देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति और सत्ता के गलियारों में इन दिनों सबसे ज़्यादा चर्चा उस खर्च की हो रही है, जो जनता की आंखों से ओझल रहते हुए भी करोड़ों में गिना जा रहा है। यह खर्च विकास योजनाओं या जनहित के कामों पर नहीं, बल्कि प्रचार-प्रसार और छवि निर्माण पर बहाया गया है। बीते पांच वर्षों में उत्तराखंड की भारतीय जनता पार्टी सरकार ने विज्ञापनों के जरिए जनता तक अपने संदेश पहुंचाने में लगभग 1001.07 करोड़ रुपये खर्च किए हैं। यह आंकड़ा इतना बड़ा है कि औसतन हर दिन करीब 55 लाख रुपये सिर्फ प्रचार के लिए निकाले गए। दिलचस्प यह है कि जब भी किसी बड़े धार्मिक आयोजन, त्यौहार या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यक्रम से जुड़ी कवरेज हुई, तो विज्ञापनों का यह सिलसिला और तेज हो गया।
केदारनाथ यात्रा के समय 5 नवंबर 2021 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आगमन ने पूरे देश का ध्यान उत्तराखंड की ओर खींचा था। इस दौरान प्रदेश की पुष्कर सिंह धामी सरकार ने राज्यवासियों को एसएमएस और व्हाट्सएप संदेशों के माध्यम से प्रधानमंत्री की यात्रा की जानकारी और संदेश भेजे। इन संदेशों की कीमत 49.73 लाख रुपये बताई गई है। यानी सिर्फ एक कार्यक्रम के प्रचार में आधे करोड़ रुपये खर्च कर दिए गए। यही नहीं, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा भेजे गए कई अन्य संदेश भी जनता के मोबाइल तक पहुंचे, जिनमें शुभकामनाएं और सरकारी योजनाओं के प्रचार शामिल थे। यह वे संदेश हैं जिन्हें बहुतों ने शायद कभी पढ़ा भी नहीं, लेकिन सरकारी खजाने से इन पर लाखों रुपये खर्च कर दिए गए।
पिछले साल जुलाई 2024 में हरेला पर्व के मौके पर भी कुछ ऐसा ही हुआ। राज्य के हर नागरिक को व्हाट्सएप के जरिए बधाई संदेश भेजा गया, जिस पर 37.48 लाख रुपये की लागत आई। एक महीने बाद, अगस्त में फिर से हरेला की शुभकामनाएं भेजी गईं, और इस बार 37.45 लाख रुपये खर्च किए गए। यानी एक ही त्योहार पर दो अलग मौकों पर बधाई देने में कुल 75 लाख रुपये खर्च हुए। यह वही दौर था जब उत्तराखंड सरकार के विज्ञापन सिनेमा हॉल, टीवी और सोशल मीडिया तक हर जगह दिखाई दे रहे थे। साल 2023-24 में अकेले पीवीआर सिनेमाघरों में दिखाए गए विज्ञापनों पर ही 17.44 करोड़ रुपये की राशि खर्च की गई।
यह खर्चे केवल बधाइयों तक सीमित नहीं हैं। आंकड़े बताते हैं कि पुष्कर सिंह धामी के मुख्यमंत्री बनने के बाद विज्ञापनों का बजट कई गुना बढ़ गया। वर्ष 2020-21 में जब त्रिवेंद्र सिंह रावत मुख्यमंत्री थे, तब कुल 77.71 करोड़ रुपये विज्ञापन पर खर्च हुए थे। मार्च 2021 में उनके इस्तीफे के बाद तीरथ सिंह रावत ने मुख्यमंत्री पद संभाला, लेकिन कुछ ही महीनों बाद जुलाई में उन्होंने भी पद छोड़ दिया। इसके बाद जब पुष्कर सिंह धामी सत्ता में आए, तो विज्ञापन बजट ने मानो रफ़्तार पकड़ ली। साल 2021-22 में यह खर्च सीधे चार गुना बढ़कर 227.35 करोड़ रुपये तक पहुंच गया, और फिर बढ़ते-बढ़ते 2024-25 में यह 290.29 करोड़ रुपये पर जा पहुंचा।

