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उत्तराखंड में बढ़ता वन्यजीव आतंक, पहाड़ों में जिंदगी दहशत और राजनीति नई भिड़ंत बनी

रामनगर(सुनील कोठारी)। उत्तराखंड में इन दिनों पहाड़ों की शांति के बीच एक ऐसी चुनौती तेजी से उभरकर सामने आ रही है, जो आम जनजीवन को असुरक्षित और चिंतित कर रही है। राज्य के विभिन्न जिलों से लगातार जंगली जानवरों के हमलों की खबरें मिल रही हैं, जिनमें गुलदार, भालू, बाघ, हाथी और कई अन्य वन्यजीव शामिल हैं। पहाड़ी गांवों में रहने वाले लोगों के लिए यह संकट अब रोज़मर्रा की भयावह हकीकत बन चुका है, क्योंकि कई परिवार अपने सदस्यों को इन हमलों में खो चुके हैं, जबकि अनेक लोग गंभीर रूप से घायल होकर उपचार ले रहे हैं। हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि गांवों के लोग शाम ढलते ही अपने घरों में सिमटने को मजबूर हैं। खेतों में काम करना, बच्चों का स्कूल जाना या जंगल से लकड़ी-पत्ती लाना अब सामान्य गतिविधियाँ नहीं रहीं, बल्कि जोखिम से भरी कोशिश बन गई हैं। इसी बीच ग्रामीणों का गुस्सा बढ़ता जा रहा है और सरकार पर निगरानी और सुरक्षा को लेकर लापरवाही के आरोप भी गूंजने लगे हैं।

पिछले ढाई दशकों का रिकॉर्ड देख लिया जाए तो तस्वीर और भी डराने वाली दिखाई देती है। सरकारी दस्तावेजों के अनुसार बीते 25 वर्षों में मानव–वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं में 1,200 से ज्यादा लोगों की मौत दर्ज की गई है। इनमें गुलदार के हमलों में ही 543 व्यक्तियों की जान चली गई। इसके अलावा सांप के डसने से 250 से ज्यादा लोगों की मृत्यु दर्ज हुई, जबकि हाथियों के हमले भी लगभग 250 मौतों की वजह बने। भालू और बाघ जैसे शक्तिशाली वन्यजीवों के हमलों में भी लगभग 176 लोगों ने अपनी जान गंवाई है। ये आंकड़े साफ इशारा करते हैं कि पहाड़ के अनेक इलाके मानो जंगली जानवरों की दहशत में जीने को बाध्य हो चुके हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि कई गांव तो ऐसे हैं जहां लोग रात को घरों की छत पर सोने को मजबूर हैं, क्योंकि जानवर अक्सर रात के अंधेरे में ही हमला करते हैं। इस भय के माहौल ने ग्रामीण जीवन की सामान्य गति को गहरे रूप से प्रभावित कर दिया है।

बढ़ती घटनाओं ने राजनीतिक गलियारों में भी हलचल बढ़ा दी है और यह मुद्दा अब प्रदेश की राजनीति में सबसे गर्म बहस का केंद्र बन चुका है। कई जिलों में हुए हमलों और ग्रामीणों के प्रदर्शन के बाद राजनीतिक पार्टियाँ खुलकर इस मुद्दे पर आमने-सामने आ गई हैं। कांग्रेस का आरोप है कि सरकार सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने में नाकाम रही है और प्रशासन जनजीवन पर मंडरा रहे इस गंभीर खतरे को नजरअंदाज कर रहा है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि अगर सरकार ने समय रहते आवश्यक कदम नहीं उठाए तो वे खुद गांव-गांव में एक टास्क फोर्स तैयार कर लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की कोशिश शुरू करेंगे। स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने हाल ही में वन मुख्यालय पहुंचकर जोरदार प्रदर्शन भी किया और सरकार से त्वरित कार्रवाई की मांग उठाई। उनका आरोप है कि हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि ग्रामीण रात में अकेले बाहर निकलने से डरते हैं, लेकिन सरकार सिर्फ बयानबाज़ी कर रही है।

