रामनगर(सुनील कोठारी)।उत्तराखंड में भर्ती परीक्षाओं की विश्वसनीयता पर उठ रहे सवाल एक बार फिर तेज हो गए हैं, क्योंकि राज्य में नकल और पेपर लीक की घटनाएँ लगातार सामने आ रही हैं। अनेक सख़्त प्रावधानों के बावजूद यह घटनाएँ जिस तरह बिना रुके सामने आ रही हैं, उससे एक ओर परीक्षाओं की पारदर्शिता पर गहरी चोट पड़ती है तो दूसरी ओर यह सिस्टम की कमजोरी को भी उजागर करती है। आश्चर्य इस बात का भी है कि उत्तराखंड सरकार द्वारा बनाए गए बेहद कठोर नकलरोधी कानून—जिसमें आजीवन कारावास से लेकर 10 करोड़ रुपये तक का दंड शामिल है—उसके बावजूद “मुन्ना भाई” गिरोहों का खौफ कम नहीं हुआ है। हालात इतने बिगड़ गए हैं कि राज्य सरकार को यूकेएसएसएससी (UKSSSC) पेपर लीक प्रकरण में सीबीआई जांच की संस्तुति करनी पड़ी। लेकिन कानून की कठोरता और जांच एजेंसियों की सक्रियता के बाद भी जो घटनाएँ हाल में सामने आई हैं, वह दिखाती हैं कि नकल माफिया से जुड़े लोग अभी भी नए-नए तरीके अपनाकर सिस्टम को चुनौती दे रहे हैं। देहरादून से लेकर नैनीताल और कुमाऊं तक, कई जगह परीक्षाओं के दौरान पकड़े गए नकलचियों ने ये संकेत दिए हैं कि यह नेटवर्क केवल छात्रों तक सीमित नहीं बल्कि इसके पीछे किसी बड़े संगठित गिरोह की भूमिका भी हो सकती है।
देहरादून में मंगलवार 2 दिसंबर को सामने आए मामले ने एक बार फिर परीक्षा सुरक्षा पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए। पटेल नगर क्षेत्र के एक परीक्षा केंद्र में रेलवे भर्ती बोर्ड की कंप्यूटर आधारित परीक्षा में बैठे 22 वर्षीय विवेक, निवासी दादरी हरियाणा, को मौके पर गिरफ्तार किया गया। यह परीक्षार्थी एक विशेष मैसेंजर ऐप के जरिए बाहर बैठे लोगों से हल किए हुए प्रश्न प्राप्त कर रहा था। पूछताछ में आरोपी ने खुलासा किया कि उसने हरियाणा के ही एक व्यक्ति से चार लाख रुपये में डील की थी, जिसमें उसे पेपर के प्रश्नों के जवाब परीक्षा के दौरान भेजे जाने थे। पुलिस की तलाशी में एक पर्ची, मोबाइल फोन और कई संदिग्ध चैट मिले हैं। आरोपी ने बताया कि उसके सहयोगी परीक्षा केंद्र के पास ही बैठकर उसे मैसेंजर के माध्यम से लगातार जवाब भेजने की तैयारी में थे, लेकिन पुलिस ने सख़्त निगरानी के चलते परीक्षा शुरू होने से पहले ही उसे पकड़ा। पुलिस अब इस बात की गहराई से जांच कर रही है कि हरियाणा से जुड़े कौन लोग इस नेटवर्क को चला रहे हैं और क्या यह गिरोह अन्य परीक्षाओं में भी सेंधमारी करता रहा है। प्रारंभिक जानकारी से संकेत मिले हैं कि यह कोई छोटा नेटवर्क नहीं बल्कि संगठित रूप से पैसे लेकर परीक्षा पास करवाने की गारंटी देने वाला गिरोह है।