सरकार के दस्तावेज बताते हैं कि प्रचार-प्रसार के इस सिलसिले में सबसे बड़ा हिस्सा टेलीविजन मीडिया को मिला है। पिछले पांच वर्षों में राज्य सरकार ने टीवी चौनलों को कुल 427 करोड़ रुपये के विज्ञापन दिए हैं। इनमें से 402 करोड़ रुपये सिर्फ पिछले चार सालों में जारी किए गए, यानी वह समय जब पुष्कर सिंह धामी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर थे। टेलीविजन के बाद सबसे बड़ा खर्च समाचार पत्रों, डिजिटल प्लेटफॉर्म और आउटडोर मीडिया पर हुआ। अखबारों को 129.6 करोड़ रुपये, डिजिटल विज्ञापनों पर 61.9 करोड़, रेडियो पर 30.9 करोड़, फिल्म और थिएटर विज्ञापनों पर 23.4 करोड़, जबकि एसएमएस, बैनर और पुस्तिकाओं पर 226 करोड़ रुपये से अधिक की राशि खर्च की गई।
बीजेपी सरकार ने न केवल प्रदेश के क्षेत्रीय चौनलों को बल्कि देशभर में प्रसारित होने वाले राष्ट्रीय समाचार चौनलों को भी जमकर विज्ञापन दिए। यहां तक कि नागालैंड, ओडिशा और असम जैसे राज्यों के चौनलों को भी उत्तराखंड सरकार से करोड़ों रुपये के विज्ञापन मिले। राष्ट्रीय चौनलों को दिए गए कुल 105.7 करोड़ रुपये में सबसे बड़ा हिस्सा नेटवर्क 18 समूह के पास गया, जो रिलायंस के स्वामित्व में है। बीते वित्त वर्ष 2024-25 में अकेले इस समूह को 5.69 करोड़ रुपये के विज्ञापन मिले। टाइम्स नाउ को 4.79 करोड़ और टीवी टुडे नेटवर्क (आजतक) को 4.62 करोड़ रुपये मिले। वहीं एनडीटीवी, जिसे हाल ही में अडाणी समूह ने खरीदा था, को पहली बार 2.88 करोड़ रुपये की राशि प्राप्त हुई।
क्षेत्रीय चौनलों की बात करें तो उन्हें राष्ट्रीय चौनलों से कहीं ज़्यादा 296.8 करोड़ रुपये दिए गए। 2021-22 के विधानसभा चुनाव वर्ष में ही इन चौनलों को लगभग 98.79 करोड़ रुपये के विज्ञापन दिए गए। कुल 38 क्षेत्रीय चौनलों को यह राशि मिली, जिनमें से 15 चौनलों को तीन से चार करोड़ रुपये तक का भुगतान हुआ। चुनावी वर्ष में यह प्रचार इतना बढ़ गया था कि राज्यभर में सरकारी योजनाओं और उपलब्धियों के विज्ञापन हर अखबार, टीवी चौनल और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर छा गए थे।
अब जब आंकड़े सामने आए हैं, तो यह साफ दिखता है कि उत्तराखंड में प्रचार-प्रसार का यह सिलसिला केवल सूचना का माध्यम नहीं, बल्कि सत्ता की रणनीति बन चुका है। जिस राज्य का सालाना बजट सीमित संसाधनों और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों से जूझता है, वहां विज्ञापनों पर हजार करोड़ रुपये से अधिक का खर्च जनता के बीच सवाल खड़े करता है। यह भी सोचने वाली बात है कि जब आम नागरिक स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहा है, तब सरकारी धन का इतना बड़ा हिस्सा प्रचार में खर्च करना कितना उचित है। उत्तराखंड की जनता शायद अब यह जानना चाहेगी कि क्या इस प्रचार के पीछे विकास छिपा है, या विकास की कहानी सिर्फ विज्ञापनों में सिमटकर रह गई है।



