रामनगर। देशभर में इन दिनों दीपोत्सव की रौनक के साथ भाई-बहन के अटूट प्रेम का पावन पर्व भाई दूज भी पूरे उल्लास और श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। यह त्योहार जिसे अलग-अलग प्रांतों में भाई बीज, भाऊ बीज, भाई टीका और भ्रातृ द्वितीया के नाम से भी जाना जाता है, कार्तिक शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है। इस पर्व का महत्व रक्षाबंधन से कम नहीं माना जाता, क्योंकि यह भी भाई-बहन के स्नेह, अपनापन और आत्मीय बंधन की अमर निशानी है। इस दिन बहनें अपने भाइयों के माथे पर तिलक लगाकर उनकी दीर्घायु, समृद्धि और मंगलकामना करती हैं, जबकि भाई अपनी बहन की सुरक्षा, सम्मान और खुशहाली का वचन देते हैं। देश के हर हिस्से में इस दिन का उल्लास देखने लायक होता है, जब आंगन में सजे थाल, जलते दीपक और मुस्कुराते चेहरों से रिश्तों की गरमाहट झलकती है। परंपराओं के साथ यह पर्व भावनाओं की उस गहराई को दर्शाता है, जो समाज में प्रेम, सौहार्द और एकता की ज्योति जलाए रखता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार इस पावन अवसर को यम द्वितीया और चित्रगुप्त जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। कथा है कि मृत्यु के देवता यमराज अपनी बहन यमुना के आग्रह पर इसी दिन उनके घर भोजन ग्रहण करने पहुंचे थे। यमुना ने अपने भाई का स्नेहपूर्ण स्वागत करते हुए उनके माथे पर तिलक लगाया और स्वादिष्ट व्यंजन परोसे। भाई के प्रति इस निस्वार्थ प्रेम से प्रसन्न होकर यमराज ने वरदान दिया कि इस तिथि पर जो भी भाई अपनी बहन के घर जाकर तिलक ग्रहण करेगा, उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं सताएगा। इसी दिन यमराज ने अपने मंत्री चित्रगुप्त को आदेश दिया कि नर्क में पीड़ा भोग रही आत्माओं को मुक्ति प्रदान की जाए। इसलिए इस तिथि पर यमदेव के साथ चित्रगुप्त की भी पूजा का विधान है। लोकमान्यताओं में यह विश्वास गहराई से जुड़ा है कि यमराज और यमुना का यह भावपूर्ण मिलन भाई-बहन के अटूट बंधन की उस परंपरा का आरंभ था, जो आज भी भारतीय संस्कृति की पहचान बना हुआ है।
पौराणिक कथा का एक और रूप श्रीकृष्ण और उनकी बहन सुभद्रा से जुड़ा है। कहा जाता है कि जब नरकासुर का अंत करने के बाद श्रीकृष्ण द्वारका लौटे, तो सुभद्रा ने अपने भाई का हर्षोल्लास से स्वागत किया। उन्होंने श्रीकृष्ण के माथे पर तिलक लगाकर उनकी विजय की मंगल कामना की। उसी क्षण से भाई दूज का यह पवित्र संस्कार आत्मिक स्नेह का प्रतीक बन गया। इस कथा का सार केवल धार्मिकता तक सीमित नहीं, बल्कि यह समाज के लिए एक गहरा संदेश भी समेटे है — यदि हम अपने भीतर की नकारात्मकता, स्वार्थ और ईर्ष्या जैसे नरकासुरों का अंत करें, तो जीवन में शांति, प्रेम और सहयोग के प्रकाश फैल सकते हैं। इस पर्व की वास्तविक भावना हमें यह सिखाती है कि हर रिश्ते की जड़ में पवित्रता और करुणा होनी चाहिए, क्योंकि वही मनुष्य को मानवता के असली अर्थ से जोड़ती है।
भाई दूज के इस रूहानी पर्व का सार केवल परंपराओं में नहीं, बल्कि उसकी आत्मिक व्याख्या में भी निहित है। जब बहन अपने भाई के माथे पर तिलक करती है, तो यह केवल एक रस्म नहीं होती, बल्कि उस क्षण वह अपने भाई को यह स्मरण दिला रही होती है कि हम सब आत्माएं एक ही परमात्मा की संतान हैं। वह परमात्मा, जो निराकार, ज्योति स्वरूप और शिव कहलाता है। इस आध्यात्मिक दृष्टिकोण को जीवन में अपनाने से व्यक्ति का मन निर्मल होता है, विचारों में सकारात्मकता आती है और हृदय करुणा से भर जाता है। भाई दूज का असली अर्थ यही है कि हम अपने रिश्तों में केवल सांसारिक नहीं, बल्कि आत्मिक बंधन को भी जीवित रखें। यह पर्व इस बात की याद दिलाता है कि प्रेम, विश्वास और आशीर्वाद से बढ़कर कोई उपहार नहीं होता। जब मनुष्य इन मूल्यों को अपने जीवन में उतारता है, तो समाज से द्वेष, हिंसा और कलह जैसी बुराइयाँ मिट सकती हैं, और वही दिव्यता पूरे वातावरण में फैल सकती है जो दीपावली के दीयों की तरह उजाला बिखेरती है।



