- संत-समाज और प्रशासन की एकता से अर्ध कुंभ 2027 बनेगा विश्व का गौरव
- गंगा तट पर शुरू हुई आध्यात्मिक तैयारियां अर्ध कुंभ को दिव्य आयाम प्रदान करेंगी
- अमृत स्नानों की तय तिथियों ने श्रद्धालुओं में अर्ध कुंभ को लेकर उत्साह बढ़ाया
- तेरह अखाड़ों का संगम और सरकार की प्रतिबद्धता अर्ध कुंभ तैयारियों का आधार
हरिद्वार। देवभूमि की पवित्रता को अपनी गोद में समेटे हरिद्वार ने एक बार फिर ऐसा दृश्य देखा है, जिसने इसकी आध्यात्मिक प्रतिष्ठा को नई ऊँचाई दे दी है। जहां गंगा केवल एक नदी नहीं बल्कि युगों से मोक्ष और कल्याण की प्रतीक रही है, वहीं संतों की वाणी आज भी इस धरती के कण–कण को तपोभूमि बना देती है। इन्हीं दिव्य अनुभूतियों के बीच अर्ध कुंभ 2027 की तैयारियों का औपचारिक शुभारंभ डमकोटी धाम में हुआ, जिसने करोड़ों श्रद्धालुओं में उत्साह, विश्वास और आस्था की नई लौ जगा दी। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और देशभर के तेरह अखाड़ों के संतों की भव्य बैठक ने यह स्पष्ट कर दिया कि आने वाला अर्ध कुंभ केवल आयोजन नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और ऐतिहासिक अध्याय बनने जा रहा है।
बैठक का वातावरण ऐसा था मानो युगों की आध्यात्मिक परंपराएं आधुनिक समय के साथ एक नई लय में जुड़ रही हों। परिसर में मौजूद संतों की गंभीर वाणी, सजावट में झलकती परंपराओं की झलक और गंगा की अविरल धारा से उठती आस्था की तरंगें—सभी मिलकर माहौल को अद्भुत बना रही थीं। इसी पावन अवसर पर अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद निरंजनी के अध्यक्ष श्री महंत रविंद्र पुरी महाराज ने कहा कि अखाड़ों का मूल स्वरूप ही कुंभ का संचालन और उसकी आध्यात्मिक गरिमा की रक्षा करना है। उन्होंने मान्यता दी कि हरिद्वार का कुंभ विश्व की आस्था का सबसे विशाल केंद्र है और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के प्रयास इस महापर्व की तैयारियों को नई दिशा दे रहे हैं। उनकी टिप्पणी ने कार्यक्रम को और अधिक ऐतिहासिक महत्व प्रदान किया।

हरिद्वार की पहचान सदियों से केवल पवित्र घाटों या गंगा स्नान तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह स्थान उन साधकों के कारण भी महान रहा है जिन्होंने मानवता को धर्म, कर्तव्य और मोक्ष का मार्ग दिखाया। इसी मंत्रमुग्ध कर देने वाली विरासत के बीच मुख्यमंत्री धामी ने यह स्पष्ट रूप से कहा कि संत समाज का आशीर्वाद ही इस महापर्व की आत्मा है। उन्होंने आश्वासन दिया कि अर्ध कुंभ 2027 की तैयारियों में कोई कमी नहीं छोड़ी जाएगी और लोगों की भावनाओं के अनुरूप हर आवश्यक प्रबंध समय से पहले पूर्ण किए जाएंगे। उन्होंने बताया कि मेला 13 जनवरी से आरंभ होगा, जब सूर्य स्वयं देव उत्तरायण संक्रांति पर गंगा तट पर अद्भुत ऊर्जा का संचार करेंगे। उनके इस ऐलान से श्रद्धालुओं में उत्सुकता और बढ़ गई है।
इस वर्ष अखाड़ों ने एक ऐसा निर्णय लिया है जो आने वाली पीढ़ियों तक मिसाल के रूप में याद किया जाएगा। पहली बार चार अमृत स्नानों की तिथियां संत समाज की सामूहिक सहमति से तय की गई हैं। इसे परंपरा में बदलाव नहीं, बल्कि परंपरा का विस्तार कहा जा रहा है—एक ऐसा विस्तार जिसमें तीर्थ आस्था के साथ सहज रूप से आगे बढ़ता है। वैदिक गणना के अनुसार मुख्य पर्व स्नानों की तिथियां भी घोषित कर दी गई हैं: 14 जनवरी 2027 को मकर संक्रांति, 6 फरवरी को मौनिया अमावस्या, 11 फरवरी को बसंत पंचमी और 20 फरवरी को माघ पूर्णिमा। ये सभी तिथियां आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत शुभ मानी जाती हैं और इनके दौरान गंगा स्नान को मन, शरीर और आत्मा के शुद्धिकरण का सर्वोत्तम अवसर माना गया है।
अर्ध कुंभ 2027 के चार अमृत स्नानों की तिथियां भी उतनी ही पवित्र मानी जा रही हैं, जिनमें 6 मार्च को महाशिवरात्रि, 8 मार्च को सोमवती फाल्गुनी अमावस्या, 14 अप्रैल को बैसाखी एवं सूर्य संक्रांति स्नान तथा 20 अप्रैल को चैत्र पूर्णिमा शामिल हैं। इन तिथियों का महत्व केवल धार्मिक मान्यता तक सीमित नहीं, बल्कि ज्योतिष, पर्यावरण और पारंपरिक आस्था में भी विशेष प्रभाव रखने वाला माना जाता है। इसके अतिरिक्त सात अप्रैल को नव संवत्सर और पंद्रह अप्रैल को रामनवमी जैसे पर्व भी अर्ध कुंभ के दौरान मनाए जाएंगे, जिससे हरिद्वार आने वाले श्रद्धालुओं को एक साथ अनेक दिव्य अवसर प्राप्त होंगे।
हरिद्वार को सदियों से आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र माना जाता है। यहां के हर घाट, हर पगडंडी, हर धूल के कण—इन सबमें वर्षों की तपस्या, ध्यान और साधना का इतिहास बसता है। अर्ध कुंभ के दौरान यह पूरा क्षेत्र एक अद्भुत आध्यात्मिक विराट रूप ले लेता है, जहां लाखों संतों का संगम, अखाड़ों की शोभा यात्राएं, नागा साधुओं का विशाल आह्वान, ढोल–नगाड़ों की ध्वनि और ‘हर हर गंगे’ का अडिग जयघोष शहर को एक महायज्ञ के समान स्वरूप प्रदान करता है। अर्ध कुंभ केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि विश्व का सबसे बड़ा सांस्कृतिक आयोजन बनकर उभरता है।

