रामनगर। दशकों से निरंतर वादों में उलझे रहे देवी चौड़—सुंदर खाल के ग्रामीणों का धैर्य आखिरकार टूट गया और उन्होंने कॉर्बेट नेशनल पार्क के धनगढ़ी गेट के पास जोरदार विरोध प्रदर्शन के रूप में अपने गुस्से का इजहार किया। सालों से चुनावी भाषणों में उनके गांव को “राजस्व गांव” का दर्जा देने और बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने के वादों ने अब तक सिर्फ आश्वासन के रूप में ही काम किया। बिजली, पानी और सड़क जैसी जरूरी सुविधाओं की कमी ग्रामीणों की जीवनशैली को प्रभावित कर रही थी। इसके चलते लोग अब सिर्फ राजनीतिक वादों से संतुष्ट नहीं हैं और अपने हक के लिए सड़कों पर उतरकर सरकार पर दबाव बनाने को मजबूर हो गए हैं।
सुबह से ही धरने पर बैठे ग्रामीणों ने सरकार की लचर नीतियों और वादाखिलाफी पर कड़ा विरोध दर्ज कराया। उनका कहना था कि हर चुनाव में नेताओं को उनके वोटों की परवाह होती है, लेकिन सत्ता में आने के बाद उनके गांव की समस्याएं जैसे हवा में विलीन हो जाती हैं। धरने पर उपस्थित लोग बड़े गुस्से में थे और उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि अब उन्हें सिर्फ आश्वासन नहीं चाहिए बल्कि ठोस कार्रवाई की आवश्यकता है। इस आंदोलन के जरिए ग्रामीण अपने अधिकारों की मांग को सत्ता के गलियारों तक पहुंचाना चाहते हैं।
धरने पर बैठे लोगों ने दो स्पष्ट मांगें रखीं—उनका गांव तत्काल राजस्व गांव के रूप में मान्यता पाए और बुनियादी जीवन-यापन की सुविधाएं जैसे बिजली, पानी और सड़क जैसी सुविधाएं मुहैया कराई जाएं। स्थानीय नागरिकों ने बताया कि वे वर्षों से इन अधिकारों के लिए आवाज़ उठाते आए हैं, लेकिन हमेशा नेताओं और प्रशासन की अनदेखी का सामना करना पड़ा। उन्होंने कहा कि विकास के नाम पर अब सिर्फ खाली वादों की कोई कीमत नहीं रह गई है। उनका संघर्ष अब परिणाम और कार्रवाई की दिशा में केंद्रित है, न कि केवल घोषणाओं पर।
धरने के दौरान ग्रामीणों ने जोरदार नारेबाजी की और उनका मुख्य नारा बार-बार गूंजता रहा—“जो सरकार निकम्मी है… वह सरकार बदलनी है!” इस नारे में उनके लंबे समय से चले आ रहे आक्रोश और निराशा का प्रतीक स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। ग्रामीणों का कहना है कि वे अब किसी भी प्रकार के बहलावे या राजनीतिक खेल में फंसने को तैयार नहीं हैं। उनका उद्देश्य साफ है—गांव के विकास और अधिकारों की सुनिश्चितता। यह आंदोलन इस बात का संदेश देता है कि ग्रामीण अब केवल आश्वासन नहीं, बल्कि ठोस और तात्कालिक कार्रवाई की उम्मीद रखते हैं।
स्थानीय निवासियों और धरने पर बैठे लोगों ने यह भी स्पष्ट किया कि उनकी समस्याओं का समाधान अब प्राथमिकता बन गया है। बिजली, पानी और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी ने ग्रामीणों की जिंदगी को कठिन बना दिया है। इसके अलावा, राजस्व गांव का दर्जा न मिलने से उन्हें सरकारी योजनाओं और विकास कार्यक्रमों से लाभ नहीं मिल पा रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने उनके हक की सुनवाई नहीं की, तो यह आंदोलन और व्यापक रूप ले सकता है। ग्रामीणों की एकजुटता और संघर्ष ने पूरे क्षेत्र में प्रशासन के लिए एक चुनौती खड़ी कर दी है।
