काशीपुर। उत्तराखंड परिवहन निगम के गलियारों से लेकर देवभूमि की सड़कों तक आज एक ऐसा हाहाकार मचा है जिसे सुनकर किसी भी संवेदनशील व्यक्ति की रूह कांप जाए। राज्य के विकास का पहिया थामने वाले बाह्य स्रोत कर्मचारियों के चूल्हे आज ठंडे पड़ चुके हैं और उनके घरों में छाई खामोशी सरकार के सुशासन के दावों पर एक गहरा प्रश्नचिन्ह लगा रही है। उत्तराखंड परिवहन निगम में विभिन्न आउटसोर्सिंग एजेंसियों के माध्यम से अपनी सेवाएं दे रहे सैंकड़ों जांबाज कर्मचारियों ने अब थक-हारकर मुख्यमंत्री पोर्टल का दरवाजा खटखटाया है। यह कोई साधारण शिकायत नहीं है, बल्कि उन हजारों परिवारों की चीख है जो पिछले चार महीनों से यानी भीषण ठंड वाली जनवरी से लेकर तपती अप्रैल तक एक-एक पैसे के लिए तरस रहे हैं। कर्मचारियों का आरोप है कि उन्हें उनका जायज हक और पसीने की कमाई देने के बजाय उन्हें केवल आश्वासन के झुनझुने थमाए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री पोर्टल पर दर्ज की गई इन शिकायतों का अंबार इस बात का जीता-जागता सबूत है कि सिस्टम के भीतर कहीं न कहीं भारी सड़न पैदा हो चुकी है, जिसके कारण निचले स्तर पर काम करने वाला कर्मचारी आज पाई-पाई का मोहताज होकर दर-दर भटकने को मजबूर हो गया है।
इस पूरे प्रकरण में सबसे दुखद पहलू यह है कि कर्मचारी आज एक ऐसी फुटबॉल बन गए हैं जिसे विभाग और एजेंसी अपनी सुविधानुसार एक-दूसरे के पाले में धकेल रहे हैं। जब ये त्रस्त कर्मचारी अपनी एजेंसी के पास जाते हैं, तो उन्हें रूखा जवाब मिलता है कि विभाग ने अभी तक बिलों का भुगतान नहीं किया है, इसलिए वे हाथ खाली रखे हुए हैं। वहीं दूसरी ओर, जब ये कर्मचारी गुहार लेकर सरकारी दफ्तरों की चौखट पर माथा टेकते हैं, तो अधिकारी बड़ी बेबाकी से कह देते हैं कि सरकार की ओर से सारा पैसा जारी किया जा चुका है और अब यह एजेंसी की जिम्मेदारी है कि वह वेतन बांटे। इस विचित्र ‘म्यूजिकल चेयर’ के खेल में सच कहीं खो गया है और झूठ की परतों के बीच कर्मचारियों का भविष्य दम तोड़ रहा है। एजेंसी और विभाग के बीच समन्वय का यह भीषण अभाव न केवल प्रशासनिक विफलता को दर्शाता है, बल्कि यह भी उजागर करता है कि कैसे निजी कंपनियां सरकारी धन का उपयोग अपने फायदे के लिए कर रही हैं और गरीब मज़दूरों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया है। तालमेल की इस कमी ने आज उत्तराखंड परिवहन निगम की साख को भी दांव पर लगा दिया है।
कर्मचारियों की आर्थिक स्थिति आज उस मोड़ पर पहुंच गई है जहां से आगे केवल अंधकार नजर आता है। चार महीने का लंबा अंतराल बिना वेतन के गुजारना किसी पहाड़ चढ़ने से कम चुनौतीपूर्ण नहीं है। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इन कर्मचारियों के घरों में अब राशन की उधारी भी बंद हो गई है। सबसे ज्यादा हृदयविदारक स्थिति उन मासूम बच्चों की है जिनकी स्कूल फीस जमा न होने के कारण उनके भविष्य पर तलवार लटक रही है। स्कूलों से बार-बार आने वाले नोटिस और शिक्षकों के टोकने से बच्चों के कोमल मन पर जो बीत रही है, उसका अंदाजा शायद वातानुकूलित कमरों में बैठे बड़े अधिकारियों को नहीं है। किराए के कमरों में रहने वाले कर्मचारियों के लिए तो स्थिति और भी भयावह हो गई है; मकान मालिक रोज सुबह दरवाजे पर दस्तक देकर कमरे खाली करने की धमकी दे रहे हैं। अपनी इज्जत और छत बचाने की जद्दोजहद में ये कर्मचारी अब मानसिक अवसाद की कगार पर पहुंच चुके हैं। एक तरफ काम का दबाव और दूसरी तरफ खाली जेब—इस दोहरी मार ने उत्तराखंड परिवहन निगम के इन कर्मियों को पूरी तरह तोड़कर रख दिया है।
कर्मचारियों ने जब अपनी पीड़ा एजेंसी के संचालकों के सामने रखी, तो उन्हें सांत्वना देने के बजाय जो जवाब मिला वह किसी अपमान से कम नहीं था। एजेंसी के अधिकारियों ने संवेदनहीनता की सारी हदें पार करते हुए कर्मचारियों को सीधे शब्दों में कह दिया कि ‘यदि वेतन नहीं मिल रहा है तो काम छोड़ दो, हमारे पास काम करने वालों की लंबी कतार लगी है।’ यह बयान न केवल तानाशाही की पराकाष्ठा है, बल्कि राज्य की रोजगार व्यवस्था पर भी एक बड़ा तमाचा है। एक ओर सरकार स्वरोजगार और सरकारी सेवाओं के माध्यम से युवाओं को जोड़ने का दावा करती है, वहीं दूसरी ओर इन एजेंसियों को इतनी छूट दे दी गई है कि वे कर्मचारियों को गुलामों की तरह समझ रही हैं। जब सरकार कहती है कि हमने पैसा दे दिया है और एजेंसी कहती है कि हमें मिला ही नहीं, तो सवाल उठता है कि आखिर वह करोड़ों की धनराशि गई कहां? क्या वह किसी भ्रष्ट अधिकारी की जेब में चली गई या एजेंसी उसे दबाकर ब्याज कमा रही है? इस रहस्यमयी गायब होते धन की जांच की मांग अब जोर पकड़ने लगी है क्योंकि कर्मचारी अब और अधिक सहने की स्थिति में नहीं हैं।

