देहरादून(सुनील कोठारी)। उत्तराखंड की राजनीति में इन दिनों एक नई बहस ने माहौल को गर्मा दिया है, और इस बहस की शुरुआत किसी और ने नहीं बल्कि प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री ’’हरीश रावत’’ ने की है। हरीश रावत के हालिया बयान ने कांग्रेस संगठन के भीतर जातीय समीकरणों पर एक नई चर्चा को जन्म दे दिया है। अपने ताजा वक्तव्य में उन्होंने साफ कहा कि अब समय आ गया है जब संगठन में ’’ब्राह्मण समाज’’ के युवाओं और उदार चेहरों को आगे बढ़ाने की जरूरत है। उनका यह कथन राज्य की राजनीति में हलचल मचाने वाला साबित हुआ है क्योंकि इसने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या वास्तव में उत्तराखंड कांग्रेस से ब्राह्मण मतदाता दूर हो चुके हैं और क्या इसी कारण कांग्रेस बार-बार सत्ता से बाहर होती चली गई। यह बहस केवल एक बयान तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने प्रदेश के राजनीतिक समीकरणों और जातीय संतुलन को लेकर गहरे संकेत छोड़ दिए हैं।
राज्य के राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें तो कांग्रेस के लिए यह मुद्दा नया नहीं है। वर्ष 2002 में जब उत्तराखंड में पहली बार विधानसभा चुनाव हुए, तब कांग्रेस को भाजपा के मुकाबले अधिक वोट हासिल हुए थे। उस समय पार्टी के नेतृत्व की पहली पसंद ’’हरीश रावत’’ नहीं बल्कि ’’एन.डी. तिवारी’’ बने, जबकि संगठन की बागडोर हरीश रावत के ही हाथों में थी। यही सिलसिला 2012 के चुनाव में भी देखने को मिला, जब हरीश रावत के नेतृत्व में कांग्रेस ने चुनाव तो जीता, लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी ’’विजय बहुगुणा’’ को सौंप दी गई। इन दोनों घटनाओं ने हरीश रावत और पार्टी नेतृत्व के बीच दूरी बढ़ा दी। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि कांग्रेस ने हर बार नेतृत्व ब्राह्मण समाज के हाथों में देकर हरीश रावत जैसे राजपूत नेता को दरकिनार करने की रणनीति अपनाई, जिससे पार्टी के भीतर एक गहरी खाई बन गई।
लंबे समय तक संगठन की सेवा में लगे रहने के बावजूद हरीश रावत को नेत्तृत्व परिवर्तन के मौके पर नजरअंदाज किया गया। उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाकर और राज्यसभा भेजकर संतुष्ट करने की कोशिश की गई, लेकिन सत्ता का असली नियंत्रण कभी नहीं सौंपा गया। वर्ष 2013 में जब केदार घाटी आपदा आई और विजय बहुगुणा की कार्यशैली पर सवाल उठे, तब जाकर रावत को मुख्यमंत्री बनने का अवसर मिला। इस घटनाक्रम ने यह स्पष्ट किया कि कांग्रेस जब-जब सत्ता में आई, तब ब्राह्मण नेतृत्व को प्राथमिकता दी गई। अब जब हरीश रावत खुले तौर पर ब्राह्मण समाज को अधिक प्रतिनिधित्व देने की बात कर रहे हैं, तो इसे उनकी रणनीति और राजनीतिक विवशता दोनों के रूप में देखा जा रहा है।
कांग्रेस में इस समय ब्राह्मण नेतृत्व का अभाव साफ दिखाई देता है। ’’एन.डी. तिवारी’’ और ’’इंदिरा हृदेश’’ जैसे दिग्गज नेताओं के निधन के बाद इस वर्ग से संबंधित मजबूत चेहरों की कमी महसूस की जा रही है। ’’किशोर उपाध्याय’’ पहले ही भाजपा का दामन थाम चुके हैं और वर्तमान में कांग्रेस में यदि कोई ब्राह्मण चेहरा सक्रिय दिखाई देता है तो वह है ’’भुवन कापड़ी’’, जो खटीमा से विधायक हैं और विधानसभा में उपनेता की भूमिका निभा रहे हैं। इसके विपरीत भाजपा ने उत्तराखंड में ब्राह्मण नेताओं को काफी तवज्जो दी है। चाहे ’’अजय टम्टा’’, ’’अनिल बलूनी’’ या फिर ’’रितु खंडूड़ी’’ जैसे नाम हों, हर स्तर पर भाजपा में इस वर्ग का प्रतिनिधित्व मजबूत बना हुआ है।
