काशीपुर(सुनील कोठारी)। महानगर राजनीति का मौसम कुछ बदला-बदला सा है। गलियों में चर्चाओं का शोर है, चौक-चौराहों पर सियासी हलचलें हैं, और कांग्रेस के गलियारों में एक बार फिर उत्साह लौटता दिख रहा है। कहा जाता है कि जब किसी दल के भीतर सन्नाटा टूटा हुआ महसूस हो, तो समझ लीजिए कोई नई हलचल जन्म ले चुकी है। कुछ वैसा ही मंजर इन दिनों काशीपुर में देखने को मिल रहा है, जहां वरिष्ठ कांग्रेसी नेता अनुपम शर्मा लगातार सुर्खियों में हैं। उनकी बढ़ती गतिविधियां, हर मंच पर दिखाई देती मौजूदगी और संगठन के बीच उनका बढ़ता प्रभाव यह इशारा दे रहा है कि कांग्रेस अब फिर से मैदान सजाने की तैयारी में है। विधानसभा चुनाव भले ही दूर हों, मगर माहौल कुछ यूं बन रहा है जैसे काशीपुर की राजनीति पहले ही चुनावी मोड़ पर पहुंच चुकी हो।
पिछले दो दशकों में कभी जो इलाका कांग्रेस का मजबूत किला कहा जाता था, वह समय के साथ भाजपा का गढ़ बन गया। राज्य गठन के बाद कांग्रेस की किस्मत जैसे बर्फ की तरह जम गई, और हरभजन सिंह चीमा ने भाजपा का परचम ऐसी मजबूती से लहराया कि कांग्रेस लगातार चार चुनावों तक हार का स्वाद चखती रही। दिलचस्प यह कि पांचवीं बार भी जीत की विरासत को त्रिलोक सिंह चीमा ने आगे बढ़ाया और कांग्रेस को एक और झटका दे दिया। इन हारों ने पार्टी के जोश को इस कदर ठंडा कर दिया कि संगठन की धड़कनें भी धीमी पड़ने लगीं। गुटबाजी ने पार्टी के ढांचे को कमजोर किया और नेताओं के बीच दूरी ने कार्यकर्ताओं की उम्मीदें भी तोड़ दीं। पर राजनीतिक परिदृश्य कभी स्थिर नहीं रहता, और अब लगता है कि वही सोई हुई ऊर्जा फिर से करवट ले रही है।

परिवर्तन की यह लहर तब और तेज हुई जब निकाय चुनाव के दौरान संदीप सहगल मैदान में उतरे। भले ही जीत उनके हिस्से नहीं आई, लेकिन उनके प्रयासों ने कांग्रेस संगठन को एक नई चेतना दी। बिखरे हुए कार्यकर्ता फिर से एकजुट हुए, और पार्टी के अंदर संवाद का सिलसिला शुरू हुआ। निकाय चुनावों ने कांग्रेस के भीतर छिपी संभावनाओं को जगाया, और अब वही चिंगारी अनुपम शर्मा के नेतृत्व में एक बार फिर भड़कती नजर आ रही है। बीते कुछ महीनों में शर्मा का सियासी सफर लगातार चर्चा में रहा है। उन्होंने पार्टी के हर स्तर पर संपर्क बढ़ाया, नाराज़ चेहरों को मनाया, और निष्क्रिय कार्यकर्ताओं में फिर से जान फूंकी। यह ऊर्जा अब कांग्रेस के गलियारों में नए उत्साह का संचार कर रही है।
जहां कभी सन्नाटा पसरा था, वहां अब हर बैठक में गहमागहमी है। अनुपम शर्मा का अंदाज़ अलग हैकृवो सियासत को केवल भाषणों तक सीमित नहीं रखते बल्कि कार्यकर्ताओं के बीच जाकर संवाद करते हैं। उनके इसी जुड़ाव ने पुराने नेताओं को भी सक्रिय किया है। दिलचस्प यह है कि जो नेता कुछ वक्त पहले तक संदीप सहगल के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे थे, अब वे शर्मा के साथ मंच साझा करते दिखाई दे रहे हैं। यह बदलाव कांग्रेस के भीतर नए समीकरणों को जन्म दे रहा है। सियासी विश्लेषकों का कहना है कि यह सिर्फ संगठनात्मक हलचल नहीं, बल्कि आने वाले विधानसभा चुनावों की दिशा तय करने वाला संकेत भी हो सकता है।

