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पंचायत भवन की जर्जर स्थिति और नशाखोरी के बीच सरकारी फाइलें तिरस्कृत पड़ी मिलीं

जसपुर खुर्द के पंचायत भवन में फैली गंदगी, नशाखोरी और खुले में पड़े सरकारी रिकॉर्डों ने प्रशासनिक लापरवाही की गहराई उजागर कर दी है। ग्रामीणों की चिंता बढ़ी, जवाबदेही तय करने की मांग तेज हुई।

स्थानीय लोगों की आँखों के सामने जो स्थिति सामने आई, उसने पूरे क्षेत्र में चिंता की लहर दौड़ा दी। भवन के कमरों और परिसर में कदम रखते ही सबसे पहले जो चीज नजर आती है, वह है बेतरतीबी का ऐसा आलम, जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। जगह-जगह बिखरे शराब के पाउच, गिरे हुए गिलास, टूटे फर्नीचर और बदबूदार कचरे ने इस सरकारी भवन की मर्यादा को पूरी तरह रौंद दिया है। देर रात के समय यहाँ असामाजिक तत्वों की आवाजाही होने की बात क्षेत्रवासियों ने स्पष्ट रूप से बताई, और भवन का बेताला माहौल यह साबित भी करता है कि इस स्थान का उपयोग अक्सर नशे और अवांछित गतिविधियों के लिए किया जाता है। कई कमरों में ताले लगे होने के बावजूद अंदर शराब के पाउच मिलना इस बात का संकेत है कि वर्षों से किसी ने निगरानी की जिम्मेदारी नहीं निभाई। खिड़कियाँ टूटी हुईं, दरवाजे उखड़े पड़े और फर्श में दरारें मन में यह प्रश्न खड़ा करती हैं कि आखिर इतना बड़ा भवन निगरानी की कमी में किस हद तक खो गया है।

इस भवन की दयनीय स्थिति का सबसे खतरनाक पहलू वह है जिसने पूरे गांव में चिंता और नाराज़गी दोनों पैदा की सरकारी रिकॉर्ड का खुले में पड़ा मिलना। भवन की छत पर बने स्टोर रूम में जब दरवाजा खोला गया, तो अंदर सरकारी दस्तावेजों का अम्बार बेतरतीब ढंग से सड़ा हुआ दिखाई दिया। पंचायत विभाग के महत्त्वपूर्ण रजिस्टर, वर्षों पुराने सरकारी रिकॉर्ड, दस्तावेजों के बंडल और यहाँ तक कि कई स्टांप पेपर भी पूरी तरह धूल, नमी और कीड़ों के बीच बरबाद होते नजर आए। कई कागज इतने खराब हो चुके थे कि पढ़ना संभव ही नहीं रह गया था। और सबसे चौंकाने वाला दृश्य वह था जब मेजों के नीचे पड़े शराब के पाउच पाए गए, जिससे साफ हो गया कि सरकारी कागजातों के बीच नशाखोरी तक होती रही है। जिस सिस्टम पर लोग ईमानदारी से अपने दस्तावेज सौंपते हैं, वही सिस्टम उनके कागजातों को ऐसे फेंके हुए कूड़े की तरह छोड़ दे-यह तस्वीर बेहद शर्मनाक है।

एक तरफ नागरिकों को राशन कार्ड केवाईसी, आधार अपडेट और अन्य कागज़ी प्रक्रियाओं के लिए घंटों-घंटों कतारों में खड़ा होना पड़ता है। लोग सुबह से शाम तक धूप, थकान और अव्यवस्था का सामना करते हुए ब्लॉक कार्यालयों में दस्तावेज पूरे करते हैं, लेकिन जब उन दस्तावेजों की वास्तविक हालत इस तरह खुले में सड़ती मिले, तो यह प्रशासन की कार्यशैली पर तीखा सवाल उठाता है। क्षेत्र वासीये का कहना है कि कई लोग अपने आवश्यक कागज़ों की सुरक्षा को लेकर हमेशा आशंकित रहते हैं, लेकिन इतने बड़े स्तर पर सरकारी फाइलें खुले में बर्बाद मिलना यह साबित करता है कि सिस्टम में निगरानी और जिम्मेदारी दोनों लगातार कमजोर होती जा रही हैं।

