काशीपुर(सुनील कोठारी)। नगर में राजनीति का तापमान कुछ ज़्यादा ही बढ़ा हुआ दिखाई दे रहा है। जिस कहावत को लोग अक्सर मज़ाक में बोल देते हैं – “रस्सी जल गई, पर बल नहीं गया” -वह आज काशीपुर की कांग्रेस पर बिल्कुल सटीक बैठती दिख रही है। बीते चंद घंटों में जो घटनाक्रम काशीपुर कांग्रेस के भीतर घटा, उसने यह साफ कर दिया कि संगठन के अंदर सुलगती चिंगारी अब आग में बदल चुकी है। अलका पाल के अधिकारिक घोषण के बाद जो दृश्य देखने को मिला, उसने न केवल कार्यकर्ताओं को चौंकाया बल्कि वरिष्ठ नेताओं को भी सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर पार्टी की एकजुटता अब किस मोड़ पर खड़ी है। महानगर अध्यक्ष पद पर कांग्रेस नेत्री अलका पाल की नियुक्ति के बाद से ही शहर की सियासी फिज़ा में खलबली मच गई है। उनके नाम की आधिकारिक घोषणा होते ही विरोध का स्वर तेज़ हुआ और एक बैठक कर हाई काम को इस्तिफे की धमकी दे दी।
महानगर अध्यक्ष पद पर कांग्रेस नेत्री अलका पाल की नियुक्ति से स्तबध कांग्रेस के वे सभी गुट, जो कभी एक-दूसरे के आमने-सामने थे, अब एक जुट हो इस घोषणा के खिलाफ खडे हो गए। जिसनेे सबको हैरान कर दिया। आरोप-प्रत्यारोपों का दौर चला, भावनाएं उफान पर थीं और संगठनात्मक अनुशासन मानो कहीं पीछे छूट गया था। सवाल उठने लगे कि क्या काशीपुर की कांग्रेस अब वास्तव में हाशिए पर पहुंच चुकी है? क्या पार्टी की यह अंतर्कलह अब उसे शहर की राजनीति से पूरी तरह बाहर कर देगी? स्थानीय स्तर पर यह चर्चा आम हो चली है कि पार्टी के भीतर व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा संगठन के आदर्शों से कहीं ऊपर चली गई है।
बीते कुछ वर्षों से कांग्रेस की स्थिति यहां लगातार गिरावट में रही है। निकाय चुनावों में हुई हार ने संगठन के आत्मविश्वास को तोड़ दिया। पिछले चुनाव में एडवोकेट संदीप सहगल की पराजय ने जैसे भीतर की टूटन को उजागर कर दिया। हार के बाद से ही संगठन के अंदर असंतोष का वातावरण बना हुआ है, जो अब खुलकर सामने आ गया है। ऐसे में, जब अनुपम शर्मा जैसे वरिष्ठ नेता की एंट्री हुई, तो समीकरण और उलझ गए। कहा जा रहा है कि वह 2027 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस के टिकट पर लड़ने की तैयारी में हैं। पार्टी में उनके अनुभव और ऊपरी स्तर पर पकड़ को देखते हुए उनके समर्थकों की सक्रियता अचानक बढ़ गई। अब यही सक्रियता कई पुराने नेताओं को अखरने लगी है और यही वजह है कि गुटबाज़ी का नया दौर शुरू हो गया है।
इस गुटीय राजनीति ने कांग्रेस की जड़ों को भीतर से कमजोर कर दिया है। संदीप सहगल ने कैमरे के सामने जिस तरह से अपनी ही पार्टी के नेताओं अलका पाल, मुशर्रफ हुसैन और जितेन सरस्वती पर हार का ठीकरा फोड़ा, उसने पूरे राजनीतिक परिदृश्य को हिला कर रख दिया। उनके इस बयान से यह साफ हो गया कि अब संगठन के अंदर के मतभेद सार्वजनिक हो चुके हैं। पहले हार के समय उन्होंने कुछ और कारण गिनाए थे, लेकिन अब जब उन्होंने अपनी ही पार्टी के नेताओं को कटघरे में खड़ा किया, तो सवाल उठना स्वाभाविक था कि आखिर कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने वाला दुश्मन बाहर है या भीतर? पार्टी की कमजोर रणनीति और आपसी फूट अब शहर के गलियारों में चर्चा का विषय बन चुकी है।