उधर कुमाऊं क्षेत्र में भी नकल का खेल थमने का नाम नहीं ले रहा। नैनीताल स्थित कुमाऊं विश्वविद्यालय में विषम सेमेस्टर की परीक्षा के दौरान बीएससी की एक छात्रा को मोबाइल से नकल करते हुए पकड़ा गया। विश्वविद्यालय के डॉ. दीपक कुमार, जो परीक्षा प्रभारी थे, ने बताया कि छात्रा दो शिफ्टों की परीक्षा में शामिल थी और वह अपने साथ मोबाइल फोन छिपाकर लाई थी। परीक्षा के दौरान जब निगरानी टीम ने उसके व्यवहार पर संदेह जताया और उसके पास जाकर जांच की, तो मोबाइल फोन में प्रश्नों से संबंधित सामग्री खुली हुई मिली। इसके बाद छात्रा का मोबाइल तुरंत जब्त कर लिया गया और उसे परीक्षा से बाहर कर दिया गया। विश्वविद्यालय प्रशासन अलग से कार्रवाई करने की तैयारी में है, हालांकि अभी तक पुलिस में कोई मुकदमा दर्ज नहीं कराया गया है। यह घटना स्पष्ट करती है कि नकलरोधी कानून के बावजूद कई छात्र जोखिम उठाने से पीछे नहीं हट रहे हैं और नकल को आसान उपाय समझने की मानसिकता खत्म नहीं हो पा रही है।

पिछले महीने भी देहरादून से एक बड़ा मामला सामने आया था, जब एसएससी ग्रुप-बी की परीक्षा के दौरान एक परीक्षार्थी दीपक, जो हरियाणा का रहने वाला था, को ब्लूटूथ डिवाइस के माध्यम से नकल करते हुए पकड़ा गया। परीक्षा स्टाफ के अनुसार दीपक ने परीक्षा शुरू होते ही बाथरूम जाने का बहाना बनाया और बाहर जाकर ब्लूटूथ सेटअप को सक्रिय कर लिया। लौटने पर जब उसकी तलाशी ली गई तो उसके कान में छुपाया गया ब्लूटूथ और जेब में इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस बरामद हुआ। पूछताछ में सामने आया कि परीक्षा केंद्र में ही तैनात लकी सिंह नामक सपोर्टिंग स्टाफ ने उसे यह डिवाइस उपलब्ध कराया था। पुलिस ने दीपक को तो मौके पर ही गिरफ्तार कर लिया, लेकिन लकी सिंह फरार हो गया। यह मामला इस बात का प्रमाण है कि नकल का नेटवर्क केवल परीक्षार्थियों तक सीमित नहीं, बल्कि अंदरूनी स्टाफ भी इसमें शामिल हो रहा है, जो जोखिम को कई गुना बढ़ा देता है।
सबसे चर्चित मामला तो 21 सितंबर 2025 को यूकेएसएसएससी द्वारा आयोजित परीक्षा में सामने आया। परीक्षा शुरू होने के महज आधे घंटे बाद ही प्रश्नपत्र के कई हिस्से किसी तरह बाहर पहुंच गए और फिर सोशल मीडिया पर वायरल हो गए। इस घटना ने राज्य में भूचाल ला दिया। एसआईटी ने जांच शुरू की और कुछ ही समय बाद मुख्य आरोपी खालिद और उसकी बहन साबिया को गिरफ्तार कर लिया। युवाओं के बड़े विरोध के बाद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मामले की जांच सीबीआई को सौंपने का फैसला किया। बाद में 28 नवंबर को सीबीआई ने असिस्टेंट प्रोफेसर सुमन को भी गिरफ्तार किया। आरोप है कि सुमन ने लीक हुए प्रश्नपत्र को हल कराने में अहम भूमिका निभाई थी। यह मामला राज्य की सबसे बड़ी भर्ती परीक्षा धांधलियों में से एक माना जा रहा है और अभी भी इसकी जांच जारी है।