राजनीतिक संतुलन साधने में भाजपा ने हमेशा जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों को ध्यान में रखा है। मुख्यमंत्री ’’पुष्कर सिंह धामी’’ के राजपूत होने के बाद पार्टी ने प्रदेश अध्यक्ष का पद गढ़वाल के ब्राह्मण नेता को सौंपकर सामाजिक संतुलन बनाए रखने का संदेश दिया। देहरादून जैसे प्रतिष्ठित शहर के मेयर ’’सौरभ थपलियाल’’ ब्राह्मण वर्ग से आते हैं, जबकि उनके पूर्ववर्ती ’’सुनील उनियाल गामा’’ भी इसी समाज से थे। यह दर्शाता है कि भाजपा ने संगठन से लेकर शासन तक हर स्तर पर ब्राह्मण नेतृत्व को बनाए रखा है, जबकि कांग्रेस में यह परंपरा कमजोर होती चली गई।
यदि अतीत में झांका जाए तो जब भाजपा ने 2007 में पहली बार उत्तराखंड में सत्ता हासिल की थी, तब उसने भी नेतृत्व ब्राह्मण समाज को ही सौंपा। उस समय ’’मेजर जनरल बी.सी. खंडूरी’’ मुख्यमंत्री बने और बाद में ’’डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक’’ को भी इसी वर्ग से नेतृत्व सौंपा गया। वर्तमान में उनकी पुत्री ’’रितु खंडूड़ी’’ विधानसभा अध्यक्ष हैं। इन घटनाओं से यह स्पष्ट झलकता है कि भाजपा ने ब्राह्मण नेतृत्व को निरंतर सशक्त बनाए रखा, जबकि कांग्रेस इस मोर्चे पर पिछड़ गई।
राज्य की जनसंख्या के सामाजिक ढांचे की बात करें तो लगभग 25 प्रतिशत आबादी राजपूत वर्ग की मानी जाती है, जबकि ब्राह्मण समुदाय की हिस्सेदारी लगभग 18 से 19 प्रतिशत के बीच बताई जाती है। इसके बावजूद कांग्रेस ने इस वर्ग को संगठनात्मक स्तर पर वह स्थान नहीं दिया, जिसकी अपेक्षा लंबे समय से की जा रही थी। परिणामस्वरूप ब्राह्मण मतदाता कांग्रेस से दूरी बनाते चले गए और भाजपा की ओर झुकाव बढ़ता गया। 2014, 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव हों या 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावकृहर बार कांग्रेस को करारी शिकस्त झेलनी पड़ी। यहां तक कि नगर निकाय चुनावों में भी भाजपा ने बढ़त बनाए रखी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हरीश रावत का यह बयान केवल ब्राह्मण मतदाताओं को साधने की कोशिश नहीं, बल्कि उनके अपने समर्थकों को संगठनात्मक पदों पर स्थापित करने की रणनीति भी हो सकती है। कई लोग यह भी कह रहे हैं कि आने वाले समय में प्रदेश अध्यक्ष का पद किसी ब्राह्मण चेहरे को देकर रावत संगठन के अंदर शक्ति संतुलन बदलना चाहते हैं। हरीश रावत के विरोधी इस बयान को जातिवादी सोच करार दे रहे हैं। भाजपा नेता ’’महेंद्र प्रसाद भट्ट’’ ने इसे समाज में विभाजन पैदा करने वाला वक्तव्य बताया है, जबकि कांग्रेस के अपने नेता ’’धस्माना’’ और ’’करन माहरा’’ भी रावत के इस रुख से असहज नजर आ रहे हैं।
दरअसल, हरीश रावत और कांग्रेस के ब्राह्मण नेताओं के बीच टकराव का इतिहास पुराना रहा है। चाहे बात ’’एन.डी. तिवारी’’ की हो या ’’विजय बहुगुणा’’ की, या फिर ’’किशोर उपाध्याय’’ और ’’इंदिरा हृदेश’’ कीकृहरीश रावत के संबंध हमेशा टकरावपूर्ण रहे हैं। अब जब उन्होंने ब्राह्मण समाज को अधिक प्रतिनिधित्व देने की बात कही है, तो इसे कई लोग एक राजनीतिक चाल मान रहे हैं जिससे वे अपने विरोधियों को असहज करना चाहते हैं।
फिलहाल यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि हरीश रावत के इस बयान का कांग्रेस पर सकारात्मक असर पड़ेगा या नहीं, लेकिन इतना तय है कि उनके शब्दों ने उत्तराखंड की राजनीति में नई हलचल मचा दी है। पार्टी के भीतर जातीय समीकरणों की चर्चा फिर से तेज हो गई है, और ब्राह्मण नेतृत्व को लेकर मंथन शुरू हो गया है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या कांग्रेस हरीश रावत की इस नई “ब्राह्मण रणनीति” को अपनाकर अपनी राजनीतिक जमीन फिर से मजबूत कर पाती है या यह बहस केवल चुनावी मौसम की एक और राजनीतिक गूंज बनकर रह जाएगी।



