपा की ओर से इन आरोपों पर कोई पक्ष यहां प्रस्तुत नहीं किया गया, इसलिए कांग्रेस नेताओं के आरोपों को उनके दावों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
प्रदेश सचिव संदीप सेघल ने प्रदर्शन को संबोधित करते हुए हल्द्वानी की घटना पर बेहद तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने आरोप लगाया कि जिस तरह कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं को रैली में जाने से रोकने की कोशिश की गई, वह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है। संदीप सेघल ने कहा कि देश आजादी से पहले और आजादी के बाद भी राजनीतिक विरोध और प्रशासनिक कार्रवाई के कई दौर देख चुका है, लेकिन उनके अनुसार हल्द्वानी में जो परिस्थितियां बनीं, वे बेहद दुर्भाग्यपूर्ण थीं। उन्होंने कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को वरिष्ठ और सम्मानित नेता बताते हुए कहा कि उनके आगमन के बाद कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ कथित तौर पर जिस तरह का व्यवहार किया गया, उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। संदीप सेघल ने कहा कि सरकारें बदलती रहती हैं और राजनीतिक सत्ता स्थायी नहीं होती, लेकिन नागरिकों का अपनी बात रखने और अपनी राजनीतिक राय व्यक्त करने का अधिकार लोकतंत्र की बुनियादी व्यवस्था का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि किसी भी राजनीतिक दल या व्यक्ति को अपनी बात रखने से रोकना उचित नहीं है। उनके मुताबिक कांग्रेस कार्यकर्ता अन्याय के खिलाफ आवाज उठाते रहेंगे और कथित प्रशासनिक दबाव के बावजूद पीछे नहीं हटेंगे। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि प्रदेश स्तर के नेताओं के साथ कथित बदसलूकी और उन्हें रोके जाने की घटनाओं से कांग्रेस कार्यकर्ताओं में नाराजगी है। संदीप सेघल ने दावा किया कि उत्तराखंड की जनता पूरे घटनाक्रम को देख रही है और वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव में इसका राजनीतिक जवाब देने का फैसला जनता करेगी।
प्रदेश सचिव दीपिका गुड़िया आत्रेय ने हल्द्वानी में हुई कांग्रेस की रैली को सफल बताते हुए कहा कि कार्यक्रम में बड़ी संख्या में आम लोग और कांग्रेस कार्यकर्ता पहुंचे तथा माहौल में भारी उत्साह दिखाई दिया। उन्होंने इसे अपने शब्दों में राजनीतिक बदलाव की शुरुआत और महापरिवर्तन का संकेत बताया। दीपिका गुड़िया आत्रेय के अनुसार राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की रैली में उमड़ी भीड़ से कांग्रेस कार्यकर्ताओं में नया उत्साह पैदा हुआ और लोगों में पुराने राजनीतिक दौर की यादें भी ताजा हुईं। उन्होंने आरोप लगाया कि जब कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं का काफिला रैली की ओर बढ़ रहा था, तब कथित रूप से रास्ते में वाहनों को रोका गया और उनकी बस को भी रोकने का प्रयास हुआ। दीपिका गुड़िया आत्रेय ने कहा कि उन्होंने स्वयं भी ऐसी स्थिति का सामना किया और उनकी बस को रोके जाने की बात सामने आई। उनके अनुसार कांग्रेस कार्यकर्ताओं को लेकर कथित तौर पर आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया गया तथा उन्हें अराजक तत्व कहे जाने की बात भी सामने आई। उन्होंने आरोप लगाया कि यदि सरकार को किसी रैली की सफलता से चिंता नहीं है तो फिर कांग्रेस कार्यकर्ताओं के आवागमन को रोकने जैसी स्थिति क्यों पैदा हुई। दीपिका गुड़िया आत्रेय ने कहा कि कांग्रेस इस व्यवहार का विरोध करती है और अपने नेताओं तथा कार्यकर्ताओं के सम्मान की रक्षा के लिए आवाज उठाती रहेगी। उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार पर आरोप लगाते हुए कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने जो सवाल उठाए हैं, उनका जवाब सरकार को देना चाहिए और राजनीतिक गतिविधियों के दौरान प्रशासन को निष्पक्ष तथा संतुलित भूमिका निभानी चाहिए।