सरकारों के लगातार वादाखिलाफी करने और उनके हकों को नजरअंदाज करने के कारण ग्रामीणों में नाराजगी बढ़ती जा रही है। उन्होंने कहा कि अब उन्हें विकास के नाम पर केवल दिखावे की योजनाएं नहीं चाहिए। उनका धरना इस बात की गवाही देता है कि लंबे समय से अनदेखी की गई समस्याएं अब उनके धैर्य की सीमा तक पहुंच चुकी हैं। स्थानीय लोग यह साफ कर चुके हैं कि वे केवल राजनीतिक भाषणों से संतुष्ट नहीं होंगे और यदि आवश्यक हुआ तो अपने हक के लिए और सशक्त आंदोलन करेंगे।
धरने में शामिल ग्रामीणों ने प्रशासन से यह भी मांग की कि उनके गांव की समस्याओं का त्वरित समाधान किया जाए। बिजली, पानी, सड़क जैसी बुनियादी सुविधाओं की आपूर्ति में देरी ग्रामीणों की रोजमर्रा की जिंदगी और शिक्षा-स्वास्थ्य जैसी प्राथमिक आवश्यकताओं पर नकारात्मक असर डाल रही है। उन्होंने कहा कि अब तक किए गए सभी वादे खोखले साबित हुए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि उनका संघर्ष केवल अपने अधिकारों की रक्षा के लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक मिसाल स्थापित करने के लिए है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि उनके संघर्ष का यह नया चरण इस बार और भी निर्णायक साबित होगा। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने जल्द ही उनके हकों की पूर्ति नहीं की, तो उनका आंदोलन और व्यापक और सशक्त रूप ले सकता है। ग्रामीणों का यह भी कहना था कि उनकी आवाज़ अब सत्ता के गलियारों तक जाएगी और किसी भी तरह के राजनीतिक बहलावे को वे स्वीकार नहीं करेंगे। उनका यह आंदोलन इस बात का प्रतीक है कि लोकतंत्र में जनता की आवाज़ को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
धरने के माध्यम से ग्रामीणों ने यह स्पष्ट किया कि अब वे केवल प्रतीकात्मक प्रदर्शन से संतुष्ट नहीं होंगे। उनका उद्देश्य ठोस परिणाम प्राप्त करना है और अपने गांव को राजस्व गांव का दर्जा दिलाना है। बिजली, पानी और सड़क जैसी बुनियादी आवश्यकताओं की आपूर्ति में कोई और देरी स्वीकार नहीं की जाएगी। स्थानीय निवासियों ने बताया कि यह संघर्ष उनकी पीढ़ियों के अधिकारों की रक्षा के लिए भी अहम है। उन्होंने कहा कि उनका धरना यह संदेश देता है कि अब विकास के नाम पर केवल घोषणाओं से काम नहीं चलेगा, बल्कि कार्रवाई जरूरी है।
अंततः धनगढ़ी गेट पर चल रहा यह धरना सरकारी वादों और असलियत के बीच का अंतर स्पष्ट रूप से दिखाता है। ग्रामीणों की आवाज़ ने यह संदेश दिया कि उनका धैर्य सीमित है और अब वे सिर्फ अपनी मांगों के पूरा होने तक पीछे नहीं हटेंगे। यह धरना यह प्रमाण है कि विकास केवल शब्दों से नहीं, बल्कि ठोस कार्यों और नीतियों से ही संभव है। ग्रामीणों का यह संघर्ष स्थानीय प्रशासन और सरकार के लिए चेतावनी के रूप में सामने आया है कि जनता की समस्याओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
ग्रामीणों की एकजुटता और उनकी मांगों की गंभीरता ने पूरे क्षेत्र में प्रशासन और सत्ता के गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। उनका संघर्ष केवल अपने हक की लड़ाई नहीं, बल्कि लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों और जनता के अधिकारों की रक्षा के लिए एक प्रतीक बन गया है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इस आंदोलन का जवाब कैसे देती है और क्या इस बार ग्रामीणों की आवाज़ को ठोस कार्रवाई के रूप में सुना जाएगा।



