उत्तराखण्ड। दीपावली की रौशनी इस बार उत्तराखंड में कुछ अलग ही रंग बिखेर गई। जहां एक ओर हर घर में दीयों की लौ टिमटिमा रही थी, वहीं दूसरी ओर शराब की बोतलों की चमक ने इस रौशनी को एक नया अंदाज़ दे दिया। खुशियों के इस पर्व पर मिठाइयों से ज़्यादा गिलासों की छनक सुनाई दी। आंकड़े बताते हैं कि इस बार शराब बिक्री ने सारे पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए। महज़ 15 दिनों के भीतर छह लाख सड़सठ हज़ार पेटियां शराब की बिक गईं, और सरकार के खजाने में तीन सौ सड़सठ करोड़ रुपए से ज़्यादा की आमदनी दर्ज की गई। दीपावली के नाम पर जहां हर साल मिठास बिखरती है, वहीं इस बार मस्ती का रंग इतना गहरा था कि बोतलें दुकानों से गायब हो गईं। कहने को त्यौहार रौशनी का था, लेकिन इस बार देवभूमि में दीयों से ज़्यादा बोतलों की जगमगाहट नज़र आई।
देहरादून से लेकर हल्द्वानी तक, हरिद्वार से लेकर काशीपुर तक, हर शहर की शराब दुकानों पर भीड़ का आलम ऐसा था कि लाइनों में खड़े लोग खुद त्योहार का हिस्सा बन गए। जाम के नाम पर सड़कों पर भी जाम लग गए। दुकानदारों के चेहरे पर मुस्कान ऐसी थी मानो दीयों की लौ उनके गालों पर झिलमिला रही हो। हर ब्रांड की बोतल देखते ही देखते गायब होती चली गई। जो स्टॉक त्योहार तक चलने की उम्मीद थी, वह दीपावली की शाम से पहले ही खत्म हो गया। कई जगह तो दुकानों पर लिखा मिला – “स्टॉक खत्म, अगली सप्लाई कल।” लोग कहते हैं कि दीपावली पर सोना और चांदी बिकते हैं, मगर इस बार उत्तराखंड में सबसे बड़ी चमक शराब की बोतलों में नजर आई। यह वह चमक थी जिसने सरकार से लेकर व्यापारियों तक सबके चेहरों पर संतोष का नशा चढ़ा दिया।
आबकारी आयुक्त अनुराधा पाल के अनुसार इस बार पिछले साल के मुकाबले शराब की बिक्री में 20 से 25 प्रतिशत तक का उछाल दर्ज हुआ है। बीते साल जहां यह आंकड़ा लगभग तीन सौ करोड़ रुपये तक पहुंचा था, वहीं इस बार यह बढ़कर तीन सौ सड़सठ करोड़ के पार निकल गया। यानी हर चौथी बोतल पिछले साल की तुलना में ज़्यादा बिकी। अनुराधा पाल ने बताया कि शराब बिक्री से राज्य के राजस्व में अभूतपूर्व बढ़ोतरी हुई है। दीपावली से पहले के सप्ताह में देहरादून, नैनीताल, ऊधमसिंह नगर और हरिद्वार जिलों में शराब की खपत अपने उच्चतम स्तर पर रही। शराब के थोक विक्रेताओं ने बताया कि इतनी तेज़ बिक्री उन्होंने पिछले कई वर्षों में नहीं देखी थी। कुछ दुकानों पर तो ग्राहकों को रात तक इंतज़ार करना पड़ा। राज्य में शराब की मांग का यह उछाल अब एक आर्थिक रिकॉर्ड के रूप में दर्ज हो गया है।

जहां एक ओर व्यापारियों ने बिक्री बढ़ने पर खुशी जताई, वहीं कई सामाजिक संगठनों ने इस बढ़ती खपत पर चिंता भी जताई है। उनका कहना है कि दीपावली जैसे धार्मिक और पारिवारिक पर्व का संबंध भक्ति और स्नेह से होना चाहिए, लेकिन अब यह नशे के व्यापार में तब्दील होता जा रहा है। शहरों में दीयों की रोशनी के साथ बोतलों की चमक भी टकराने लगी है। देहरादून की सड़कों पर जश्न का रंग कुछ ऐसा था कि कई जगहों पर लोग नाचते-गाते जाम छलकाते नजर आए। हरिद्वार जैसे धार्मिक शहर में भी शराब दुकानों के बाहर भीड़ देखकर कई लोग हैरान रह गए। हल्द्वानी और काशीपुर में शराब की मांग इतनी बढ़ी कि कई दुकानों ने अतिरिक्त स्टॉक मंगवाने का आदेश दिया। इस बार की दीवाली में नशे और रोशनी का संगम एक अजीब-सी तस्वीर पेश कर गया।
आर्थिक दृष्टि से देखें तो सरकार को इस रिकॉर्ड बिक्री से भारी राजस्व मिला। राज्य के राजस्व खाते में आई यह आमदनी कई अन्य योजनाओं को गति देने में मदद करेगी। लेकिन सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या त्योहार की खुशी अब बोतलों के साथ ही पूरी होगी? क्या समाज की खुशियों का पैमाना अब शराब की बिक्री से मापा जाएगा? उत्तराखंड जिसे देवभूमि कहा जाता है, जहां हर पर्व भगवान की आराधना से आरंभ होता है, वहां अब शराब बिक्री के आंकड़े ही सुर्खियों में हैं। यह बदलाव केवल आंकड़ों का नहीं, बल्कि सोच का भी है, जहां त्योहार का अर्थ धीरे-धीरे बदल रहा है। दीपावली की दीयों की लौ और बोतलों की चमक अब जैसे साथ-साथ झिलमिलाने लगी हैं।
इस साल दीपावली ने उत्तराखंड में एक नया अध्याय लिखा—जहां देवताओं की भूमि ने मदिरा के कारोबार में अद्भुत उछाल देखा। व्यापारी खुश हैं, विभाग प्रसन्न है और सरकार के चेहरे पर भी मुस्कान झलक रही है, क्योंकि राजस्व में वृद्धि का मतलब प्रशासनिक राहत है। मगर समाज के कुछ कोनों में यह सवाल अब भी तैर रहा है कि क्या रौशनी की पवित्रता अब मस्ती के नशे में डूबती जा रही है। दीयों की लौ से ज़्यादा अगर बोतलों की चमक गवाही दे रही है, तो यह केवल आंकड़ों की बात नहीं, बल्कि सामाजिक चिंतन का विषय भी है। दीपावली बीत गई, पर इस बार की बिक्री का रिकॉर्ड इतिहास में दर्ज हो गया—खुशियों के संग नशे का अद्भुत मिश्रण, जिसने देवभूमि को सोचने पर मजबूर कर दिया कि रौशनी की असली चमक आखिर कहां है—दीयों में या जाम के जश्न में।