काशीपुर कांग्रेस की महानगर अध्यक्ष अलका पाल ने भी प्रदर्शन के दौरान भाजपा सरकार और पुलिस-प्रशासन पर जोरदार हमला बोला। उन्होंने कहा कि आठ अगस्त को नैनीताल जनपद के हल्द्वानी स्थित रामलीला ग्राउंड में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की बड़ी रैली प्रस्तावित थी, जिसमें भाग लेने के लिए बड़ी संख्या में कांग्रेस कार्यकर्ता, आम जनता और वरिष्ठ नेता पहुंचे थे। अलका पाल ने आरोप लगाया कि रैली में शामिल होने वाले लोगों को कथित रूप से परेशान किया गया और कांग्रेस नेताओं तथा कार्यकर्ताओं के साथ अनुचित व्यवहार किया गया। उन्होंने कहा कि काशीपुर महानगर कांग्रेस कमेटी के बैनर तले आयोजित पुतला दहन कार्यक्रम का उद्देश्य भाजपा सरकार की कथित जनविरोधी नीतियों और पुलिस-प्रशासन की कार्यप्रणाली के खिलाफ विरोध दर्ज कराना है। अलका पाल ने दावा किया कि प्रदेश की भाजपा सरकार राजनीतिक रूप से दबाव में है और जनता के बीच असंतोष बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के अनुसार हल्द्वानी की रैली में उमड़ी भीड़ और कार्यक्रम की सफलता ने सत्ता पक्ष की चिंता बढ़ा दी है। उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस लंबे समय से जनहित के मुद्दों को लेकर संघर्ष करती रही है और आने वाले समय में भी जनता के बीच जाकर अपनी बात रखेगी। अलका पाल ने वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव का उल्लेख करते हुए कहा कि कांग्रेस कार्यकर्ता लगातार जनता से संवाद कर रहे हैं और चुनाव में जनता भाजपा सरकार की नीतियों का जवाब देगी। उनके वक्तव्य में अंकिता भंडारी प्रकरण का भी उल्लेख हुआ, जिसे कांग्रेस लंबे समय से न्याय के सवाल से जोड़कर उठाती रही है।
प्रदर्शन के दौरान कांग्रेस नेताओं ने प्रदेश में कानून-व्यवस्था, प्रशासनिक व्यवस्था और राजनीतिक विरोध के प्रति सरकार के कथित रवैये को लेकर भी सवाल खड़े किए। उनका कहना था कि लोकतंत्र में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की अपनी भूमिका होती है और विपक्ष का काम सरकार की नीतियों पर सवाल उठाना, जनता की समस्याओं को सामने रखना तथा जरूरत पड़ने पर आंदोलन करना है। कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि यदि प्रशासन राजनीतिक कार्यक्रमों को कानून-व्यवस्था की दृष्टि से देखता है तो उसे सभी राजनीतिक दलों के लिए समान मानदंड अपनाने चाहिए। उनके अनुसार किसी भी राजनीतिक कार्यक्रम में भीड़ प्रबंधन, यातायात नियंत्रण और सुरक्षा व्यवस्था जरूरी है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि राजनीतिक कार्यकर्ताओं को अपनी बात रखने या कार्यक्रम में शामिल होने से रोका जाए। नेताओं ने कहा कि महंगाई, बेरोजगारी, विकास, स्थानीय समस्याएं और जनता से जुड़े अन्य मुद्दे लगातार राजनीतिक विमर्श का हिस्सा हैं और इन पर सरकार को विपक्ष के सवालों का जवाब देना चाहिए। प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी दी कि यदि कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ कथित रूप से इसी तरह का व्यवहार आगे भी जारी रहा तो पार्टी अपने आंदोलन को और व्यापक कर सकती है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस किसी दबाव से पीछे हटने वाली नहीं है और जनता से जुड़े विषयों को सड़क से लेकर सदन तक उठाया जाता रहेगा। नेताओं के मुताबिक राजनीतिक असहमति को टकराव में बदलने के बजाय सरकार को संवाद का रास्ता अपनाना चाहिए, ताकि लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनता का भरोसा मजबूत बना रहे।
इस पूरे विरोध प्रदर्शन में मल्लिकार्जुन खड़गे की हल्द्वानी रैली राजनीतिक केंद्र में रही। कांग्रेस नेताओं ने दावा किया कि रैली में आम जनता और पार्टी कार्यकर्ताओं की बड़ी भागीदारी ने संगठन के भीतर उत्साह बढ़ाया और इसी कारण रैली को लेकर कांग्रेस कार्यकर्ताओं में सकारात्मक माहौल बना। दूसरी ओर, रैली में जाने वाले कार्यकर्ताओं को कथित तौर पर रोकने और वाहनों की आवाजाही प्रभावित किए जाने के आरोपों ने इस उत्साह को राजनीतिक विरोध में बदल दिया। कांग्रेस का कहना है कि उसके वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं को सम्मान के साथ कार्यक्रम में शामिल होने का अवसर मिलना चाहिए था। नेताओं ने यह भी स्पष्ट किया कि उनका विरोध किसी एक अधिकारी या व्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि वे इसे राजनीतिक अधिकारों और सम्मान से जुड़े बड़े सवाल के रूप में देख रहे हैं। प्रदर्शन में मौजूद कार्यकर्ताओं ने सरकार विरोधी नारे लगाते हुए अपनी नाराजगी जाहिर की और पुतला दहन कर विरोध दर्ज कराया। कांग्रेस नेताओं ने कहा कि यदि किसी कार्यक्रम के दौरान प्रशासन को सुरक्षा या यातायात संबंधी कोई समस्या थी तो उसे संवाद और समन्वय के जरिए हल किया जा सकता था। उनके अनुसार राजनीतिक दलों के कार्यक्रमों में प्रशासन और आयोजकों के बीच बेहतर तालमेल आवश्यक है। उन्होंने सरकार से मांग की कि भविष्य में विपक्षी दलों के कार्यक्रमों के दौरान ऐसी परिस्थितियां पैदा न हों और प्रशासन सभी दलों के साथ निष्पक्ष रवैया अपनाए।