राजीव गांधी पंचायत भवन वर्तमान में नगर निगम के अधीन आता है, लेकिन उसके रखरखाव की स्थिति देखकर ऐसा प्रतीत होता है जैसे वर्षों से किसी ने इस भवन की सुध नहीं ली। न केवल भवन का आंतरिक ढांचा जर्जर है, बल्कि उसके आसपास का बाहरी क्षेत्र भी अस्त-यस्त दिखता है। इतना ही नहीं, भवन के पास बना एपीजे अब्दुल कलाम बस स्टैंड भी उपेक्षा और समय की मार के कारण बेकार हो चुका है। छत की लकड़ियाँ कमजोर पड़ चुकी हैं, दीवारें उखड़ी हुई हैं और प्लेटफॉर्म पर फैली गंदगी लोगों को स्पष्ट संकेत देती है कि इस क्षेत्र की देखरेख बेहद लचर है। स्थानीय लोगों ने यह आशंका भी व्यक्त की है कि अगर स्थिति ऐसी ही रही तो भवन पर बाहरी कब्जे का खतरा और बढ़ सकता है।

क्षेत्रवासियों का कहना है कि उन्होंने कई बार प्रशासन का ध्यान इन समस्याओं की ओर खींचने की कोशिश की, लेकिन अब तक किसी स्तर पर गंभीर कार्रवाई देखने को नहीं मिली। नगरवासियो का यह भी कहना है कि जसपुर खुर्द जैसे क्षेत्र में जहाँ पंचायत भवन जनभागीदारी का केंद्र होता है, वहाँ इस तरह की हालत पूरे तंत्र पर नकारात्मक छाप छोड़ती है। पंचायत भवन न केवल सरकारी बैठकों का स्थान था, बल्कि जागरूकता कार्यक्रमों, महिलाओं की बैठकों, युवा गतिविधियों और अनेक सामाजिक आयोजनों का केंद्र भी हुआ करता था। आज उसी स्थान का इस कदर उजड़ जाना इस बात का संकेत है कि सरकारी मशीनरी ने न तो उसके रखरखाव पर ध्यान दिया, न ही असामाजिक तत्वों पर नियंत्रण के लिए कोई कदम उठाया।

इन हालातों को देखकर आवश्यक है कि प्रशासन इस भवन को तुरंत सुरक्षित करे और जिम्मेदार अधिकारियों से जवाबदेही तय की जाए। सरकारी दस्तावेजों को संरक्षित करना प्रशासनिक प्राथमिकता होनी चाहिए, क्योंकि जनता का विश्वास इन्हीं कागजातों पर टिका होता है। ऐसे रिकॉर्ड जिनमें महत्वपूर्ण विवरण दर्ज होते हैं, अगर इस प्रकार नष्ट होते रहेंगे, तो भविष्य में अनेक योजनाएँ, जनहित कार्य और प्रशासनिक प्रक्रियाएँ बाधित हो सकती हैं। भवन से नशे का माहौल समाप्त करना, परिसर की सफाई, असामाजिक गतिविधियों पर रोक और रिकॉर्ड की सुरक्षित व्यवस्था यह सब बेहद जरूरी कदम हैं, जिनके बिना हालात और बिगड़ते जाएंगे। जसपुर खुर्द का यह पंचायत भवन अब केवल एक जर्जर संरचना भर नहीं रह गया है, बल्कि यह सरकारी उदासीनता और गिरती जवाबदेही का स्पष्ट प्रतीक बन चुका है। जनता उम्मीद कर रही है कि अब प्रशासन इस उपेक्षा को दूर करेगा और इस भवन को फिर से अपनी असल जिम्मेदारी निभाने के योग्य बनाएगा।

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