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कैसे होगी लिव-इन कपल्स की गणना और क्या माने जाएंगे शादीशुदा? किराएदारों के लिए प्रावधान जानिए

उत्तराखंड में डिजिटल जनगणना के ऐतिहासिक महाअभियान के बीच इवा आशीष श्रीवास्तव ने खोली नियमों की पोटली जिसमें लिव-इन जोड़ों की सामाजिक मान्यता से लेकर किराएदारों के पंजीकरण तक हर उलझन का मिला सटीक समाधान।

देहरादून। उत्तराखंड की शांत वादियों में आधुनिकता और प्रशासनिक सजगता का एक अनूठा संगम देखने को मिल रहा है, क्योंकि राज्य अब देश की पहली पूर्णतः डिजिटल जनगणना के लिए कमर कस चुका है। राजधानी देहरादून के सचिवालय में सरगर्मियां तेज हैं, जहाँ जनगणना कार्य एवं नागरिक पंजीकरण निदेशक इवा आशीष श्रीवास्तव ने इस महाभियान की बारीकियों को जनता के समक्ष रखा है। इस बार की जनगणना न केवल तकनीक के उपयोग के कारण विशेष है, बल्कि सामाजिक बदलावों को स्वीकार करने की इसकी क्षमता इसे ऐतिहासिक बनाती है। राज्य में 25 अप्रैल से 24 मई 2026 तक चलने वाले मकान सूचीकरण के प्रथम चरण से ठीक पहले, 10 अप्रैल से स्व-गणना का क्रांतिकारी विकल्प नागरिकों को दिया जा रहा है। यह पहली बार है जब आम जनता को सरकारी अधिकारियों की प्रतीक्षा किए बिना स्वयं अपनी जानकारी डिजिटल पोर्टल पर दर्ज करने की स्वायत्तता दी गई है। इवा आशीष श्रीवास्तव ने स्पष्ट किया कि इस पूरी प्रक्रिया का मूल आधार ‘जनभागीदारी’ है, जिसके लिए व्यापक स्तर पर प्रचार-प्रसार किया जा रहा है ताकि प्रत्येक नागरिक इस डिजिटल यज्ञ में अपनी आहुति दे सके और उत्तराखंड का सटीक सांख्यिकीय खाका तैयार हो सके।

समाज के बदलते स्वरूप को देखते हुए इस बार जनगणना के नियमों में एक बड़ा और प्रगतिशील बदलाव किया गया है, जो विशेष रूप से लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों के लिए चर्चा का विषय बना हुआ है। उत्तराखंड में यूसीसी यानी समान नागरिक संहिता लागू होने के बाद अब तक 76 कपल्स ने अपने लिव-इन संबंधों का आधिकारिक पंजीकरण कराया है, जिन्हें कानूनी मान्यता प्राप्त है। इन जोड़ों के मन में उठ रहे संशयों को दूर करते हुए इवा आशीष श्रीवास्तव ने बताया कि जनगणना के दौरान लिव-इन कपल्स को अपनी वैवाहिक स्थिति घोषित करने की पूर्ण स्वतंत्रता होगी। यदि कोई युगल अपने रिश्ते को भविष्य में विवाह की ओर ले जाने का इरादा रखता है या इसे पूरी तरह स्थिर मानता है, तो वे स्वयं की घोषणा के आधार पर खुद को ‘विवाहित’ श्रेणी में दर्ज करा सकते हैं। यह नियम न केवल ऑनलाइन स्व-गणना पर लागू होगा, बल्कि 25 अप्रैल से घर-घर आने वाले प्रगणकों के सामने दी गई जानकारी पर भी मान्य होगा। प्रशासन का यह कदम दर्शाता है कि जनगणना अब केवल कठोर आंकड़ों का संग्रह नहीं, बल्कि नागरिकों की व्यक्तिगत भावनाओं और सामाजिक सच्चाइयों का सम्मान करने वाला एक समावेशी दस्तावेज बनने जा रहा है।

जनगणना की बारीकियां और लिव-इन जोड़ों के नियम समझातीं इवा आशीष श्रीवास्तव।

प्रशासनिक स्तर पर इस विशालकाय कार्य को त्रुटिहीन बनाने के लिए प्रशिक्षण का एक सघन चक्र चलाया जा रहा है, जिसमें हजारों की संख्या में कर्मचारी दिन-रात मेहनत कर रहे हैं। निदेशक इवा आशीष श्रीवास्तव ने जानकारी साझा की कि फरवरी माह से ही चार्ज ऑफिसर्स, मास्टर ट्रेनर्स और फील्ड ट्रेनर्स को आधुनिक मोबाइल एप्लीकेशंस और डेटा कलेक्शन की बारीकियों से अवगत कराया जा चुका है। वर्तमान में, 6 अप्रैल से शुरू हुआ प्रगणकों और पर्यवेक्षकों का प्रशिक्षण अपने अंतिम पड़ाव की ओर है, जिसे 22 अप्रैल तक शत-प्रतिशत पूर्ण कर लिया जाएगा। पूरे प्रदेश में लगभग 650 बैचों में 30 हजार से अधिक कर्मचारियों को प्रशिक्षित किया जा रहा है, जिनकी हाजिरी और सीखने की प्रक्रिया पर कड़ी डिजिटल निगरानी रखी जा रही है। इवा आशीष श्रीवास्तव ने बताया कि हालांकि इतनी बड़ी संख्या में जनशक्ति का प्रबंधन करना एक बड़ी जिम्मेदारी है, लेकिन प्रशासन ने हर चुनौती का समाधान पहले ही खोज लिया है। जो कर्मचारी स्वास्थ्य कारणों या अन्य बाधाओं के कारण ड्यूटी से बचना चाहते हैं, उनकी बारीकी से जांच की जा रही है और केवल वास्तविक मामलों में ही छूट दी जा रही है, क्योंकि यह कार्य राष्ट्रीय महत्व का है और इसमें चुनाव जैसी ही गंभीरता अनिवार्य है।

