रामनगर(सुनील कोठारी)। अमृत काल के सुनहरे स्वप्नों के बीच आज देश का आम जनमानस एक ऐसे भयावह अंधकार में धकेला जा चुका है, जिसकी कल्पना शायद ही किसी भारतीय ने अपनी स्वतंत्रता के इस पड़ाव पर की होगी। सत्ता के गलियारों से निकलते आश्वासनों के शोर के बीच ज़मीनी हकीकत इतनी डरावनी है कि हर नागरिक खुद को एक अंतहीन चक्रव्यूह में फंसा हुआ महसूस कर रहा है। हाल ही में पीएम मोदी ने संसद के पटल से देश को संबोधित करते हुए जिस तरह की चेतावनी दी, उसने मध्यम और निम्न वर्ग की रातों की नींद उड़ा दी है। प्रधानमंत्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि देशवासियों को एक बार फिर कोविड काल जैसी चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों से निपटने के लिए मानसिक और शारीरिक रूप से तैयार रहना चाहिए। उनके इस बयान ने जनता के ज़ेहन में उन पुराने घावों को हरा कर दिया है, जब अस्पतालों में ऑक्सीजन की कमी और सड़कों पर बेबस लोगों की कतारें आम मंजर थीं। सवाल यह उठता है कि क्या सत्ता में बैठे हुक्मरानों की ज़िम्मेदारी सिर्फ चेतावनी देकर अपना पल्ला झाड़ लेने की है, या फिर उन्होंने आम आदमी को इन संभावित संकटों से बचाने के लिए कोई ठोस कार्ययोजना भी तैयार की है? क्या भारत का आम नागरिक केवल हर आपदा को अपने कंधों पर ढोने और व्यवस्था की विफलताओं के बीच खपने के लिए ही अभिशप्त है?
आर्थिक मोर्चे पर देश की स्थिति इस वक्त किसी बड़े हादसे से कम नहीं नज़र आ रही है, जहाँ डॉलर के मुकाबले रुपया रसातल की गहराइयों को नाप रहा है। मुद्रास्फीति की दर ने पिछले तमाम रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए हैं और आम आदमी की क्रय शक्ति पूरी तरह से दम तोड़ चुकी है। बेरोजगारी का आलम यह है कि युवा अब डिग्री हाथ में लिए हताशा के सागर में गोते लगा रहे हैं, जबकि उन माइक्रो इंडस्ट्रीज का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है जो कभी गरीब और मजदूरों के लिए रोटी, कपड़ा और मकान का एकमात्र सहारा हुआ करती थीं। नोटबंदी व जीएसटी की दोहरी मार ने पहले ही व्यापार की कमर तोड़ दी थी, और रही-सही कसर कोविड की त्रासदी ने पूरी कर दी। अब जबकि देश के सूक्ष्म और लघु उद्योग बंदी की कगार पर खड़े हैं, तो उन पर निर्भर करोड़ों परिवारों के सामने अंधेरा छा गया है। देश के विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों से आने वाली खबरें रोंगटे खड़े करने वाली हैं, जहाँ फैक्ट्री और कारखानों में एक के बाद एक ताले लटक रहे हैं और सन्नाटा पसरता जा रहा है। सत्ता द्वारा आत्मनिर्भर भारत और अच्छे दिन लाने के जितने भी लंबे-चौड़े दावे किए गए थे, वे अब केवल चुनावी जुमले बनकर रह गए हैं, जिनका वास्तविकता से कोई सरोकार नज़र नहीं आता।
महानगरों की चकाचौंध से दूर अब एक ऐसा दर्दनाक दृश्य उभर रहा है जो देश की अर्थव्यवस्था की बदहाली को सार्वजनिक कर रहा है। अपनी आजीविका खो चुके मजदूर अब शहरों से अपने सामान को सिर पर लादकर वापस अपने गांवों की ओर पलायन करने को मजबूर हैं। यह दृश्य उन मजदूरों की बेबसी को दर्शाता है जो कभी शहरों के निर्माण में अपना पसीना बहाते थे, लेकिन आज उनकी भूख मिटाने वाला कोई नहीं है। इन पलायन करने वाले श्रमिकों का सीधा और साफ कहना है कि जब दो वक्त के भोजन की व्यवस्था भी नहीं हो पा रही है, तो वे खाली पेट काम कैसे कर सकते हैं? रसोई गैस के दामों में जिस बेतहाशा तरीके से बढ़ोतरी हुई है, उसने गरीब के चूल्हे को ठंडा कर दिया है, और विडंबना देखिए कि बढ़ी हुई कीमतों के बावजूद लोगों को गैस सिलेंडर उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं। देश के तमाम बड़े शहरों से पलायन की जो तस्वीरें सामने आ रही हैं, वे इस बात का जीवंत प्रमाण हैं कि अर्थव्यवस्था अब वेंटिलेटर पर है। जब किसी राष्ट्र की जीडीपी में 30 फीसदी की भारी-भरकम भागीदारी रखने वाली माइक्रो और लघु उघोगों की व्यवस्था चौपट हो जाए, तो समझ लेना चाहिए कि संकट की जड़ें कितनी गहरी हो चुकी हैं।
