देहरादून(सुनील कोठारी)। उत्तराखंड में भ्रष्टाचार की गहराई एक बार फिर उस समय उजागर हुई जब आरटीआई के ज़रिए सामने आए दस्तावेज़ों ने जिला पंचायत पौड़ी गढ़वाल के भीतर चल रहे गंदे खेल का परदा खोल दिया। जानकारी के अनुसार एक सरकारी अधिकारी की गाड़ी एक ही दिन में एक लाख चार सौ पचासी रुपये का डीज़ल पी गई। कुछ ही महीनों में यह आंकड़ा करोड़ों तक पहुंच गया। यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं बल्कि सरकारी अभिलेखों में दर्ज हकीकत है। खुलासे के मुताबिक, कई बार एक ही दिन में एक ही वाहन में सत्तर हज़ार रुपये तक का तेल भरा गया। अब सोचने वाली बात यह है कि जब विभागों में इस स्तर पर लूट का खेल खुलेआम खेला जा रहा हो, तो “जीरो टॉलरेंस” का नारा क्या महज़ दिखावा बनकर रह गया है? ये सारे आंकड़े खुद सरकार के ही कागज़ों में दर्ज हैं, जो प्रशासन की पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करते हैं।
मामला यहीं खत्म नहीं होता। वही विभाग, जिसकी तत्कालीन अध्यक्ष एक महिला थीं, उनके निजी ख़र्च तक का बोझ विभाग के खजाने पर डाला गया। आरटीआई के माध्यम से प्राप्त दस्तावेज़ों के अनुसार, अध्यक्ष के ब्यूटी पार्लर के बिल तक विभाग से चुकाए गए। सोचिए, क्या कभी सुना था कि किसी सरकारी विभाग के फंड से किसी अधिकारी या जनप्रतिनिधि के सौंदर्य प्रसाधन का खर्च निकाला जाए? इतना ही नहीं, विभाग में सफाई के नाम पर पंद्रह कर्मचारियों को नियुक्त दिखाया गया, लेकिन वास्तविकता में सात ही कार्यरत पाए गए। बाकी कर्मचारियों के नाम पर पैसा निकालकर हज़म कर लिया गया। जिन सात लोगों ने वाकई काम किया, उन्हें महीनों तक वेतन नहीं मिला और अंततः वे धरने पर बैठने को मजबूर हो गए। भ्रष्टाचार का यह खुला नंगा नाच किसी फिल्म की कहानी नहीं बल्कि हमारे सिस्टम की सड़ी हुई हकीकत है, जहाँ फाइलें पहले तैयार होती हैं और अनुवंध पत्र बाद में।
यह खेल तब और स्पष्ट हो जाता है जब वही अधिकारी और कर्मचारी पत्रकारों पर ही उंगली उठाने लगते हैं। आरटीआई से खुलासे करने वाले पत्रकारों पर यह कहकर निशाना साधा गया कि वे “ब्लैकमेलर” हैं और “गलत उद्देश्य” से सूचना मांग रहे हैं। जिला पंचायत पौड़ी के कई कर्मचारियों ने मिलकर वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को शिकायत भेजी कि पत्रकार सोशल मीडिया और यूट्यूब के माध्यम से सरकार और मंत्री धन सिंह रावत की छवि खराब कर रहे हैं। इस शिकायत में 13 कर्मचारियों के हस्ताक्षर हैं, जिसमें सचिव से लेकर जिलाधिकारी तक को प्रति भेजी गई। यानि सत्य उजागर करने की सजा अब धमकियों और आरोपों के रूप में दी जा रही है। यह एक नया तरीका है दृ भ्रष्टाचार को छिपाने का और सच्चाई बताने वालों को डराने का।
आरटीआई के दस्तावेजों से जो तस्वीर सामने आई है, वह चौंकाने वाली है। जिला पंचायत के अपर मुख्य अधिकारी डॉ. सुनील कुमार के पास दो सरकारी वाहन दर्ज हैं दृ एक स्कॉर्पियो और एक अन्य वाहन। इन दोनों गाड़ियों में एक ही दिन में लाखों का डीज़ल भरा गया। दर्जनों बिल ऐसे हैं जिनमें एक ही तिथि पर कई-कई लाख रुपये के डीज़ल के खर्च दर्शाए गए हैं। जांच में यह भी सामने आया कि ये गाड़ियां वास्तव में डॉ. सुनील कुमार की निजी वाहन हैं, जिनकी ईंधन आपूर्ति का भुगतान विभागीय खाते से किया गया। यह खुलासा जैसे ही सामने आया, तो प्रशासनिक गलियारों में हलचल मच गई। लेकिन इसके बावजूद किसी स्तर पर कार्रवाई नहीं हुई। सवाल यह भी है कि जब विभागीय खाते से हर भुगतान के लिए अध्यक्ष और अपर मुख्य अधिकारी के संयुक्त हस्ताक्षर आवश्यक हैं, तो आखिर इन फर्जी भुगतान पर साक्षर कौन कर रहा था?