प्रदर्शन में अंकिता भंडारी प्रकरण को उठाते हुए अलका पाल ने सरकार पर गंभीर राजनीतिक आरोप लगाए और कहा कि कांग्रेस लंबे समय से अंकिता भंडारी को न्याय दिलाने की मांग करती रही है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के नेता राहुल गांधी, पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व और प्रदेश संगठन ने इस मामले को लेकर लंबे समय तक आवाज उठाई है तथा पार्टी कार्यकर्ता आज भी इस मुद्दे को लेकर आंदोलन करते रहे हैं। अलका पाल ने अंकिता भंडारी के माता-पिता की पीड़ा का उल्लेख करते हुए सवाल उठाया कि यदि सरकार महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान की बात करती है तो अंकिता भंडारी के परिवार को अब तक पूर्ण न्याय क्यों नहीं मिला। उन्होंने सीबीआई की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए और सरकार से जवाब मांगा। यह आरोप और सवाल प्रदर्शन के दौरान कांग्रेस के व्यापक राजनीतिक अभियान का हिस्सा बनकर सामने आए। कांग्रेस नेताओं ने कहा कि अंकिता भंडारी का मामला केवल एक परिवार का विषय नहीं है, बल्कि उत्तराखंड की बेटियों की सुरक्षा, सम्मान और न्याय से जुड़ा प्रश्न है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार इस मामले में अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखा रही है, जबकि प्रदेश में इस घटना को लेकर लंबे समय से भावनाएं जुड़ी हुई हैं। हालांकि इन आरोपों पर सरकार या संबंधित एजेंसियों का पक्ष इस प्रदर्शन के दौरान सामने नहीं आया। कांग्रेस नेताओं ने कहा कि पार्टी इस मुद्दे को जनता के बीच ले जाती रहेगी और न्याय की मांग को कमजोर नहीं पड़ने देगी। इस तरह हल्द्वानी रैली से शुरू हुआ विरोध काशीपुर में केवल पुलिस-प्रशासन की कथित कार्रवाई तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कांग्रेस ने इसे प्रदेश की राजनीति, लोकतांत्रिक अधिकारों और जनहित के कई मुद्दों से जोड़ दिया।
महाराणा प्रताप चौक पर हुए इस प्रदर्शन ने एक बार फिर काशीपुर की राजनीति में कांग्रेस और भाजपा के बीच बढ़ती तल्खी को सामने ला दिया। पुतला दहन के दौरान कार्यकर्ताओं का आक्रोश, नेताओं के तीखे बयान और वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर दिए गए संकेतों से साफ है कि कांग्रेस इस घटनाक्रम को राजनीतिक रूप से आगे ले जाने की तैयारी में है। अनुपम शर्मा, संदीप सेघल, दीपिका गुड़िया आत्रेय और अलका पाल समेत कांग्रेस नेताओं ने अलग-अलग अंदाज में सरकार और पुलिस-प्रशासन पर सवाल उठाते हुए कहा कि विपक्ष की आवाज को दबाया नहीं जा सकता। उन्होंने कार्यकर्ताओं के सम्मान, राजनीतिक कार्यक्रमों की स्वतंत्रता और जनता से जुड़े मुद्दों को मजबूती से उठाने की बात दोहराई। कांग्रेस नेताओं ने यह भी कहा कि सरकार को विपक्ष के साथ राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को दुश्मनी की तरह नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा मानना चाहिए। उनका दावा है कि यदि कार्यकर्ताओं और नेताओं के साथ कथित रूप से ऐसा व्यवहार जारी रहा तो आने वाले दिनों में आंदोलन का दायरा बढ़ाया जा सकता है। फिलहाल हल्द्वानी की घटना के बाद काशीपुर में हुआ विरोध प्रदर्शन कांग्रेस के भीतर बढ़ते आक्रोश और वर्ष 2027 के चुनाव को लेकर संगठन की सक्रियता का संकेत दे रहा है। अब राजनीतिक नजरें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार और प्रशासन इन आरोपों पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं और कांग्रेस इस मुद्दे को आगे किस स्तर तक ले जाती है। आने वाले दिनों में यह घटनाक्रम उत्तराखंड की सियासत में कितना बड़ा मुद्दा बनता है, यह राजनीतिक गतिविधियों और दोनों पक्षों की अगली रणनीति से स्पष्ट होगा।