महंगाई का कहर अब केवल लग्जरी वस्तुओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने खाघ तेल—घी और दाल—सब्जियों जैसी अनिवार्य वस्तुओं को भी अपनी गिरफ्त में ले लिया है। रसोई का बजट पूरी तरह से बिगड़ चुका है और आम आदमी अब एक-एक निवाले के लिए संघर्ष कर रहा है। बाज़ार में कंपनियों ने एक नई चालाकी शुरू कर दी है, जहाँ एक लीटर वाली पैकिंग में अब सिर्फ 750 ग्राम तेल—घी दिया जा रहा है, और वह भी पुरानी दरों से कहीं अधिक बढ़ी हुई कीमतों के साथ। आम उपभोक्ताओं को न केवल वजन कम मिल रहा है बल्कि जेब भी पहले से ज्यादा ढीली करनी पड़ रही है। दालों और सब्जियों के दाम आसमान छू रहे हैं, जिससे थाली से पौष्टिकता गायब हो गई है। रेहडी ठेेली लगाकर अपना गुजारा करने वाले छोटे पटरी दुकानदारों से लेकर होटल और रेस्टोरेंटों के व्यवसाय से जुड़े लोगों तक, हर कोई इस आर्थिक सुनामी की चपेट में आ गया है। जिस गति से खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ी हैं, उसने समाज के हर वर्ग को सुरक्षा के लिहाज से असुरक्षित महसूस करने पर विवश कर दिया है, क्योंकि उनकी जमा-पूंजी अब दैनिक खर्चों की भेंट चढ़ रही है।
वैश्विक परिदृश्य पर नज़र डालें तो ईरान इजराइल युद्ध ने जलती आग में घी डालने का काम किया है, जिससे पैदा हुए ऊर्जा संकट का फिलहाल कोई अंत नज़र नहीं आ रहा है। इस युद्ध की वजह से मिडल ईस्ट के प्रमुख ऊर्जा उत्पादक देशों के इंफ्रास्ट्रक्चर पर हुए हमलों ने दुनिया भर की तेल सप्लाई चेन को तहस-नहस कर दिया है। तमाम बड़ी तेल रिफाइनरियों को इतना व्यापक नुकसान पहुँचा है कि अगर युद्ध आज भी रुक जाए, तो भी हालात को सामान्य होने में महीनों नहीं बल्कि कई सालों का समय लग जाएगा। ऊर्जा संकट का यह सीधा असर भारत जैसे आयात-निर्भर देश पर पड़ रहा है, जहाँ पेट्रोल और डीजल की कीमतें नियंत्रण से बाहर होती जा रही हैं। आयात-निर्यात की बाधाओं ने निर्माण क्षेत्र और परिवहन को बुरी तरह प्रभावित किया है, जिससे हर वस्तु की लागत में वृद्धि हो गई है। सत्ता में बैठे लोगों के पास इस वैश्विक संकट का मुकाबला करने के लिए कोई स्पष्ट रोडमैप नहीं है, और इसका खामियाजा सीधे तौर पर भारत के आम नागरिक को भुगतना पड़ रहा है, जो पहले से ही आंतरिक आर्थिक नीतियों की मार झेल रहा था।
वर्तमान समय में देश का समाज और आम आदमी एक ऐसे चौतरफा संकट से घिर चुका है जहाँ से उसे अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा का कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है। एक तरफ बेरोजगारी की मार है, तो दूसरी तरफ बढ़ती महंगाई और गिरती अर्थव्यवस्था ने जीवन को नर्क बना दिया है। आत्मनिर्भरता का नारा देने वाली सरकार के दौर में लोग बुनियादी जरूरतों के लिए भी दूसरों का मुँह ताकने को मजबूर हैं। जिस तरह से आर्थिक संकट के चक्रव्यूह में देश का गरीब और मध्यम वर्ग फंस चुका है, वह अत्यंत ही चिंतनीय और हृदयविदारक है। लोग अपनी जमा-पूंजी खो रहे हैं, रोज़गार छिन रहे हैं और भविष्य को लेकर एक घोर अनिश्चितता का वातावरण बना हुआ है। सबसे डरावनी बात यह है कि इस गंभीर समस्या से बचाव का कोई भी ठोस रास्ता नज़र नहीं आ रहा है, न ही सरकार की ओर से कोई ऐसी राहत योजना दिख रही है जो आम आदमी को इस दलदल से बाहर निकाल सके। देशवासियों ने जिस विश्वास के साथ सत्ता की बागडोर सौंपी थी, वह विश्वास अब आर्थिक मंदी और बदहाली के मलबे के नीचे दबता जा रहा है, और जनता खुद को पूरी तरह असहाय महसूस कर रही है।





