रामनगर। नगर के शांत वातावरण में उस वक्त भारी तनाव व्याप्त हो गया जब खताड़ी क्षेत्र की गलियां बुलडोजर की गड़गड़ाहट और सत्ता के गलियारों से निकले आदेशों की धमक से गूंज उठीं। अतिक्रमण हटाओ अभियान के नाम पर प्रशासन जब लाव-लश्कर के साथ मैदान में उतरा, तो मंजर किसी युद्ध क्षेत्र से कम नहीं था, जहाँ एक ओर सरकारी तंत्र का लोहे जैसा भारी मशीनरी बल था और दूसरी ओर अपनी आजीविका और छतों को बचाने की जद्दोजहद में जुटे असहाय नागरिक। नगर पालिका परिषद के अधिशासी अधिकारी आलोक उनियाल इस पूरे दलबल का नेतृत्व कर रहे थे, जिनकी कार्यशैली में नियमों की सख्ती कम और ‘अधिकार का अहंकार’ अधिक झलकता दिखाई दिया। जैसे-जैसे पीला पंजा घरों और दुकानों की दहलीज की ओर बढ़ा, वैसे-वैसे लोगों का आक्रोश भी परवान चढ़ने लगा। यह केवल ईंट और गारे के ढांचे को ढहाने की कार्रवाई नहीं थी, बल्कि प्रशासनिक तंत्र द्वारा जनसंवाद को हाशिए पर रखकर तानाशाही के प्रदर्शन का एक जीता-जागता उदाहरण बन गई, जिसने स्थानीय निवासियों के मन में व्यवस्था के प्रति गहरे अविश्वास की खाई खोद दी है।
अभियान के दौरान स्थिति तब और अधिक विस्फोटक हो गई जब प्रभावित परिवारों की सिसकियों और उठते सवालों को स्वर देने के लिए कांग्रेस नेता पुष्कर दुर्गापाल अपने समर्थकों के साथ मौके पर जा पहुंचे। लोकतंत्र की मर्यादा यह कहती है कि जब जनता और प्रशासन के बीच टकराव हो, तो बातचीत के माध्यम से समाधान तलाशा जाए, लेकिन ईओ आलोक उनियाल ने संवेदनशीलता का परिचय देने के बजाय सीधे तौर पर धमकियों का सहारा लिया। जैसे ही पुष्कर दुर्गापाल ने कार्रवाई के औचित्य और मानवीय पहलुओं पर सवाल खड़े किए, ईओ साहब का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया। जनता की आंखों में आंसू और बेबसी देखने के बजाय अधिकारी महोदय ने सीधे कानूनी डंडा चलाने का मन बना लिया और कांग्रेस नेता को दो टूक शब्दों में चेतावनी दे डाली। उन्होंने बेहद तल्ख लहजे में कहा कि “रास्ते से हट जाओ, वरना तुम्हारे खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी जाएगी।” प्रशासन का यह रवैया साफ जाहिर कर रहा था कि आज उनका मुख्य उद्देश्य अतिक्रमण हटाना नहीं, बल्कि व्यवस्था के खिलाफ उठने वाली हर मुखर आवाज को कुचलना और डराना है।
प्रशासन की इस खुली धमकी के आगे झुकने के बजाय कांग्रेस नेता पुष्कर दुर्गापाल ने भी उसी तेवर में जवाब दिया, जिसने सत्ता के रौब को आईना दिखाने का काम किया। ईओ द्वारा एफआईआर की धमकी दिए जाने पर दुर्गापाल ने बिना विचलित हुए सीना तानकर कहा—”करा दीजिये।” इस छोटे से वाक्य ने वहां मौजूद भीड़ में एक नया जोश भर दिया और यह स्पष्ट कर दिया कि ‘रौब बनाम विरोध’ की इस सीधी जंग में विपक्ष दबने वाला नहीं है। यह घटनाक्रम केवल एक नोकझोंक मात्र नहीं था, बल्कि इसने उस गहरे राजनैतिक और प्रशासनिक संकट को उजागर किया जहाँ अधिकारी संवाद की भाषा भूलकर केवल दमन की भाषा का प्रयोग कर रहे हैं। अधिकारी का यह आचरण कि वे कानून का डर दिखाकर जनप्रतिनिधियों को चुप करा देंगे, लोकतंत्र की मूल भावनाओं के साथ एक भद्दा मजाक प्रतीत होता है। रामनगर की सड़कों पर हुआ यह वाकया अब केवल अतिक्रमण तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रशासन की निष्पक्षता और उनकी कार्यप्रणाली पर एक बहुत बड़ा प्रश्नचिन्ह बन चुका है।
