हरिद्वार। देवभूमि के मुख्य द्वार पर इस समय हलचल अपने चरम पर है क्योंकि आने वाले कुछ ही दिनों में गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ की पवित्र यात्रा का बिगुल बजने वाला है, जिससे संपूर्ण उत्तराखंड में लाखों भक्तों का जमावड़ा लगना तय है। हरिद्वार नगर निगम और स्थानीय प्रशासन इन दिनों अतिक्रमण हटाओ अभियान का ढोल तो जोर-शोर से पीट रहा है, लेकिन धरातल की कड़वी सच्चाई यह है कि ब्रह्मपुरी रोड़ी बेलवाला से लेकर सिंहद्वार तक की सड़कों पर अराजकता का बोलबाला है। अधिकारी लाव-लश्कर के साथ निकलते तो हैं, मगर उनके पीछे हटते ही कुछ ही मिनटों में अवैध कब्जे फिर से अपनी जगह बना लेते हैं, जो शासन की मंशा और गंभीरता पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लगाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह संपूर्ण कवायद केवल वार्षिक रिपोर्ट की फाइलें सफेद करने के लिए की जा रही है, जबकि जमीनी हालात में रत्ती भर भी सुधार नहीं दिख रहा और श्रद्धालु संकरी गलियों में फंसकर रह गए हैं।
विगत वर्षों की त्रासदियों से सबक न लेने की प्रशासनिक ढिलाई का सबसे खौफनाक नजारा हरिद्वार के शताब्दी पुल पर देखने को मिलता है, जहाँ मौत का साया एक बार फिर मंडराता हुआ महसूस हो रहा है। वर्ष 1996 की वह काली सोमवती अमावस्या आज भी लोगों के जेहन में ताजा है जब एक भयंकर हादसे ने दर्जनों निर्दोष श्रद्धालुओं की जान ले ली थी, जिसके बाद सुरक्षा के बड़े-बड़े दावे किए गए थे। किंतु आज की वास्तविकता यह है कि उसी संवेदनशील शताब्दी पुल के दोनों किनारों पर फड़ और अस्थाई दुकानों का जाल बिछा हुआ है, जो किसी भी समय एक और बड़े हादसे को आमंत्रण दे सकता है। भीड़भाड़ वाले दिनों में यहाँ पैर रखने की जगह नहीं बचती, फिर भी प्रशासन ने अपनी आँखें मूंद रखी हैं और इतिहास की उन चीखों को अनसुना कर दिया गया है जो आज भी उस पुल की दीवारों में दफन हैं। सवाल यह उठता है कि क्या प्रशासन किसी बड़ी अनहोनी के इंतजार में बैठा है या फिर रसूखदार दुकानदारों के आगे कानून ने घुटने टेक दिए हैं।

अव्यवस्थाओं की पराकाष्ठा तो तब देखने को मिलती है जब हम हर की पौड़ी क्षेत्र में विकलांगों और दिव्यांगों की सुविधा के लिए विशेष रूप से निर्मित किए गए रैंप की दुर्दशा को देखते हैं। जिस मार्ग को शारीरिक रूप से अक्षम भक्तों की सुगम आवाजाही के लिए बनाया गया था, वह आज पूरी तरह से अवैध पार्किंग के अड्डे में तब्दील हो चुका है, जहाँ दोपहिया वाहनों की लंबी कतारें लगी रहती हैं। मोक्षदायिनी मां गंगा के दर्शन की लालसा लेकर आने वाले बुजुर्ग और विकलांग श्रद्धालु इन बाधाओं के कारण वहां से गुजरने में असमर्थ हैं, जिससे उनकी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंच रही है। यह विडंबना ही है कि जिस स्थान पर अधिकारियों की तैनाती सबसे अधिक होनी चाहिए, वहां नियम-कायदों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं और कोई भी जिम्मेदार व्यक्ति इन वाहनों को वहां से हटाने या जब्त करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है।
धार्मिक मर्यादाओं के केंद्र सुभाष घाट और हर की पौड़ी की स्थिति भी कुछ कम शोचनीय नहीं है, जहाँ कानून का सरेआम मजाक उड़ाते हुए अवैध फड़ों और ठेलों की भरमार लगी हुई है। यद्यपि इन पवित्र घाटों पर किसी भी प्रकार की व्यावसायिक गतिविधि और फूल-फरोशी के ठेलों पर कड़ा कानूनी प्रतिबंध लागू है, लेकिन हकीकत में सैकड़ों की संख्या में ये अवैध दुकानें पूरे घाट परिसर को घेरे हुए हैं। श्रद्धालुओं को गंगा पूजन के लिए स्थान खोजने में मशक्कत करनी पड़ती है क्योंकि अधिकांश हिस्सा इन अवैध कब्जेदारों के नियंत्रण में है, जो न केवल सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती दे रहे हैं बल्कि घाटों की सुंदरता और स्वच्छता को भी ग्रहण लगा रहे हैं। प्रशासन की नाक के नीचे चल रहा यह खुला उल्लंघन साफ तौर पर सांठगांठ की ओर इशारा करता है, जहाँ नियमों की किताब को ताक पर रखकर केवल स्वार्थ सिद्धि का खेल खेला जा रहा है।

पवित्र नगरी की छवि को धूमिल करने वाला एक और बड़ा पहलू यहाँ व्याप्त भिक्षावृत्ति का काला साया है, जो प्रतिबंध के बावजूद हर की पौड़ी जैसे क्षेत्रों में निर्बाध रूप से फल-फूल रहा है। कानूनन भिक्षावृत्ति अपराध होने के बाद भी यहां भिखारियों के झुंड हर मोड़ पर श्रद्धालुओं को घेरे रहते हैं, जिससे न केवल यात्रियों को मानसिक परेशानी होती है बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी तीर्थनगरी की छवि प्रभावित होती है। दिन के उजाले में पुलिस चौकियों के चंद कदमों की दूरी पर चलने वाला यह भीख मांगने का सिलसिला प्रशासन की कार्यकुशलता पर गंभीर सवाल खड़े करता है। यदि प्रशासन एक छोटे से क्षेत्र को भिक्षावृत्ति मुक्त नहीं कर पा रहा है, तो करोड़ों की संख्या में आने वाले चारधाम यात्रियों की सुरक्षा और सुविधा के लंबे-चौड़े वादे केवल एक छलावा ही नजर आते हैं।
जैसे-जैसे चारधाम यात्रा की तिथि समीप आ रही है, वैसे-वैसे हरिद्वार प्रशासन की कार्यक्षमता की परीक्षा की घड़ी भी नजदीक आ रही है क्योंकि आस्था के इस महाकुंभ में अव्यवस्था के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए। बार-बार हटाए जाने के बावजूद अतिक्रमण का पुनर्जीवित होना यह सिद्ध करता है कि अधिकारियों का खौफ खत्म हो चुका है और वर्तमान अभियान केवल एक औपचारिक दिखावा मात्र है। यदि शताब्दी पुल, सुभाष घाट और हर की पौड़ी जैसे मुख्य स्थलों को अतिक्रमण मुक्त और सुरक्षित नहीं बनाया गया, तो आने वाले समय में श्रद्धालुओं को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। अब समय आ गया है कि कागजों से निकलकर जमीनी कार्रवाई की जाए और मां गंगा की इस पावन नगरी की रक्षा का उत्तरदायित्व पूरी ईमानदारी से निभाया जाए, अन्यथा यह अव्यवस्था किसी दिन बड़े जनहानि का कारण बन सकती है।





