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सनातन धर्म की मर्यादा और बच्चों के भविष्य को बचाने के लिए मैदान में उतरा जनसैलाब

काशीपुर। देवभूमि की मर्यादा को ताक पर रखकर घनी आबादी और धार्मिक स्थलों के झुरमुट में शराब का ठेका खोलने के दुस्साहस ने स्थानीय महिलाओं और प्रबुद्ध समाज को सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर कर दिया है। ‘दारू का ठेका नहीं खुलेगा; के नारों से गूंजते आसमान के नीचे खड़ी महिलाओं का संकल्प अब एक बड़ी क्रांति का रूप ले चुका है। कड़कड़ाती धूप और धूल की परवाह किए बिना, हाथों में तख्तियां लिए ये माताएं और बहनें स्पष्ट संदेश दे रही हैं कि आबकारी विभाग की मनमानी अब और बर्दाश्त नहीं की जाएगी। इस विरोध प्रदर्शन ने न केवल यातायात को ठप किया है, बल्कि सत्ता के गलियारों में बैठे उन जिम्मेदारों को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है, जो राजस्व के लालच में मासूम बच्चों के भविष्य और सनातन संस्कृति की पवित्रता से खिलवाड़ कर रहे हैं।

धार्मिक आस्था के केंद्र और शिक्षा के मंदिरों के ठीक बीचों-बीच मधुशाला का यह निर्माण उस जख्म पर नमक छिड़कने जैसा है, जिसे समाज कभी स्वीकार नहीं करेगा। बिहारी दास दीमानपुर, जो उत्तराखंड के महामंडलेश्वर और विश्वकर्मा समाज के गौरव हैं, उन्होंने अत्यंत व्यथित स्वर में इस अनर्थ पर अपनी आवाज बुलंद की है। महामंडलेश्वर जी का कहना है कि जहां एक ओर देवी का भव्य मेला सजता है, हनुमान जी की प्रतिमा साक्षात विराजमान है, और छठ पूजा का पवित्र स्थल है, वहां शराब की दुकानों का अस्तित्व किसी पाप से कम नहीं है। उन्होंने प्रशासन के कानों तक यह बात पहुंचाने की कोशिश की है कि पास में ही बच्चों के स्कूल हैं और इस मुख्य मार्ग से गुजरने वाले छात्रों के मन-मस्तिष्क पर इस शराबी माहौल का क्या प्रभाव पड़ेगा? उनके अनुसार, यह लड़ाई केवल एक दुकान को हटाने की नहीं है, बल्कि काशीपुर की आने वाली पीढ़ियों के चरित्र को बचाने की एक पवित्र जंग है, जिसमें मोदी सरकार और स्थानीय नेता अजय भट्ट से तत्काल हस्तक्षेप की उम्मीद की जा रही है।

विरोध की इस तपिश में पूर्वांचल समाज का आक्रोश घी का काम कर रहा है, क्योंकि जिस स्थान पर यह ठेका प्रस्तावित है, वहां से चंद कदमों की दूरी पर छठ मैया का पावन घाट स्थित है। पूर्वांचल छठ सेवा एवं जन कल्याण समिति के अध्यक्ष ने प्रशासन को चेताते हुए कहा कि यह स्थल हजारों लोगों की आस्था का केंद्र है, जहां महिलाएं निर्जला व्रत रखकर सूर्य देव को अर्घ्य देती हैं। उनके अनुसार, इस घाट के महज २०० मीटर के दायरे में राधे हरी डिग्री कॉलेज और जागेश्वर महादेव का प्राचीन मंदिर है। इतना ही नहीं, सुप्रसिद्ध बाल सुंदरी मंदिर भी यहां से अत्यंत निकट है। प्रशासन की आंखों पर बंधी पट्टी का आलम यह है कि नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए चौती चौराहे के पास इस शराब की भट्टी को अनुमति दे दी गई, जबकि नियमतः शिक्षण संस्थानों और देवालयों के पास ऐसी गतिविधियां प्रतिबंधित हैं। यह जनता की भावनाओं के साथ क्रूर मजाक है, जिसे अब और सहन करना असंभव हो गया है।