रामनगर में हुई इस तनातनी ने एक बार फिर उस पुराने सवाल को हवा दे दी है कि आखिर प्रशासन की यह प्रचंड सख्ती केवल तभी क्यों जागती है जब सामने कोई विपक्षी नेता या आम जनता खड़ी हो? क्या यही ‘कानूनी डंडा’ उन प्रभावशाली रसूखदारों पर भी चलता है जिन्होंने दशकों से सरकारी जमीन को अपनी जागीर बना रखा है और सिस्टम की नाक के नीचे अतिक्रमण का साम्राज्य खड़ा किया है? खताड़ी के इस घटनाक्रम ने यह सिद्ध कर दिया है कि कानून का उपयोग अक्सर कार्रवाई से अधिक ‘दबाव’ बनाने के हथकंडे के रूप में किया जा रहा है। जब कुर्सी पर बैठे जिम्मेदार अधिकारी अपनी मर्यादाएं भूलकर केवल चेतावनियों के बल पर शासन चलाने की कोशिश करते हैं, तो बुलडोजर से मकान बाद में गिरते हैं, जनता का सरकारी तंत्र पर से भरोसा पहले ढह जाता है। अधिकारी आलोक उनियाल और नेता पुष्कर दुर्गापाल के बीच का यह विवाद अब जिले की राजनीति में चर्चा का मुख्य केंद्र बन गया है और लोग पूछ रहे हैं कि क्या विकास का रास्ता केवल गरीबों की झोपड़ियों को रौंदकर ही निकलेगा या रसूखदारों के आलीशान बंगलों तक भी कभी यह पीला पंजा पहुंच पाएगा?
इस पूरे प्रकरण ने प्रशासनिक अधिकारियों की कार्यशैली पर गंभीर नैतिक सवाल खड़े कर दिए हैं। अतिक्रमण हटाना कानून सम्मत प्रक्रिया हो सकती है, लेकिन इसके क्रियान्वयन के दौरान मानवीय संवेदनाओं को ताक पर रख देना किसी भी सूरत में उचित नहीं ठहराया जा सकता। ईओ द्वारा दी गई एफआईआर की धमकी इस बात का प्रमाण है कि सरकारी अधिकारियों के भीतर जवाबदेही की कमी और पद का मद किस कदर हावी हो चुका है। खताड़ी क्षेत्र में उस दिन जो कुछ भी हुआ, उसने प्रशासन के उस चेहरे को बेनकाब कर दिया है जो केवल सत्ता की लाठी घुमाना जानता है। रामनगर की जनता अब इस बात का इंतजार कर रही है कि क्या उच्च अधिकारी इस ‘अधिकार के अहंकार’ का संज्ञान लेंगे या फिर इसी तरह चेतावनियों और धमकियों के साये में आम नागरिक और जनप्रतिनिधियों की आवाज को दबाया जाता रहेगा। कानून सबके लिए बराबर होना चाहिए, लेकिन जब उसका इस्तेमाल चयनात्मक तरीके से किसी को डराने के लिए किया जाता है, तो वह न्याय नहीं बल्कि अन्याय की श्रेणी में आता है, और रामनगर का यह मामला इसी अन्याय की एक कड़वी दास्तां बयां कर रहा है।
घटना के बाद से क्षेत्र में आक्रोश का माहौल है और विपक्षी खेमा इस मुद्दे को लेकर आर-पार की लड़ाई के मूड में नजर आ रहा है। पुष्कर दुर्गापाल द्वारा दी गई चुनौती ने यह संदेश दे दिया है कि यदि प्रशासन अपनी शक्तियों का दुरुपयोग कर जनभावनाओं को कुचलने का प्रयास करेगा, तो उसका पुरजोर विरोध होगा। सरकारी मशीनरी को यह समझना होगा कि वे जनता के सेवक हैं, न कि उनके भाग्य विधाता। अतिक्रमण हटाना यदि शहर की जरूरत है, तो जनता को विश्वास में लेना और नियमों के दायरे में रहकर शालीनता से बात करना भी उन्हीं का दायित्व है। रामनगर के खताड़ी का यह दृश्य आने वाले समय में प्रशासन के लिए एक सबक साबित हो सकता है कि केवल बुलडोजर चलाने से शहर सुंदर नहीं होते, बल्कि विश्वास और न्यायपूर्ण कार्रवाई से व्यवस्था सुदृढ़ होती है। फिलहाल, एफआईआर की उस धमकी और उसके जवाब में मिली चुनौती ने रामनगर के राजनैतिक पारे को चरम पर पहुंचा दिया है और लोग अब टकटकी लगाए बैठे हैं कि आगे क्या मोड़ आता है।