कांग्रेस के भीतर अब एक नया आत्मविश्वास लौटता दिख रहा है। पार्टी के कई वरिष्ठ सदस्य खुलकर कह रहे हैं कि काशीपुर में अब नए चेहरे को मौका दिया जाना चाहिए, जो कार्यकर्ताओं के बीच स्वीकार्यता रखता हो। ऐसे में अनुपम शर्मा को एक मजबूत संभावित उम्मीदवार के रूप में देखा जा रहा है। वह न केवल संगठन को जोड़ने में सफल हो रहे हैं, बल्कि जनता के मुद्दों पर भी सक्रियता से मुखर हैं। चाहे बेरोज़गारी का सवाल हो, स्थानीय विकास का विषय या फिर उद्योगों की स्थितिकृहर मंच पर शर्मा की उपस्थिति अब चर्चा का विषय बन चुकी है। उनके भाषणों में जोश के साथ ज़मीन की गंध भी महसूस होती है, जो कार्यकर्ताओं के मनोबल को बढ़ा रही है।
काशीपुर की राजनीति का इतिहास यह बताता है कि यहां संगठन की मजबूती ही जीत का असली आधार रही है। कांग्रेस ने जब-जब एकजुट होकर काम किया, तब-तब उसका जनाधार मजबूत हुआ। अब सवाल यह है कि क्या अनुपम शर्मा इस एकजुटता को एक स्थायी रूप दे पाएंगे? कई राजनीतिक जानकार मानते हैं कि शर्मा का मौजूदा रुख सिर्फ संगठनात्मक अभियान नहीं है, बल्कि यह उनकी ‘ग्राउंड प्रिपरेशन’ हैकृएक लंबी रणनीति का शुरुआती हिस्सा, जो सीधे विधानसभा चुनाव तक पहुंच सकता है। अगर यह रफ्तार इसी तरह बनी रही, तो आने वाले महीनों में काशीपुर कांग्रेस का चेहरा और स्वरूप दोनों ही बदल सकते हैं।

अब काशीपुर का हर गलियारा कांग्रेस की नई हलचल का साक्षी है। पार्टी दफ्तरों में बैठकों की रौनक लौट आई है, सोशल मीडिया पर नेताओं की सक्रियता बढ़ गई है, और कार्यकर्ता एक बार फिर उत्सव जैसा माहौल बना रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि यह वही दौर है जब पार्टी अपनी नींव को फिर से मजबूत कर सकती है। हालांकि कुछ पुराने नेता इस तेजी को लेकर सशंकित भी हैं, लेकिन अधिकांश का मानना है कि कांग्रेस के लिए यह एक सकारात्मक संकेत है।अब नज़रें टिक गई हैं आने वाले महीनों पर, जब तय होगा कि क्या अनुपम शर्मा की यह सियासी यात्रा उम्मीदवार की चौखट तक पहुंचेगी या यह जोश किसी रणनीतिक रोक पर थम जाएगा। लेकिन इतना तो तय है कि काशीपुर की कांग्रेस अब वैसी नहीं रही जैसी पिछले चुनाव के बाद थी। उसमें अब एक नई लय है, नई उम्मीद है, और एक ऐसा चेहरा है जो कार्यकर्ताओं के बीच भरोसे का प्रतीक बनकर उभरा है। राजनीति के इस बदलते दौर में शर्मा का यह उभार न सिर्फ काशीपुर बल्कि पूरे उत्तराखंड की सियासत के लिए नया अध्याय लिख सकता है।