आक्रोशित भीड़ में शामिल एक समाजसेवी, जो स्वयं गोरखपुर की क्रांतिकारी मिट्टी से ताल्लुक रखते हैं, उन्होंने एक हृदयविदारक घटना का जिक्र करते हुए प्रशासन को आईना दिखाया। उन्होंने बताया कि कल ही एक शराबी ने दुकान से बोतल खरीदी और उसी पावन छठ घाट पर बैठकर शराब पी, जहां बहनें पूजा करती हैं। हद तो तब हो गई जब उसने वह खाली बोतल उसी पवित्र जलकुंड में फेंक दी। यह दृश्य देखकर वहां मौजूद लोगों का खून खौल उठा। समाजसेवी ने कड़े लहजे में कहा कि जब हमारी माताएं-बहनें तीन दिनों तक निर्जल उपवास रखकर वहां पहुंचेंगी, तो क्या वे कांच के टुकड़ों पर चलेंगी? क्या वे शराब की बदबू के बीच अपनी आस्था प्रकट करेंगी? उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि इस ठेके को तुरंत अन्यत्र स्थानांतरित नहीं किया गया, तो वे पूरे काशीपुर को बंद कर देंगे। उनके शब्दों में श्चाहे जेल जाना पड़े या प्राणों की आहुति देनी पड़ेश्, लेकिन धर्मस्थल के पास इस कलंक को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

आंदोलन के बीच बलिया जिले की एक जुझारू महिला ने सिसकते हुए अपनी व्यथा साझा की, जो शराब के कारण उजड़ते परिवारों की मूक गवाह है। उन्होंने दो टूक कहा कि शराब केवल नशा नहीं है, बल्कि यह घर की सुख-शांति को लील जाने वाला दानव है। केशवपुरम की रहने वाली एक अन्य महिला ने बताया कि चौती चौराहे पर उनकी दुकान है और वे रोज देखती हैं कि किस तरह शराब पीकर लोग बहन-बेटियों पर अभद्र फब्तियां कसते हैं। इन महिलाओं का तर्क है कि प्रशासन यहां शराब की जगह कपड़ों की या अन्य उपयोगी सामानों की दुकान क्यों नहीं खुलवाता? समाज को बर्बाद करने वाले इन अड्डों के बगल में ही अब कथित तौर पर मांस की दुकानें खोलने की भी तैयारी है, जो सनातन धर्म की मर्यादाओं पर सीधा प्रहार है। महिलाओं ने साफ कर दिया है कि वे अब टेंट लगाकर यहीं बैठेंगी और जब तक आबकारी विभाग अपनी तानाशाही वापस नहीं लेता, यह धरना खत्म नहीं होगा।

शांति व्यवस्था बनाए रखने पहुंचे पुलिस प्रशासन और आबकारी विभाग के अधिकारियों को भी जनता के तीखे सवालों का सामना करना पड़ा। हालांकि प्रशासन ने आश्वासन दिया है कि वे उच्चाधिकारियों और आबकारी विभाग से इस विषय पर वार्ता कर रहे हैं, लेकिन प्रदर्शनकारी अब केवल वादों से संतुष्ट होने वाले नहीं हैं। महामंडलेश्वर और समाजसेवी ने स्पष्ट किया है कि जब तक ठेका पूरी तरह से बंद या शिफ्ट नहीं होता, तब तक एक कील भी वहां नहीं लगने दी जाएगी। उन्होंने पांच तत्वोंकृभूमि, गगन, वायु, अग्नि और नीरकृका हवाला देते हुए कहा कि जो प्रकृति और ईश्वर के साथ खिलवाड़ करता है, उसका विनाश निश्चित है। केदारनाथ की त्रासदी का उदाहरण देते हुए उन्होंने काशीपुर वासियों को आगाह किया कि यदि आज वे अपनी आस्था के सम्मान में खड़े नहीं हुए, तो आने वाले समय में तबाही को कोई नहीं रोक पाएगा। अब सबकी निगाहें प्रशासन के अगले कदम पर टिकी हैं कि वह जनभावनाओं को चुनता है या शराब माफिया के सिंडिकेट को।

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