हरिद्वार(सुनील कोठारी)। तपोभूमि की पवित्र पहचान आज जिस संकट से जूझ रही है, उसे देखकर हर श्रद्धालु का मन विचलित हो उठता है। गंगा तट का वह दिव्य स्थान, जहाँ कभी श्रद्धा की निःशब्द लहरें बहा करती थीं, अब शोर, अव्यवस्था और अनियंत्रित फड़ संस्कृति का नया केंद्र बनता नज़र आ रहा है। हर की पौड़ी, जहाँ आने से पहले लोग मन में भक्ति का दीपक जलाकर प्रवेश करते थे, आज बाजार की भीड़ और अनधिकृत दुकानों की कर्कश आवाजें उनके कदमों का स्वागत कर रही हैं। कभी जहां गंगा दर्शन की शांति मिलती थी, अब सबसे पहले फूलों की खुली बिक्री, प्लास्टिक में बंद प्रसाद के ढेर, जूट–चटाइयों के अम्बार और राह रोकते फेरीवाले दिखाई देते हैं। यह दृश्य किसी तीर्थ का नहीं बल्कि किसी भीड़भाड़ वाले बाज़ार का एहसास कराता है, जहाँ श्रद्धा का स्थान धीरे–धीरे व्यापारिक चमक के नीचे दबता जा रहा है।
गंगा संरक्षण को लेकर राष्ट्रीय हरित अधिकरण यानी NGT के निर्देश स्पष्ट हैं कि पवित्र धारा में न फूल डाले जाएंगे, न प्लास्टिक, न घास–फूस, और न ही कोई अपशिष्ट। परंतु यह सारी हिदायतें हर की पौड़ी पर महज़ औपचारिक कागज़ बनकर रह गई हैं। घाटों पर सुबह से शाम तक सफाई की व्यवस्था का दावा किया जाता है, फिर भी श्रद्धालुओं की आंखों के सामने खुलेआम कचरा गंगा में बहा दिया जाता है। प्रसाद की पन्नियां, फेंकी हुई चटाइयाँ, और टूटे–फूटे प्लास्टिक के बर्तन लगातार नदी को प्रदूषित कर रहे हैं। भक्ति की भूमि पर यह लापरवाही देखकर यही सवाल उठने लगता है कि आखिर यह मूक दर्शक बना प्रशासन किस वजह से आंखें मूँदे बैठा है। इतने कठोर आदेशों के बावजूद जब हालात नहीं बदलते, तो साफ झलकता है कि कहीं न कहीं सिस्टम में ऐसी खामियां हैं जिनकी वजह से यह अवैध ढांचा फल–फूल रहा है।

मंदिरों के बाहर भी दृश्य कम विचलित करने वाले नहीं। भैरव मंदिर, वाल्मीकि मंदिर और हनुमान मंदिर के बाहर फैली अनधिकृत दुकानों की कतार अब नई सामान्य स्थिति हो चुकी है। पहले जहाँ घंटियों की मधुर ध्वनि और मंत्रोच्चार की पवित्रता माहौल को शांत रखती थी, अब वहाँ लगातार सुनाई देता है— “फूल ले लो… चटाई ले लो… प्रसाद सस्ता है… केनी ले जाओ बाबूजी…”। यह आवाज़ उस श्रद्धा को बुरी तरह चोट पहुँचाती है जिसके लिए लोग सैकड़ों किलोमीटर दूर से यहाँ आते हैं। मंदिर परिसर के बाहर बढ़ती यह अव्यवस्थित बिक्री यह भी दर्शाती है कि धार्मिक क्षेत्र धीरे–धीरे सब्ज़ी मंडी जैसी अव्यवस्था का रूप लेता जा रहा है, जहाँ धार्मिक आस्था से अधिक व्यापारिक अवसरों की भीड़ दिखाई देती है।
नगर निगम और धार्मिक संस्थाओं की भूमिका पर उठ रहे सवाल भी लगातार तेज होते जा रहे हैं। श्रद्धालु और स्थानीय लोग यह जानना चाहते हैं कि आखिर इन फेरीवालों को संरक्षण कौन दे रहा है। क्या नगर निगम की कार्यवाही महज़ कागज़ी औपचारिकता बन गई है? क्या धार्मिक संस्था अपने मंदिर–क्षेत्र की मर्यादा की रक्षा करने के बजाय इस अव्यवस्थित व्यापार को बढ़ावा देने के संकेत दे रही है? कुंभ 2027 की तैयारियाँ शुरू होने का दावा किया जा रहा है, लेकिन ज़मीनी वास्तविकता यह बताती है कि अगर यही हाल रहा तो भक्ति की नगरी आने वाले कुंभ से पहले “बाजार नगरी” के रूप में बदनाम हो सकती है। श्रद्धालु जैसे ही घाट की ओर कदम बढ़ाते हैं, उससे पहले प्लास्टिक के ढेर और जूतों के पहाड़ उनका स्वागत कर रहे होते हैं—और यह दृश्य तीर्थ नगरी के गौरव के साथ किसी उपहास से कम नहीं।

