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धर्म की राजनीति जब आस्था बनी सियासत का औज़ार और इंसानियत हुई गुम

जब धर्म इंसान को जोड़ने के बजाय तोड़ने लगा, तब समझिए राजनीति ने आस्था की पवित्रता को निगल लिया और इंसानियत की आवाज़ कहीं खो गई

उत्तराखण्ड(सुनील कोठारी)। धर्म, जो कभी मानवता का प्रतीक और सद्भाव का आधार हुआ करता था, आज राजनीति की भूलभुलैया में उलझ गया है। एक समय था जब धर्म इंसान को जोड़ने का काम करता था, लेकिन अब वही धर्म सियासत का सबसे बड़ा हथियार बन चुका है। दुनिया के चार बड़े धर्म कृ ईसाई, इस्लाम, हिंदू और बौद्ध कृ सभी में राजनीति की जड़ें गहराई तक फैल चुकी हैं। यह सवाल आज हर संवेदनशील व्यक्ति के मन में उठता है कि क्या धर्म अब सिर्फ सत्ता पाने का ज़रिया बन चुका है?

ईसाई धर्म, जो विश्व का सबसे बड़ा धर्म माना जाता है, करीब दो सौ अस्सी करोड़ अनुयायियों के साथ विश्वभर में फैला है। कहा जाता है कि यह धर्म शांति, प्रेम और सेवा का प्रतीक है, लेकिन अमेरिका जैसे विकसित लोकतांत्रिक देश में भी धर्म का इस्तेमाल राजनीति के लिए खुलकर किया जा रहा है। वहां की चुनावी सभाओं में ष्ईसाई हित सुरक्षित रखनेष् के नारे लगाए जाते हैं। ट्रंप जैसे नेता अपने भाषणों में ईसाइयों को सुरक्षा का आश्वासन देकर सत्ता हासिल करते हैं। यह वही अमेरिका है, जो खुद को सेकुलरिज़्म का ठेकेदार कहता है। वहां की राजनीति में धर्म का सीधा इस्तेमाल यह दिखाता है कि सत्ता की कुर्सी के लिए किस तरह आस्था को मोहरा बनाया जा रहा है।

इसी तरह मध्य पूर्व के देशों में धर्म और राजनीति का घालमेल और भी खतरनाक रूप में देखने को मिलता है। जब ईसा मसीह का जन्मस्थल फिलिस्तीन आज संघर्ष का प्रतीक बन गया है, तो यह सोचने पर मजबूर करता है कि धर्म की जमीन पर क्यों इतनी नफरत बोई जा रही है। जेरूसलम, जो तीन धर्मों कृ ईसाई, यहूदी और इस्लाम कृ का केंद्र है, वहां आज गोलियों की गूंज प्रार्थनाओं को दबा देती है। ईसा मसीह, जिन्होंने प्रेम और क्षमा की शिक्षा दी, उनके नाम पर भी नफरत और हिंसा की राजनीति हो रही है। सवाल यह नहीं कि कौन-सा धर्म सही है, बल्कि यह है कि कौन-सा धर्म आज भी मानवता को जीवित रख पा रहा है।

इस्लाम धर्म, जिसकी नींव पैगंबर साहब की शिक्षाओं पर रखी गई थी, उसका संदेश भी इंसानियत, सच्चाई और समानता का था। लेकिन इतिहास गवाह है कि पैगंबर के निधन के बाद ही राजनीति ने धर्म की आत्मा में सेंध लगा दी। पैगंबर साहब के बाद उत्तराधिकारी को लेकर जब विवाद हुआ, तब इस्लाम दो भागों में बंट गया कृ शिया और सुन्नी। एक पक्ष पैगंबर के करीबी साथी अबू बकर को उत्तराधिकारी मानता था, जबकि दूसरा पक्ष उनके दामाद अली को असली वारिस मानता रहा। सत्ता की यह खींचतान महज़ धार्मिक मतभेद नहीं थी, बल्कि राजनीति की पहली चिंगारी थी जिसने आने वाले सदियों तक आग का रूप ले लिया। आज भी ईरान, इराक, सीरिया, कुवैत और बहरीन जैसे देशों में यही विभाजन राजनीतिक और धार्मिक संघर्ष का कारण बना हुआ है।

