- जंगलों का संतुलन टूटा तो इंसानों की सांसें भी संकट में फंस गईं
- कॉर्बेट पर सुप्रीम चोट और पहाड़ों में खतरों की गूंज बढ़ा रही डर की आग
- कॉर्बेट में अवैध निर्माण गिराने के आदेश के साथ, पहाड़ों में फैला खौफ बता रहा है कि प्रकृति का संतुलन टूटते ही इंसान सबसे पहले निशाना बनता है।
रामनगर(सुनील कोठारी)। उत्तराखण्ड की शांत हवा में इन दिनों एक ऐसा कंपन महसूस किया जा सकता है, मानो प्रकृति खुद किसी अनकहे खतरे की चेतावनी सुना रही हो। उत्तराखंड की धरती पर जंगलों के भीतर उठ रही बेचैनी, न्यायालय के दृढ़ रुख और गांवों में फैले डर ने मिलकर एक गहरी बहस को जन्म दिया है। सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणियों ने इस मुद्दे को महज बहस से आगे बढ़ाकर एक कठोर वास्तविकता में बदल दिया है, जहां अब न टालमटोल की जगह है और न ही कागज़ी योजनाओं की गुंजाइश। अदालत ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि जिम कॉर्बेट जैसे संवेदनशील वनक्षेत्र अब अवैध निर्माण, लालच और अव्यवस्थित पर्यटन के हवाले नहीं छोड़े जा सकते। इसी बीच पहाड़ी इलाकों में बाघ और भालुओं के हमलों ने ग्रामीणों की दहशत को नया आकार दे दिया है, मानो इंसानों की गलती की कीमत अब जंगलों का मौन नहीं बल्कि जानवरों की चीखें अदा कर रही हों। हर दिशा में एक ही सवाल गूंज रहा है-जब जंगल टूटेगा, तो क्या इंसान बच पाएगा?
दिल्ली की अदालत में बैठे न्यायाधीश ’’आर. गवई’’ की स्पष्ट टिप्पणी ने उत्तराखंड सरकार के ढीले रवैये को सीधा चुनौती दी है। अदालत का निर्णय केवल निर्देश मात्र नहीं, बल्कि वर्षों से जंगलों के भीतर पैदा हुए दर्द का प्रतिबिंब है। जिम कॉर्बेट के अंदर बने अवैध ढांचों को तीन महीनों में ध्वस्त करने का आदेश, अवैध वृक्ष कटान की पूरी वसूली, कोर एरिया में कार्यरत कर्मचारियों के लिए भोजन, आवास और सुरक्षा की अनिवार्य व्यवस्था-ये सभी कदम बताते हैं कि अब अदालत का धैर्य समाप्त हो चुका है। राज्य की पारिस्थितिक बहाली योजना को कोर्ट पैनल की निगरानी में लाना भी इस बात का संकेत है कि अगर सरकार चुप रही, तो न्यायपालिका जंगलों की आवाज़ बनकर खड़ी होगी। लेकिन इसी बीच ग्रामीण पूछते हैं-जब दस्तावेज़ों में संरक्षण की कवायद चल रही थी, तब वन्यजीवों का आक्रोश बढ़कर गांवों तक क्यों पहुँच रहा था?