गौरतलब है कि 4 अगस्त 2025 को नैनीताल पुलिस ने एक ही दिन में नकल गिरोह से जुड़े 9 लोगों को गिरफ्तार किया था, जिनमें सुनील कुमार, परविंदर कुमार, रमाकांत, अभिषेक कुमार, विशाल गिरी, आफताब खान, अरुण कुमार, शिव सिंह और जसवीर सिंह शामिल थे। आरोपियों के पास से लैपटॉप, कई मोबाइल फोन और परीक्षा से जुड़े दस्तावेज मिले थे। पुलिस के अनुसार यह गिरोह हल्द्वानी में रहकर एसएससी परीक्षा में नकल करवाने की तैयारी कर रहा था। यह सभी लोग उत्तर प्रदेश और हरियाणा के विभिन्न जिलों से आए थे और पैसों की तंगी के चलते यह अपराध करने में जुटे थे। उनका लक्ष्य परीक्षा से पहले छात्रों से मोटी रकम लेकर उन्हें पास करवाना था, लेकिन पुलिस की समय पर की गई कार्रवाई ने इनके योजनाओं को विफल कर दिया।

इस पूरी स्थिति पर एसएसपी देहरादून अजय सिंह ने कड़ा संदेश देते हुए कहा कि छात्रों को समझना चाहिए कि यदि उनका नाम एक बार पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज हो गया, तो आगे किसी भी प्रतियोगी परीक्षा में शामिल होना लगभग असंभव हो जाएगा। नकलरोधी कानून बेहद कठोर है और इसका उल्लंघन करने वालों को कड़ी सजा भुगतनी पड़ेगी। वहीं एसएमजेएन पीजी कॉलेज हरिद्वार के प्रिंसिपल डॉ. सुनील बत्रा ने कहा कि नकल करने की सोच रखने वाले छात्र यह भूल जाते हैं कि पकड़े जाने पर सिर्फ वे ही नहीं, बल्कि उनका परिवार और आने वाली पीढ़ियाँ भी इसकी कीमत चुकाती हैं। परीक्षाओं की सुरक्षा इतनी मजबूत होती है कि बच निकलना लगभग नामुमकिन है, इसलिए किसी भी तरह की शॉर्टकट सोच भविष्य बर्बाद कर सकती है।
उत्तराखंड का नकलरोधी कानून देश के सबसे कठोर प्रावधानों में गिना जाने लगा है, जहाँ नकल कराने वाले संगठित गिरोहों पर आजीवन कारावास तक की सजा तय की गई है। कानून में यह भी प्रावधान है कि दोषी पाए जाने पर आरोपी पर 10 करोड़ रुपये तक का आर्थिक दंड लगाया जा सकता है और जाँच के दौरान ही उसकी चल–अचल संपत्ति जब्त करने की कार्यवाही भी शुरू हो जाती है। परीक्षा में नकल करते पकड़ाए जाने पर अभ्यर्थी को 10 साल तक की सज़ा और 10 लाख रुपये का जुर्माना भुगतना पड़ सकता है। आरोप पत्र दाखिल होने की तारीख से ऐसे उम्मीदवार 2 से 5 वर्ष तक सभी प्रतियोगी परीक्षाओं से निलंबित कर दिए जाते हैं, और दोष सिद्ध होते ही यह अवधि सीधे 10 साल कर दी जाती है। यदि कोई परीक्षार्थी दोबारा नकल करते हुए पकड़ा जाता है, तो आरोप पत्र से पाँच से दस साल तक का निलंबन अनिवार्य हो जाता है, और दोष साबित होने पर उसे जीवन भर किसी भी प्रतियोगी परीक्षा में शामिल होने का अधिकार हमेशा के लिए समाप्त कर दिया जाता है। राज्य सरकार का स्पष्ट संदेश है—जो परीक्षा प्रणाली से खिलवाड़ करेगा, वह न सिर्फ अपना भविष्य बल्कि जीवनभर की प्रतिष्ठा भी हमेशा के लिए खो देगा।