कुरान, जो इंसाफ, रहम और सच्चाई की किताब है, उसका सार कहीं सत्ता की भूख में खो गया। पैगंबर साहब खुद बेहद सरल जीवन जीने वाले व्यक्ति थे, लेकिन उनकी शिक्षाओं को उनके बाद की पीढ़ियों ने राजनीतिक हितों के अनुसार मोड़ दिया। आज अगर कोई व्यक्ति खुले तौर पर कुरान की किसी बात पर सवाल उठा दे तो उसे गद्दार या नास्तिक कहकर खामोश कर दिया जाता है। जबकि खुद इस्लाम का सार यही कहता है कृ “झूठ मत बोलो, किसी का हक मत मारो, इंसानियत की सेवा करो।” लेकिन सत्ता की राजनीति ने इन बातों को पीछे छोड़ दिया है।

सिख धर्म की बात करें तो गुरु नानक देव से लेकर गुरु गोविंद सिंह तक का पूरा जीवन मानवता, एकता और समानता का प्रतीक रहा। गुरु ग्रंथ साहिब इस बात का प्रमाण है कि सिख धर्म ने कभी किसी एक मजहब की सीमाओं में खुद को नहीं बांधा। इसमें फरीद, कबीर, नामदेव, रविदास जैसे संतों की वाणी दर्ज है कृ यानी यह धर्म सबको अपनाने का संदेश देता है। पांचवें गुरु, गुरु अर्जुन देव ने इसे ‘आदि ग्रंथ’ के रूप में संकलित किया और बाद में गुरु गोविंद सिंह ने इसे सिखों का अंतिम गुरु घोषित किया। लेकिन आज सिख धर्म भी राजनीति के मैदान में घसीटा जा रहा है, जहां धार्मिक पहचान को चुनावी समीकरणों में तोला जा रहा है।

अब अगर हिंदू धर्म की ओर देखें, तो उसकी स्थिति भी बाकी धर्मों से अलग नहीं है। जिस धर्म ने “वसुधैव कुटुंबकम्” यानी पूरी दुनिया को परिवार मानने की बात कही, आज वही धर्म राजनीतिक विभाजन का औजार बन गया है। देश की राजनीति में धर्म का इस्तेमाल जिस तरह किया जा रहा है, उसने सेकुलरिज़्म की जड़ों को कमजोर किया है। आज देश की कैबिनेट में एक भी मुस्लिम चेहरा नहीं है, जबकि देश की कुल आबादी में मुसलमानों की हिस्सेदारी लगभग पंद्रह प्रतिशत है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, सबका प्रयास’ का नारा देती है, लेकिन जब सत्ता के गलियारों में 20 करोड़ नागरिकों की आवाज़ को प्रतिनिधित्व नहीं मिलता, तो यह नारा खोखला लगता है।

राजनीति ने धर्म को इतना जकड़ लिया है कि अब आस्था और सत्ता के बीच की रेखा धुंधली हो चुकी है। आज किसी भी मंच से धर्म की बात की जाए तो वह तुरंत राजनीतिक रंग ले लेती है। जो बात मानवता के लिए कही जानी चाहिए थी, वह अब वोट बैंक के लिए कही जाती है। धर्म, जो कभी आत्मा की शांति और समाज की एकता का आधार था, अब सत्ता की भूख मिटाने का साधन बन गया है। यही कारण है कि समाज में नफरत, असहिष्णुता और विभाजन की दीवारें दिन-ब-दिन ऊंची होती जा रही हैं।

आज जरूरत है कि धर्म को उसकी मूल भावना के साथ समझा जाए कृ न कि राजनीतिक चश्मे से। जब तक धर्म राजनीति से मुक्त नहीं होगा, तब तक समाज में सच्ची समानता और शांति संभव नहीं। हर धर्म की असली जड़ मानवता है, लेकिन जब राजनीति उसमें प्रवेश करती है तो इंसान, इंसान नहीं रह जाता कृ वह या तो वोटर बन जाता है या दुश्मन। और शायद यही हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी है।

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कांग्रेस अध्यक्ष अलका पाल

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