यहाँ एक और नाम सामने आता है कृ तत्कालीन जिला पंचायत अध्यक्ष रेख्सी सान्ती देवी का। आरटीआई के अनुसार, न केवल उनके ब्यूटी पार्लर का खर्च विभाग से निकाला गया, बल्कि उनके आवास का टीवी, लैपटॉप, फर्नीचर, बिजली बिल और नेटवर्क बिल तक सरकारी खाते से भरे गए। यह भ्रष्टाचार का ऐसा रूप है, जो न केवल नियमों का मखौल उड़ाता है बल्कि शासन की नैतिकता को भी तार-तार करता है। सवाल उठता है कि सान्ती देवी आखिर क्यों चुप रहीं? क्या इसलिए क्योंकि उनके निजी खर्चे विभाग उठा रहा था? आरटीआई के दस्तावेज़ इस बात के ठोस प्रमाण हैं कि यह सब कुछ योजनाबद्ध ढंग से किया गया, जहाँ हर भुगतान को सरकारी मान्यता दी गई और नियमों की धज्जियाँ उड़ाई गईं।
जिले के अंदर चल रहे इस घोटाले का एक और काला अध्याय सामने तब आया जब कूड़ा प्रबंधन के नाम पर करोड़ों की हेराफेरी पकड़ी गई। कम्पेक्टर मशीनें खरीदने के लिए सफाई कर्मचारियों की तैनाती दिखाई गई, लेकिन हकीकत में केवल सात ही कर्मचारी काम कर रहे थे। बाकी कर्मचारियों के नाम पर निकाला गया पैसा सीधे अफसरों की जेब में चला गया। जब असली कर्मचारी वेतन न मिलने पर धरने पर बैठे, तब मामले ने तूल पकड़ा। सफाई निरीक्षक अनील नेगी, जिन पर पहले से ही 2 करोड़ 65 लाख रुपये की वित्तीय हानि का आरोप साबित हो चुका था, अब इस नए घोटाले में भी सामने आए हैं। विभागीय जांच में अनील नेगी के भ्रष्टाचार की पुष्टि हुई थी, लेकिन कार्रवाई के बजाय उन्हें और अधिक जिम्मेदारियाँ सौंप दी गईं। यही वह लापरवाही है जो किसी छोटे चोर को डाकू बना देती है।
अपर मुख्य अधिकारी डॉ. सुनील कुमार पर भी एक और बड़ा आरोप सामने आया है। शासनादेश के विपरीत उन्होंने दिसंबर 2024 के बाद पाँच करोड़ रुपये से अधिक की निर्माण परियोजनाओं के कोटेशन जारी किए। जबकि नियमानुसार ऐसा करने का कोई अधिकार उन्हें नहीं था। जांच में पाया गया कि 21 नवंबर 2024 को टेंडर जारी किया गया, 21 दिसंबर को खोलने की तिथि तय हुई, लेकिन हैरानी की बात यह है कि टेंडर खुलने से पहले ही 29 नवंबर को ठेकेदारों को अनुबंध पत्र के लिए बुला लिया गया और 30 नवंबर को कार्यादेश भी जारी कर दिया गया। यही नहीं, एक और उदाहरण में 6 दिसंबर को जारी टेंडर को 28 दिसंबर को ही खोला गया और फरवरी 2024 में अनुबंध भेज दिए गए। यह सब इस बात का प्रमाण है कि भ्रष्टाचार केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं बल्कि पूरे तंत्र में फैला हुआ है।
और भी चौंकाने वाली बात यह है कि पिछले दो वर्षों से जिला पंचायत का सदन तक नहीं बुलाया गया, फिर भी करोड़ों का बजट पारित कर उसका भुगतान कर दिया गया। जबकि उत्तराखंड पंचायती राज अधिनियम 2016 की धारा 103 के तहत बिना सदन की बैठक के न तो बजट पारित हो सकता है और न ही किसी प्रकार का भुगतान संभव है। इस सबके बावजूद शासन और प्रशासन की चुप्पी यह दर्शाती है कि भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस का दावा महज़ राजनीतिक जुमला बन चुका है। जब अधिकारी की गाड़ी एक दिन में लाखों का तेल गटक जाए, जब विभाग के पैसे से ब्यूटी पार्लर, टीवी और फर्नीचर का बिल भरा जाए, और जब शिकायत करने वालों को “ब्लैकमेलर” कहकर डराया जाए, तो यह साफ़ है कि सिस्टम बीमार हो चुका है।
आज यह सवाल हर उत्तराखंडी के मन में उठना चाहिए कि जो सरकार खुद को पारदर्शिता की मिसाल बताती है, उसके दफ्तरों में इतना गंदा खेल क्यों चल रहा है? जब “जीरो टॉलरेंस” का नारा केवल भाषणों तक सिमट जाए और भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने वाले ही पुरस्कृत होने लगें, तो समझ लेना चाहिए कि जनता के पैसे से पोषित यह व्यवस्था अब सड़ चुकी है। अब वक्त आ गया है जब जनता को जवाब मांगना होगा कृ कि आखिर किसके संरक्षण में ये कारनामे हो रहे हैं? और कब तक जनता के नाम पर लूट का यह खेल यूँ ही जारी रहेगा? उत्तराखंड की जनता के टैक्स से चलने वाली ये संस्थाएँ अगर अब भी नहीं सुधरीं, तो “भ्रष्टाचार मुक्त राज्य” का सपना केवल एक नारा बनकर रह जाएगा।