ग्रामीणों का डर रेखाओं में नहीं, बल्कि चेहरों पर उकेरे घावों में दिखाई देता है। कई गांवों में भालुओं की मौजूदगी अब तपती दोपहरों में भी दिखने लगी है। जहां पहले पत्तों की सरसराहट ही प्रकृति की पहचान थी, आज वहां बाघ के पगचिन्ह लोगों के कदमों को रोक देते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट अचानक नहीं आया, बल्कि वर्षों से हो रहे अनियंत्रित हस्तक्षेपों का परिणाम है। कोर एरिया में लगातार रिसॉर्ट खड़े होने, पेड़ों की बेतहाशा कटाई, प्राकृतिक गलियारों पर निर्माण, बदलते मौसम और भोजन के स्रोतों में कमी ने पूरा संतुलन बिगाड़ दिया है। जब जानवरों के घरों को तोड़ा जाएगा, तो वे इंसानी बस्तियों में शरण लेने पर मजबूर होंगे ही। यही कारण है कि बाघ रातें और भालू दिन-दोनों इंसानों की दुनिया में दस्तक दे रहे हैं, मानो अपनी पुराने अधिकारों की वापसी मांग रहे हों।
इन हालातों ने पहाड़ी जीवन को एक नए तरह की अनिश्चितता में धकेल दिया है। गांवों के भीतर हर आवाज़ अब खतरे की चेतावनी जैसा एहसास देती है। खेतों में काम कर रहे किसान से लेकर शाम को लौटते महिलाओं और बच्चों तक, हर कोई जंगल के इस बदले व्यवहार से सहमा हुआ है। दूसरी ओर, वह पर्यटक जो कॉर्बेट की खूबसूरती को कैमरे में कैद करने आता है, उसे भी अब यह समझ आने लगा है कि पर्यावरण केवल देखने की चीज नहीं, बल्कि संभालने की जिम्मेदारी है। उत्तराखंड की पहचान उसकी हरियाली, उसके वन्यजीव और उसके सहज संतुलन में है। अगर यह संतुलन टूटता है, तो पहाड़ खोखले हो जाएंगे और इंसान का अस्तित्व भी खतरे में पड़ सकता है। इस बदलते परिदृश्य ने यह साफ कर दिया है कि जंगलों का संरक्षण केवल सरकारी नीति नहीं, बल्कि जीवन का आधार है।
इसीलिए आज सवाल छोटे नहीं, बल्कि बेहद व्यापक हो गए हैं। क्या सरकार अवैध निर्माणों को बिना किसी प्रभावशाली व्यक्ति की परवाह किए ध्वस्त कर पाएगी? क्या वन्यजीव हमलों की बढ़ती घटनाओं के मूल कारणों को समझकर कोई ठोस रणनीति बनेगी? क्या उत्तराखंड पर्यटन और पर्यावरण को एक साथ संतुलित मॉडल में बदल पाएगा? क्या ग्रामीणों की सुरक्षा और जानवरों की प्राकृतिक सीमाओं के बीच कोई स्पष्ट रेखा तय होगी? क्या अभी भी समय है कि मानव और प्रकृति के बीच की दूरी को कम किया जा सके? क्या जिम कॉर्बेट पुनः अपनी मूल शांति और पवित्रता में लौट सकेगा? क्या स्थानीय समुदायों की भागीदारी बढ़ाए बिना यह संघर्ष हल हो सकता है? क्या सरकार, न्यायपालिका और जनता मिलकर एक ऐसी नीति बना पाएंगे जो आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित जंगल दे सके? क्या उत्तराखंड वही साहस दिखाएगा जो उसे आज दिखाना चाहिए?
और अंत में, वही गंभीर सवाल खड़ा होता है जिसे ‘‘हिन्दी दैनीक सहर प्रजातंत्र’’ समाचार पत्र लगातार उठाते रहा हैं-क्या हम सच में जंगलों को बचाने को तैयार हैं, या केवल तब सक्रिय होते हैं जब खतरा सिर पर आ जाता है? उत्तराखण्ड की सच्चाई यही कहती है कि अब निर्णय केवल विकास बनाम पर्यावरण का नहीं, बल्कि जीवन बनाम विनाश का है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से लेकर गांवों की पीड़ा तक, हर जगह यही संदेश गूंज रहा है-अगर जंगल बचेगा, तभी इंसान का भविष्य बचेगा। और अगर इस बार भी उत्तराखंड ने सही दिशा नहीं चुनी, तो आने वाले वर्षों में यह संघर्ष केवल जानवरों से नहीं, बल्कि इंसान को अपनी ही गलतियों से लड़ना पड़ेगा।



