- भव्यता की चमक के बीच उत्तराखंड की जनता का दर्द और अधूरी राजधानी की कहानी फिर उभरी
- राष्ट्रपति के संदेश के बाद सदन में आत्मसमीक्षा के बजाय अहंकार की राजनीति हावी
- उत्तराखंड की रजत जयंती में छलका सियासी आईना सत्ता और जनप्रतिनिधियों की संवेदनहीनता उजागर
रामनगर(सुनील कोठारी)। उत्तराखंड की रजत जयंती के अवसर पर विधानसभा का विशेष सत्र न केवल एक विधायी कार्यक्रम साबित हुआ बल्कि यह राज्य की राजनीति, नौकरशाही और जनभावनाओं का आईना भी बन गया। पच्चीस वर्षों की यात्रा के बाद जब पूरा प्रदेश आत्ममंथन की दहलीज़ पर खड़ा है, तब यह सत्र उस प्रश्न को पुनः जीवित करता हैकृक्या यह वही उत्तराखंड है जिसकी कल्पना आंदोलनकारियों ने की थी? दो दिनों तक चले इस सत्र में सत्ता, विपक्ष और व्यवस्था तीनों ने अपनी-अपनी दृष्टि रखी, मगर अंत में सवाल वही रहाकृक्या हम सचमुच उस दिशा में बढ़ रहे हैं जहाँ जनता की आकांक्षाएँ पूरी हो सकें? यह आयोजन जितना प्रतीकात्मक था, उतना ही आत्ममूल्यांकन का अवसर भी। लेकिन अफसोस, कई मुद्दे आज भी पुराने सवालों की तरह गूंजते रहे।
सत्र के पहले दिन राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने जो संदेश दिया, वह पूरे राज्य के लिए एक गहरी चेतावनी थी। उन्होंने जनप्रतिनिधियों को आत्मसमीक्षा का आह्वान कियाकृयह कहते हुए कि एक राज्य की प्रगति तभी संभव है जब उसके प्रतिनिधि खुद अपने कार्यों का मूल्यांकन करें। यह केवल एक औपचारिक वाक्य नहीं था, बल्कि एक गंभीर राजनीतिक सन्देश था, जिसने विधायकों और नौकरशाही के संबंधों पर सवाल खड़े कर दिए। यह स्पष्ट हो गया कि उत्तराखंड में विकास की बहस तब तक अधूरी रहेगी जब तक सत्ता और व्यवस्था के बीच संवाद ईमानदार नहीं बनता। राष्ट्रपति की यह टिप्पणी सत्र के वातावरण पर हावी रही और मानो एक अदृश्य आईना सबके सामने रख गई जिसमें सत्ता का चेहरा और जनता का विश्वास दोनों झलकते दिखे।
इसी सत्र से पहले जो दृश्य एयरपोर्ट पर सामने आया, उसने इस संवादहीनता की गहराई को और उजागर कर दिया। राष्ट्रपति के स्वागत के दौरान जब कुछ जनप्रतिनिधि अपनी गाड़ियों से पहुंचे, तो सुरक्षा कारणों के चलते अधिकारियों ने उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया। उन्हें कहा गया कि वे बस से आगे जाएं, और उन्होंने नियमों का पालन करते हुए ऐसा किया। लेकिन जब उन्हीं अधिकारियों ने अपनी गाड़ियों में बैठकर आगे का रास्ता नापा, तो यह व्यवहार जनप्रतिनिधियों के आत्मसम्मान को ठेस पहुँचा गया। यह मुद्दा इतना गहराया कि उसकी गूंज सीधे विधानसभा तक पहुंची। यह घटना केवल एक प्रशासनिक त्रुटि नहीं, बल्कि उस दरार की प्रतीक थी जो जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के बीच वर्षों से बढ़ती जा रही है।

यह सवाल नया नहीं है। दरअसल, उत्तराखंड की राजनीति में नेताओं और नौकरशाहों के बीच यह खींचतान बार-बार दिखती रही है। हर सरकार में यह रिश्ते तालमेल की बजाय टकराव में बदलते रहे हैं। जब जनप्रतिनिधि खुद अपने अधिकारों की रक्षा के लिए आवाज उठाने लगें, तो यह संकेत है कि व्यवस्था में कहीं न कहीं गंभीर असंतुलन है। यह स्थिति लोकतंत्र के लिए भी चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि प्रशासनिक मशीनरी और राजनीतिक नेतृत्व, दोनों ही जनता के भरोसे की दो भुजाएँ हैं। जब इनमें प्रतिस्पर्धा की जगह टकराव ले लेता है, तो विकास का पहिया धीमा पड़ जाता है। यही कारण है कि राष्ट्रपति की आत्मसमीक्षा की सलाह इस सत्र की सबसे महत्वपूर्ण पंक्ति बन गई।