श्रद्धालुओं की भावनाएँ भी इस बदहाल माहौल से गहराई से आहत हो रही हैं। जो लोग गंगा आरती में दिव्य अनुभव पाने, पाप-पुण्य से मुक्ति के भाव से स्नान करने और आध्यात्मिक वातावरण में समय बिताने आते हैं—वे खुद को अनचाहे तत्वों की भीड़ से घिरा हुआ पाते हैं। कुछ कदम चलते नहीं कि कोई फेरीवाला रास्ता रोक लेता है, कोई भिखारी चिपक जाता है, कोई चटाई थोपने की कोशिश में पीछे पड़ जाता है। ऐसी स्थिति में न शांति का अनुभव होता है, न देवदर्शन की अनुभूति मिलती है। लोग यह सोचने पर मजबूर हो जाते हैं कि एक पवित्र स्थान का स्वरूप इतना बदल कैसे गया कि वहाँ आने पर उन्हें आध्यात्मिकता के बजाय व्यापारिक दबाव अधिक महसूस होता है। यही चलन रहा तो लोग हरिद्वार आने से कतराने भी लग सकते हैं—जो न सिर्फ धार्मिक पर्यटन बल्कि सांस्कृतिक धरोहर के लिए भी गंभीर खतरा है।
यह स्थिति सिर्फ एक प्रशासनिक विफलता का मामला नहीं है, बल्कि एक सांस्कृतिक संकट है जिसमें धर्म, परंपरा, पवित्र धरोहर और समाज की आस्था—सब कुछ दांव पर लगता दिखाई दे रहा है। सवाल यह है कि जब धार्मिक संस्थाएँ स्वयं इस अनियंत्रित व्यापार पर कार्रवाई नहीं करतीं और नगर निगम के अधिकारी नियमों को लागू करने में उदासीन रहते हैं, तब श्रद्धालु आखिर किससे उम्मीद करें? गंगा की रक्षा करने की जो जिम्मेदारी संस्था और प्रशासन दोनों की होती है, वही जिम्मेदारी कब व्यापारिक हितों में दब गई—यह भी एक बड़ा प्रश्न है।

हरिद्वार की इस बदलती छवि के सामने महत्वपूर्ण प्रश्न अपने उत्तर की प्रतीक्षा कर रहे हैं—क्या नगर निगम बताएगा कि घाटों और मंदिरों के बाहर अनधिकृत फड़ लगाने की अनुमति किसने प्रदान की? किसके इशारे पर NGT के आदेश धड़ल्ले से तोड़े जा रहे हैं? धार्मिक संस्थाएँ अपने परिसर की मर्यादा बचाएंगी या इस व्यापारिक विस्तार को और बढ़ावा देंगी? और सबसे बड़ा सवाल—क्या 2027 के कुंभ से पहले हर की पौड़ी अपनी भक्ति की पहचान वापस पा सकेगी, या फिर यह पवित्र स्थान हमेशा के लिए बाजार की भीड़ में खो जाएगा?