काशीपुर कांग्रेस में मचे घमासान ने अब एक नया और दिलचस्प मोड़ भी है। अंदरूनी मतभेदों की वजहें जहां अब तक राजनीतिक समझी जा रही थीं, वहीं अब इसके पीछे व्यक्तिगत नाराज़गी की बातें भी खुलकर सामने आने लगी हैं। सूत्रों के अनुसार, पार्टी के ही एक पुराने और प्रभावशाली तथाकथित घराने ने अलका पाल की महानगर अध्यक्ष पद पर नियुक्ति का विरोध इसलिए शुरू कर दिया, क्योंकि उनके पदभार ग्रहण करने के बाद अलका पाल ने उस घराने के पास जाकर औपचारिक रूप से आशीर्वाद नहीं लिया। यही बात उनके समर्थकों को नागवार गुज़री और इसे अपमान के तौर पर देखा गया। लंबे समय से संगठन में प्रभाव रखने वाला यह घराना इस व्यवहार को अपनी अनदेखी मान बैठा, जिसके बाद से उन्होंने भीतर ही भीतर विरोध का झंडा उठा लिया। अब स्थिति यह है कि कांग्रेस में यह निजी नाराज़गी एक बड़े राजनीतिक विवाद में तब्दील हो चुकी है, जिससे संगठन के भीतर मतभेद और गहराते जा रहे हैं तथा एकता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
दूसरी ओर, अलका पाल के पक्ष में एक तबका खुलकर सामने आया है। उनका कहा है कि वह लंबे समय से पार्टी से जुड़ी रहीं हैं और हमेशा ज़मीनी स्तर पर सक्रिय भूमिका निभाती रही हैं। प्रदेश हाईकमान ने जब मीनू गुप्ता और त्रिलोक सिंह अधिकारी, मनोज अग्रवाल जैसे नामों को पीछे छोड़कर अलका पाल को महानगर अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी सौंपी, तो यह फैसला कई नेताओं को नागवार गुज़रा। पार्टी में यह भी चर्चा रही कि मनोज अग्रवाल, जो वरिष्ठ नेता शिवनंदन प्रसाद अग्रवाल के पुत्र हैं, के स्थान पर किसी और को पद देना अचानक कैसे तय हुआ। इसी निर्णय के बाद से कांग्रेस के भीतर हलचल तेज हो गई और विरोध के स्वर एकाएक मुखर हो उठे।
इस पूरे घटनाक्रम ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि काशीपुर कांग्रेस में आपसी विश्वास की कमी कितनी गहरी हो चुकी है। एक तरफ वरिष्ठ नेता अपना वर्चस्व बनाए रखने की कोशिश में हैं, तो दूसरी ओर युवा चेहरों को मौका देने की बात कर रहे हैं। मगर इन सबके बीच पार्टी का मूल उद्देश्य, यानी संगठन को मजबूत करना, कहीं पीछे छूट गया है। बैठकों में रणनीति पर कम, और व्यक्तिगत निष्ठा पर ज़्यादा चर्चा हो रही है। हर गुट अपने लोगों को प्रमुख पदों पर देखना चाहता है, और यही चाह अब काशीपुर कांग्रेस के भविष्य के लिए सबसे बड़ा संकट बनकर उभरी है।
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि इस आंतरिक कलह का सबसे बड़ा नुकसान पार्टी की साख को हुआ है। जनता के बीच यह संदेश गया है कि कांग्रेस अब खुद को संभाल नहीं पा रही। निकाय चुनावों में मिली हार से उबरने के बजाय नेता एक-दूसरे को ही दोष देने में जुटे हैं। अनुपम शर्मा की सक्रियता ने जहां एक ओर संगठन में नई ऊर्जा लाने की कोशिश की, वहीं दूसरी ओर पुराने नेताओं के बीच असुरक्षा की भावना को बढ़ा दिया। यही असुरक्षा अब विरोध के रूप में सामने आ रही है।
कांग्रेस का इतिहास बताता है कि जब-जब संगठन के भीतर मतभेद गहराए हैं, तब-तब पार्टी ने हार का स्वाद चखा है। काशीपुर की सियासत में भी यही दोहराया जा रहा है। यदि स्थिति पर शीघ्र नियंत्रण नहीं पाया गया, तो आने वाले समय में कांग्रेस के लिए यहां अपनी ज़मीन वापस पाना मुश्किल हो जाएगा। स्थानीय नेता एक-दूसरे पर आरोप लगाते रहेंगे और जनता के मुद्दे पीछे छूट जाएंगे। काशीपुर की सियासत फिलहाल उबाल पर है, और कांग्रेस का भविष्य इसी उबाल में तप रहा है। सवाल यह है कि क्या पार्टी के वरिष्ठ नेता इस संकट को सुलझा पाएंगे या यह घमासान काशीपुर में कांग्रेस के लिए अंत की शुरुआत साबित होगा? जवाब आने वाले दिनों में मिलेगा, लेकिन इतना तय है कि इस वक्त कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती बाहर की नहीं, बल्कि अपने ही भीतर की लड़ाई है।



