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द्रोणा सागर पर इकतीस हज़ार दीपों से जगमगाएगा आस्था और संस्कृति का भव्य दीपोत्सव

भक्ति, संस्कृति और एकता के संगम में बदलने जा रहा है द्रोणा सागर, जहां इकतीस हज़ार दीपों की लौ से गूंजेगा आस्था का आलोक पर्व

काशीपुर। इस वर्ष का दीपोत्सव द्रोणा सागर तीर्थ पर पहले से कहीं अधिक भव्य और आकर्षक रूप में सामने आने जा रहा है, जब 16 अक्टूबर की संध्या इस पौराणिक सरोवर की लहरों पर इकतीस हज़ार दीपों की लौ एक साथ झिलमिलाएगी। आयोजन का सूत्रधार हिंदू राष्ट्र शक्ति संगठन है, जो इस अनूठे पर्व को “एक दिया मेरा भी प्रभु को समर्पित” की भावना के तहत भक्ति, एकता और संस्कृति के संगम के रूप में साकार कर रहा है। आयोजन की गरिमा तब और बढ़ जाएगी जब हरियाणा के पटौदी स्थित हरि मंदिर के महामंडलेश्वर स्वामी धर्मदेव जी अपने आशीर्वचन देंगे। सांय चार बजे आरंभ होने वाले दिवाली मेले में जहां खाद्य सामग्री से लेकर हस्तशिल्प की झलक देखने को मिलेगी, वहीं पांच बजे पूज्य महामंडलेश्वर जी के प्रवचन और इसके बाद सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से वातावरण भक्तिमय हो उठेगा। जैसे ही घड़ी शाम के छह बजाएगी, दीप प्रज्ज्वलन का नजारा द्रोणा सागर को स्वर्णिम आलोक से भर देगा।

हिंदू राष्ट्र शक्ति के राष्ट्रीय प्रभारी संजय भाटिया और जिला अध्यक्ष गौरव गुप्ता का कहना है कि इस आयोजन का उद्देश्य केवल दीपों की रौशनी नहीं, बल्कि भारतीय परंपरा और उत्सव की आत्मा को समाज के हर वर्ग तक पहुँचाना है। लोकगीत, पारंपरिक नृत्य और धार्मिक प्रस्तुतियाँ इस दीपोत्सव को ऐसी छटा देंगी कि पूरा क्षेत्र भक्ति, उल्लास और एकता के रंगों में रंग जाएगा। उन्होंने बताया कि तैयारियाँ लगभग पूर्ण हो चुकी हैं और सैकड़ों धर्मप्रेमी इस कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए तन-मन से जुटे हुए हैं। इस बार का आयोजन इसलिए भी खास रहेगा क्योंकि इसमें पहली बार सांस्कृतिक संध्या के साथ एक भव्य दीपावली मेला भी जोड़ा गया है, जिससे स्थानीय शिल्पियों, दुकानदारों और कलाकारों को अपनी प्रतिभा दिखाने और परंपरागत संस्कृति को जीवंत करने का अवसर मिलेगा।

आयोजन से जुड़े आयोजक संजय भाटिया ने बताया कि यह दीपोत्सव दरअसल पांचवां वर्ष है जब हिंदू राष्ट्र शक्ति के बैनर तले द्रोणा सागर के तट पर दीपों का यह सागर जलाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि इस बार स्वरूप में बदलाव करते हुए एक विशाल सांस्कृतिक संध्या का आयोजन जोड़ा गया है ताकि लोग भक्ति के साथ-साथ आनंद और उल्लास का भी अनुभव कर सकें। शहर के अनेक एनजीओ और व्यापारी भी इस महोत्सव में सहयोग कर रहे हैं। दीवाली मेले में बच्चों के लिए खिलौने, मिठाइयाँ, चाट, टिक्की, पिज़्जा और बर्गर जैसे आकर्षक स्टॉल लगाए जा रहे हैं ताकि परिवारों को एक ही स्थल पर उत्सव का पूरा आनंद मिल सके। संजय भाटिया ने यह भी कहा कि गरीब तबके के दुकानदारों को भी अवसर देने के लिए किसी भी स्टॉल से किराया नहीं लिया जा रहा है। आयोजन समिति ने सभी को टेंट, कुर्सियाँ और रोशनी की सुविधाएँ निःशुल्क उपलब्ध कराई हैं ताकि कोई भी परिवार आर्थिक कारणों से इस आनंद से वंचित न रह जाए।