किराए के मकानों में रहने वाली उत्तराखंड की एक बड़ी आबादी के लिए भी इस बार जनगणना में स्पष्ट और सुगम प्रावधान किए गए हैं। अक्सर देखा गया है कि एक ही मकान में कई फ्लोर होते हैं जहाँ अलग-अलग परिवार किराए पर रहते हैं; ऐसे मामलों में प्रत्येक परिवार को एक अलग ‘हाउसहोल्ड’ यानी स्वतंत्र इकाई के रूप में गिना जाएगा। इवा आशीष श्रीवास्तव ने विस्तार से समझाया कि मकान सूचीकरण के दौरान भले ही ‘हेड ऑफ हाउसहोल्ड’ का विकल्प अनिवार्य न हो, लेकिन फरवरी 2027 में होने वाली मुख्य जनसंख्या गणना के समय परिवार के मुखिया से संबंध बताना आवश्यक होगा। लिव-इन में रहने वाले या विशेष परिस्थितियों वाले लोगों के लिए तब ‘अदर्स’ (अन्य) का विकल्प भी उपलब्ध रहेगा, जिससे उनकी गोपनीयता और पहचान दोनों सुरक्षित रहेंगे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस पूरी प्रक्रिया के दौरान नागरिकों द्वारा दी गई जानकारी को बेहद गुप्त रखा जाएगा और इसे किसी भी अन्य विभाग या संस्था के साथ साझा नहीं किया जाएगा। प्रशासन का मुख्य उद्देश्य राज्य के संसाधनों का उचित वितरण सुनिश्चित करने के लिए केवल जनसंख्या का सटीक डेटा प्राप्त करना है, न कि किसी की निजी जिंदगी में दखल देना।

जनगणना की बारीकियां और लिव-इन जोड़ों के नियम समझातीं इवा आशीष श्रीवास्तव।

सुरक्षा और पारदर्शिता के मानकों को इस बार नई ऊंचाइयों पर ले जाया गया है, ताकि जनता के मन में किसी भी प्रकार के फ्रॉड या धोखाधड़ी का भय न रहे। इवा आशीष श्रीवास्तव ने नागरिकों को आश्वस्त किया कि घर आने वाले प्रत्येक प्रगणक के पास सरकार द्वारा जारी एक आधिकारिक पहचान पत्र होगा, जिसमें एक विशेष क्यूआर कोड अंकित होगा। कोई भी जागरूक नागरिक उस क्यूआर कोड को अपने स्मार्टफोन से स्कैन करके तुरंत यह सत्यापित कर सकता है कि दरवाजे पर खड़ा व्यक्ति वास्तव में एक अधिकृत जनगणना कर्मचारी है या नहीं। इसके अलावा, निदेशक ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण चेतावनी जारी की है कि जनगणना की पूरी प्रक्रिया के दौरान कोई भी कर्मचारी आपसे किसी भी प्रकार का ओटीपी (वन टाइम पासवर्ड) नहीं मांगेगा। नागरिकों को केवल वही ‘यूनिक आईडी’ प्रगणक को बतानी होगी जो उन्हें स्व-गणना पूर्ण करने के बाद पोर्टल से प्राप्त हुई है। यह डिजिटल सुरक्षा कवच इसलिए तैयार किया गया है ताकि साइबर अपराधी इस राष्ट्रीय अभियान की आड़ में भोले-भालू लोगों को अपना निशाना न बना सकें, और पूरी प्रक्रिया सुचारू रूप से बिना किसी व्यवधान के डिजिटल माध्यम से संपन्न हो सके।

प्रेस वार्ता के अंत में इवा आशीष श्रीवास्तव ने जनगणना अधिनियम के तहत निहित कानूनी प्रावधानों की याद दिलाते हुए जनता से ईमानदारी की अपील की। उन्होंने स्पष्ट रूप से चेतावनी दी कि यदि कोई व्यक्ति जनगणना के दौरान जानबूझकर गलत जानकारी देता है या तथ्यों को छुपाता है, तो उसके विरुद्ध ₹1000 के जुर्माने के साथ-साथ कारावास तक का दंड दिया जा सकता है। झूठी जानकारी देने से न केवल सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में बाधा आती है, बल्कि संबंधित नागरिक को भी किसी प्रकार का व्यक्तिगत लाभ प्राप्त नहीं होता है। चूंकि जनगणना के आंकड़े पूर्णतः गोपनीय होते हैं, इसलिए नागरिकों को बिना किसी संकोच के अपनी वास्तविक स्थिति साझा करनी चाहिए। इवा आशीष श्रीवास्तव ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रगणकों की नियुक्ति आमतौर पर उन्हीं के स्थानीय क्षेत्रों में की जा रही है ताकि वे वहां की भौगोलिक और सामाजिक स्थितियों से पहले से ही परिचित हों और नागरिकों के साथ उनका संवाद सहज रहे। उत्तराखंड का यह डिजिटल जनगणना मॉडल भविष्य के भारत के लिए एक मार्गदर्शक की भूमिका निभाने जा रहा है, जहाँ हर एक व्यक्ति की गिनती देश की प्रगति की नींव रखेगी।

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