कांग्रेस नेता अमेन्द्र बिष्ट ने कहा कि राज्य सरकार को चाहिए कि वह इस बढ़ते संकट को गंभीरता से ले और प्रभावित क्षेत्रों में तत्काल सुरक्षा उपाय लागू करे। उनका कहना है कि वन विभाग की धीमी कार्यप्रणाली और संसाधनों की कमी के कारण लोग लगातार कमजोर होते सुरक्षा तंत्र के बीच जीने को मजबूर हैं। अमेन्द्र बिष्ट का आरोप है कि “सरकार की उदासीनता के कारण जंगलों के किनारे रहने वाले परिवार जीवन-मृत्यु के बीच झूल रहे हैं। यदि सरकार ने तत्काल एक प्रभावी समाधान प्रस्तुत नहीं किया तो कांग्रेस स्वयं ग्रामीण स्तर पर सुरक्षा समितियाँ बनाकर यह जिम्मेदारी निभाएगी।’’ उनका कहना है कि अब समय बीत चुका है और जनहानि रोकने के लिए जमीनी स्तर पर ठोस अभियान जरूरी है। कांग्रेस का यह बयान प्रदेश की राजनीति में नई उथल–पुथल पैदा कर रहा है।

दूसरी ओर, बीजेपी कांग्रेस के आरोपों को पूरी तरह राजनीति से प्रेरित बता रही है। बीजेपी विधायक विनोद चमोली का कहना है कि कांग्रेस अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने के लिए इस संवेदनशील मसले को हथियार बनाना चाहती है। उनका कहना है कि “यह समस्या आज की नहीं है। कांग्रेस शासन में भी वन्यजीवों के हमले होते थे, लेकिन तब उन्होंने कोई ठोस योजना लागू नहीं की। अब जब स्थिति चुनौतीपूर्ण है तो कांग्रेस इसे राजनीतिक रंग देने की कोशिश कर रही है।’’ विनोद चमोली ने आगे कहा कि सरकार इस मुद्दे पर लगातार काम कर रही है और वन विभाग को आधुनिक साधनों से लैस करने की कोशिश भी जारी है। उन्होंने यह भी बताया कि सरकार संघर्ष प्रभावित इलाकों में सर्विलांस, ट्रैपिंग टीम और त्वरित प्रतिक्रिया दलों को और अधिक मजबूत करने पर काम कर रही है। उनका कहना है कि कांग्रेस सरकार को कोसने में ज्यादा व्यस्त है, जबकि समाधान के लिए रचनात्मक सुझाव देने की कोई पहल नहीं करती।

राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के इस दौर में आम जनता के सामने असल चुनौती जस की तस बनी हुई है। ग्रामीण चाहते हैं कि जानवरों का बढ़ता आतंक खत्म हो और वे अपने खेत, घर, स्कूल और जंगलों में भयमुक्त होकर रह सकें। लेकिन स्थिति यह है कि दोनों प्रमुख राजनीतिक दल एक-दूसरे को कटघरे में खड़ा करने में अधिक सक्रिय दिख रहे हैं, जबकि लोगों को तत्काल राहत देने वाला ठोस कदम अभी तक सामने नहीं आया है। गौर करने वाली बात यह है कि यह समस्या सिर्फ वन विभाग की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह सरकार, स्थानीय प्रशासन, गांव समितियों और वन्यजीव संरक्षण विशेषज्ञों के बीच समन्वय की मांग करती है। पहाड़ों में जनहानि रोकने के लिए वैज्ञानिक तकनीकों, आधुनिक निगरानी उपकरणों, संवेदनशील क्षेत्रों में लगातार गश्त और ग्रामीणों को जागरूक करने जैसे कई उपायों को तत्काल लागू करना आवश्यक है। प्रदेश की जनता अब इंतजार में है कि राजनीति से ऊपर उठकर सरकार और विपक्ष मिलकर इस गंभीर संकट का हल कब निकालेंगे।

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कांग्रेस अध्यक्ष अलका पाल

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