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री से की गई इस भावुक और कानूनी अपील में कर्मचारियों ने स्पष्ट रूप से हस्तक्षेप की मांग की है। उन्होंने मुख्यमंत्री पोर्टल के माध्यम से अपनी व्यथा सुनाते हुए कहा है कि अब केवल मुख्यमंत्री ही उन्हें इस दलदल से बाहर निकाल सकते हैं। कर्मचारियों की मांग केवल उनका पिछला बकाया ही नहीं है, बल्कि वे भविष्य के लिए एक ऐसी पारदर्शी और समयबद्ध व्यवस्था चाहते हैं जिसमें वेतन के लिए उन्हें हर महीने गिड़गिड़ाना न पड़े। उन्होंने मांग की है कि वेतन सीधे उनके बैंक खातों में एक निश्चित तारीख तक पहुंच जाना चाहिए और इसमें देरी करने वाली एजेंसियों पर भारी जुर्माना लगाया जाना चाहिए। वर्तमान में प्रचलित व्यवस्था पूरी तरह से शोषणकारी साबित हो रही है, जहाँ बिचौलिए यानी एजेंसियां सरकार से पैसा लेकर उसे दबा लेती हैं और कर्मचारी केवल काम का बोझ ढोते रह जाते हैं। यदि मुख्यमंत्री इस मामले में कड़ा संज्ञान नहीं लेते हैं, तो आने वाले दिनों में यह असंतोष एक बड़े आंदोलन का रूप ले सकता है, जिससे परिवहन व्यवस्था ठप होने की पूरी संभावना है और इसके लिए सीधे तौर पर शासन-प्रशासन जिम्मेदार होगा।
यह पूरा मामला सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। आखिर क्यों बाह्य स्रोत कर्मचारियों को हमेशा दोयम दर्जे का नागरिक समझा जाता है? क्या उनका पसीना सरकारी कर्मचारियों के पसीने से कम कीमती है? विभाग और एजेंसी के बीच का यह विवाद दरअसल भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन की एक बड़ी कहानी की ओर इशारा कर रहा है। यदि विभाग ने भुगतान कर दिया है, तो वह एजेंसी के खाते का ऑडिट क्यों नहीं करता? और यदि भुगतान नहीं हुआ है, तो विभाग झूठ क्यों बोल रहा है? इस गोलमोल जवाबदेही ने आज राज्य के युवाओं को निराश कर दिया है। कर्मचारी अब आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं और उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि वे अब झूठे वादों के सहारे और अधिक दिन नहीं काट सकते। उनकी दैनिक जरूरतें जैसे दवा, राशन और बच्चों की पढ़ाई अब रुक चुकी है। उत्तराखंड परिवहन निगम के इन कर्मचारियों की चीख अब देहरादून के सत्ता के गलियारों में गूंज रही है और अब देखना यह होगा कि सरकार इस मानवीय संकट पर कितनी जल्दी जागती है या फिर हमेशा की तरह फाइलें एक मेज से दूसरी मेज पर घूमती रहेंगी।
यह मामला केवल वेतन का नहीं है, बल्कि मानवीय गरिमा और श्रम के सम्मान का है। उत्तराखंड परिवहन निगम के इन बाह्य स्रोत कर्मियों ने विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी सेवाएं दी हैं, लेकिन बदले में उन्हें केवल जिल्लत और भुखमरी मिली है। पोर्टल पर दर्ज हजारों शिकायतें इस बात की गवाह हैं कि राज्य में आउटसोर्सिंग के नाम पर मज़दूरों का किस कदर शोषण किया जा रहा है। सरकार को चाहिए कि वह तत्काल प्रभाव से एक उच्च स्तरीय जांच समिति गठित करे जो यह पता लगाए कि भुगतान की प्रक्रिया में कहां अवरोध पैदा हो रहा है। साथ ही, दोषी एजेंसियों के खिलाफ ब्लैकलिस्टिंग की कार्रवाई की जानी चाहिए ताकि भविष्य में कोई भी कंपनी कर्मचारियों के पेट पर लात मारने की हिम्मत न कर सके। यदि समय रहते इन कर्मचारियों को उनका चार महीने का बकाया वेतन नहीं मिला, तो यह आक्रोश जल्द ही सड़कों पर सैलाब बनकर उतरेगा, जिसकी जिम्मेदारी पूरी तरह से विभाग और संबंधित एजेंसियों की होगी। कर्मचारी आज अपनी अंतिम उम्मीद के साथ मुख्यमंत्री की ओर देख रहे हैं, अब न्याय की गेंद सरकार के पाले में है।