विधानसभा की चर्चाओं में एक और पुराना विषय फिर उभर कर सामने आया कृ स्थाई राजधानी का प्रश्न। पच्चीस वर्ष बीत जाने के बाद भी उत्तराखंड अपनी स्थायी राजधानी तय नहीं कर पाया है। यह तथ्य ही इस रजत जयंती पर्व की सबसे बड़ी विडंबना बन गया। जिस समारोह को स्थायी राजधानी की पृष्ठभूमि में मनाया जाना चाहिए था, वह देहरादून की अस्थायी विधानसभा में सीमित रह गया। यह केवल प्रशासनिक देरी नहीं बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी को उजागर करता है। हर सरकार इस मुद्दे को एजेंडे में रखती है लेकिन निर्णय तक नहीं पहुंच पाती। यह अनिश्चितता अब प्रदेश की पहचान का हिस्सा बन चुकी है।
हालांकि सत्र में राजधानी को लेकर फिर बहस हुई, लेकिन परिणाम वही निकला कृ चर्चा बहुत, निर्णय शून्य। वर्षों से यही क्रम चलता रहा है। जनता को भरोसा दिया गया, समितियाँ बनीं, रिपोर्टें आईं, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला। अब सवाल यह है कि क्या अगले पच्चीस वर्ष भी उत्तराखंड को “अस्थायी राजधानी” की संज्ञा के साथ ही बिताने होंगे? या फिर कोई नेतृत्व इतना साहस दिखाएगा कि इस अंतहीन प्रतीक्षा का अंत कर सके? जनता अब प्रतीक्षा नहीं चाहती कृ उसे निर्णय चाहिए, दिशा चाहिए, और स्पष्ट दृष्टिकोण चाहिए।

जब राजधानी की बहसें विधानसभा के भीतर गूंज रही थीं, उसी समय अल्मोड़ा के चौखुटिया क्षेत्र में जनता अपनी आवाज़ सड़कों पर बुलंद कर रही थी। वहाँ के लोग 2 अक्टूबर से स्वास्थ्य सेवाओं की बेहतरी के लिए पैदल मार्च कर रहे हैं। ये वही लोग हैं जिन्होंने राज्य निर्माण के आंदोलन में अपना सब कुछ दांव पर लगाया था। अब वही आंदोलनकारी अपने बच्चों के इलाज और अस्पतालों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यह दृश्य दर्दनाक भी है और सवालों से भरा भी। जब जनता को अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर उतरना पड़े और जनप्रतिनिधि राजधानी में अपनी गाड़ियों के पार्किंग स्थानों पर बहस करें, तो यह राज्य की प्राथमिकताओं पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
चौखुटिया की यह यात्रा सिर्फ एक मांग भर नहीं, बल्कि व्यवस्था के प्रति उमड़ते जनअसंतोष की सशक्त प्रतीक बन चुकी है। यह यात्रा उस मौन पुकार का प्रतीक है, जो बताती है कि उत्तराखंड के जनआंदोलन की आत्मा आज भी जीवित है, पर उसकी गूंज सत्ता के गलियारों तक अब वैसी नहीं पहुँचती जैसी कभी पहुंचा करती थी। रजत जयंती जैसे समारोह चाहे कितने भी भव्य और चमकदार हों, वे जनता के भीतर पलते उस गहरे दर्द को नहीं ढक सकते जो बदहाल व्यवस्थाओं, अधूरी उम्मीदों और उपेक्षित सपनों से जन्मा है। जब कोई राज्य अपनी स्थापना के 25 वर्ष पूरे होने पर भी स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसी बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करने में नाकाम दिखे, तो फिर केवल राजनीतिक भाषण और आंकड़ों के पुलिंदे उस पीड़ा का इलाज नहीं बन सकते। यही वह निर्णायक मोड़ है जहाँ विकास की असली परिभाषा तय होती है कृ क्या विकास सिर्फ सड़कों, पुलों और योजनाओं का नाम है, या उसमें संवेदनशील शासन की धड़कन भी शामिल है?