दीपक बाली के सुझाव पर लिए गए इस निर्णय की विशेष सराहना की जा रही है क्योंकि यह आम नागरिकों को भी व्यापार का अवसर देता है। आयोजकों ने उम्मीद जताई कि स्थानीय दुकानदार सस्ते और उचित दामों पर बिक्री कर सभी के दीपोत्सव को खुशियों से भर देंगे। इस वर्ष इकतीस हज़ार दीपों का प्रज्ज्वलन होगा और साथ ही एक भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम की प्रस्तुति होगी जिसमें संभल से आई नृत्य मंडली अपनी प्रस्तुति से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देगी। संजय भाटिया ने कहा कि इस वर्ष का आयोजन भक्तों को ऐसा अनुभव देगा जो उन्हें प्रभु श्रीराम के दर्शन की भावना में डुबो देगा। उन्होंने कहा कि “रामलला विराजमान हैं और द्रोणा सागर पर दीपों की रौशनी में उनका विराट स्वरूप देखने का सौभाग्य मिलेगा। यह दीपोत्सव श्रद्धा, ऊर्जा और सांस्कृतिक गौरव का जीवंत प्रमाण बनेगा।”

हिंदू राष्ट्र शक्ति के जिला अध्यक्ष गौरव गुप्ता ने बताया कि द्रोणा सागर को आयोजन स्थल के रूप में चुनने के पीछे गहरा आध्यात्मिक और ऐतिहासिक कारण है। उन्होंने कहा कि हमें अपनी संस्कृति और इतिहास से जुड़ने की आवश्यकता है, क्योंकि हमारे पौराणिक ग्रंथ सिर्फ कथाएँ नहीं बल्कि इतिहास का जीवंत दस्तावेज़ हैं। महाभारत कालीन इस तीर्थ स्थल की पवित्रता और गौरव को पुनर्जीवित करना ही इस आयोजन का उद्देश्य है। उन्होंने बताया कि यही वह स्थान है जहाँ आचार्य द्रोणाचार्य ने एकलव्य से गुरु दक्षिणा में अंगूठा मांगा था और अर्जुन से भव्य सरोवर का निर्माण कराया था। यही उनका विशाल आश्रम क्षेत्र था, जहाँ केवल शस्त्र ही नहीं बल्कि शास्त्र, विज्ञान और संस्कृति की शिक्षा दी जाती थी। नकुल-सहदेव द्वारा निर्मित मुटेश्वर महादेव और नीलकंठ महादेव जैसे अनेक मंदिर इस क्षेत्र की आध्यात्मिक विरासत के प्रतीक हैं।

गौरव गुप्ता ने यह भी कहा कि पचास वर्ष पूर्व तक द्रोणा सागर तीर्थ का स्वरूप इतना पवित्र था कि चारधाम यात्रा पर निकलने वाले यात्री यहाँ स्नान कर अपनी यात्रा का शुभारंभ करते थे। घाटों पर स्नान करने से ऐसा पुण्य प्राप्त होता था जो देश की सभी पवित्र नदियों में स्नान करने के समान माना जाता था। कार्तिक मास का विशेष महत्व बताते हुए उन्होंने कहा कि इस मास में एक दीपक का प्रज्ज्वलन भी पितरों को प्रसन्न कर देता है, इसी कारण इस मास का चयन किया गया है। आयोजकों ने आशा व्यक्त की है कि इस वर्ष का द्रोणा सागर दीपोत्सव न केवल आस्था का पर्व बनेगा बल्कि भारतीय परंपरा और सामाजिक समरसता की अद्भुत मिसाल भी पेश करेगा, जब आकाश में दीपों की लौ और मन में भक्ति का उजास एक साथ फैल जाएगा।

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कांग्रेस अध्यक्ष अलका पाल

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