महापर्व की तैयारियों को लेकर मुख्यमंत्री धामी ने प्रशासन को हाई-टेक सुरक्षा व्यवस्थाएं सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है। उन्होंने कहा कि ड्रोन, आधुनिक कैमरे, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित भीड़ प्रबंधन और विस्तृत CCTV नेटवर्क जैसे प्रबंध आवश्यक होंगे। स्नान करने वाले तीर्थयात्रियों के लिए कमांड सेंटर स्थापित किया जाएगा और परिवहन व्यवस्था को सुगम बनाने के लिए नए पार्किंग क्षेत्रों, बस सेवाओं और रेलवे स्टेशन अपग्रेड पर तेजी से काम किया जाएगा। गंगा घाटों का सौंदर्यीकरण, प्रकाश व्यवस्था और स्वच्छता अभियान भी व्यापक स्तर पर चलाए जाएंगे। संत समाज के लिए विशेष शिविर, भोजन, आवास और चिकित्सा सुविधाओं की व्यवस्था भी अनिवार्य रूप से की जाएगी।
सरकार का उद्देश्य इस बार अर्ध कुंभ को ‘दिव्य, भव्य और सुरक्षित’ तीनों रूपों में प्रस्तुत करना है। तेरहों अखाड़ों ने मुख्यमंत्री धामी की प्रतिबद्धता और निर्णयों पर पूर्ण संतोष व्यक्त किया है। अर्ध कुंभ 2027 इसलिए भी विशेष माना जा रहा है क्योंकि पहली बार अमृत स्नानों की तिथियां संतों के मार्गदर्शन में तय की गई हैं, जिससे परंपरा को नई मजबूती और सम्मान मिला है। इस कार्यक्रम में विश्वभर से करोड़ों श्रद्धालुओं के आने की संभावना है, और हरिद्वार की आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक विशिष्टताएं इसे वैश्विक पहचान का और भी चमकदार केंद्र बनाती हैं।

हरिद्वार केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि सनातन धर्म की स्पंदनशील धड़कन है, और अर्ध कुंभ 2027 इस धड़कन को उसके सर्वोच्च रूप में प्रदर्शित करेगा। सरकार, संत समाज और श्रद्धालु—तीनों की अपेक्षाएं और संकल्प इस पर्व को एक ऐतिहासिक महाआयोजन बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। 13 जनवरी से 20 अप्रैल तक का हर दिन भक्तिमय होगा, हर क्षण पवित्रता का अनुभव कराएगा और हर स्नान अमृततुल्य अनुभूति प्रदान करेगा। अब लोगों में उत्सुकता है कि इस दिव्य और विराट आयोजन का साक्षी बनने के लिए वे स्वयं कब हरिद्वार पहुँचेंगे और गंगा की पवित्र धारा में डुबकी लेकर किस रूप में इस आध्यात्मिक उत्सव के सहभागी बनेंगे।