पच्चीस वर्षों की इस यात्रा में उत्तराखंड ने निस्संदेह कई उल्लेखनीय उपलब्धियाँ अर्जित की हैं – पर्यटन के क्षेत्र में नई उड़ान, सड़क और आधारभूत ढांचे का तेजी से विस्तार, ऊर्जा उत्पादन में प्रगति, और शिक्षा के क्षेत्र में नई संभावनाओं का उदय। लेकिन इन चमकती सफलताओं के पीछे कुछ गहरे सवाल अब भी अनुत्तरित हैं। आखिर क्यों पलायन की कहानी अब भी पहाड़ की नियति बन चुकी है? क्यों आज भी युवाओं को रोजगार की तलाश में अपने ही राज्य से दूर जाना पड़ता है? यह रजत जयंती सिर्फ जश्न का अवसर नहीं, बल्कि एक आईना होना चाहिए जिसमें राज्य अपनी उपलब्धियों के साथ अपनी कमजोरियों को भी देख सके। लेकिन जब उत्सव आत्ममंथन का माध्यम बनने के बजाय राजनीतिक चमक और प्रचार की होड़ में बदल जाए, तब वह अपनी आत्मा खो देता है। असली जश्न तो तब होगा जब विकास हर घर तक पहुँचे और उत्तराखंड के युवाओं को बाहर जाने की मजबूरी न रहे।

आज उत्तराखंड को सबसे अधिक जरूरत है ऐसी राजनीति की, जिसमें संवेदनशीलता हो, संवाद की शक्ति हो और जनता की नब्ज़ को समझने का साहस हो। यह पर्वतीय राज्य संघर्षों की आग में तपकर बना है, लेकिन अब वही संघर्ष सत्ता और समाज के बीच की खाई में बदलता जा रहा है। विकास की योजनाएँ तभी सार्थक होंगी जब उनका केंद्रबिंदु इंसान रहेगा, न कि केवल आंकड़े और रिपोर्टें। आज जनता को केवल भाषण नहीं, सहभागिता चाहिए – ऐसी राजनीति चाहिए जो सुन सके, महसूस कर सके और जवाबदेही की परंपरा को जीवित रख सके। आने वाले पच्चीस वर्ष इस राज्य के भविष्य की दिशा तय करेंगे, और यह दिशा तभी सही होगी जब सत्ता जनता के दिल की आवाज़ को पहचान सके। असली उत्तराखंड वही होगा जहाँ प्रशासन आदेश नहीं, संवाद बोले; और जहाँ राजनीति सत्ता का नहीं, सेवा का माध्यम बने। यही है इस पर्वतीय भूमि की असली परंपरा और पहचान।
रजत जयंती के इस जश्न में जब विधानसभा की दीवारें तालियों की गूंज से भर रही थीं, तब पहाड़ की घाटियों में एक अलग आवाज़ उठ रही थी – चौखुटिया की जनता की, जो सड़कों पर नारे लगाते हुए कह रही थी, “हमें स्वास्थ्य चाहिए, सम्मान चाहिए।” ये दो दृश्य सिर्फ भौगोलिक नहीं, बल्कि मानसिक दूरी की भी झलक दिखाते हैं – एक तरफ सत्ताधारी वर्ग उपलब्धियों की चमक में डूबा, तो दूसरी ओर जनता अपने बुनियादी अधिकारों के लिए संघर्षरत। यही वह क्षण है जब उत्तराखंड को आईने के सामने खड़ा होकर खुद से सवाल करना चाहिए – क्या यही वह सपना था जिसके लिए यह राज्य बना था? क्या यह वही धरती है जहाँ जनता और शासन एक स्वर में विकास की बात करते थे? अगर जवाब ‘नहीं’ है, तो अब वक्त है उस आईने पर जमी धूल साफ़ करने का, ताकि अगले पच्चीस वर्ष केवल उत्सवों की नहीं, संवेदना और समर्पण की नई कहानी लिखें – जहाँ सत्ता जनता के साथ खड़ी हो, न कि उससे अलग। यही होगा सच्चे उत्तराखंड की पहचान।



