देहरादून(सुनील कोठारी)। बरसात की मार झेल रहे उत्तराखंड के जंगल इस समय भयावह हालात से गुजर रहे हैं। तेज बारिश, बादल फटने और लगातार हो रहे भूस्खलन ने न केवल इंसानों की जिंदगी को हिला दिया है बल्कि जंगलों की शांति और वहां बसे वन्यजीवों की दुनिया को भी असुरक्षा से भर दिया है। जिन इलाकों में कभी गुलदार, भालू और अन्य प्राणी सहजता से विचरण करते थे, वहां आज पानी, कीचड़ और धंसान ने उनके ठिकाने उजाड़ दिए हैं। नतीजा यह हुआ कि ये जानवर अपने पुराने बसेरों को छोड़कर नई और सुरक्षित जगहों की तलाश में भटक रहे हैं। इस बदलते माहौल ने उनके स्वभाव को भी प्रभावित किया है और यही वजह है कि अब मानव-वन्यजीव संघर्ष के मामले और अधिक भयावह रूप लेने लगे हैं, जिससे ग्रामीण और शहरवासी दोनों असमंजस में हैं।
जिस तरह से भारी बारिश ने गांवों, कस्बों और मुख्य सड़कों को बर्बाद किया है, उसी तरह जंगलों के भीतर की पगडंडियां और पुराने पारंपरिक रास्ते भी मिट गए हैं। जिन इलाकों में कभी वन्यजीव आराम से आते-जाते थे, वहां अब बारिश की तबाही के निशान दिखाई पड़ रहे हैं। खासतौर पर शिकारी जानवर जैसे गुलदार और भालू, जिनकी जीवनशैली बड़े दायरे में घूमकर शिकार करने पर निर्भर करती है, आज सबसे ज्यादा संकट में हैं। वे न सिर्फ अपने शिकार से दूर हो रहे हैं बल्कि असुरक्षित महसूस करते हुए अनजाने इलाकों की ओर बढ़ रहे हैं। जानकार मानते हैं कि इस कठिन परिस्थिति ने इन जानवरों को अत्यधिक विचलित कर दिया है और यही कारण है कि उनके और इंसानों के बीच टकराव तेजी से बढ़ रहा है।
बारिश के मौसम में एक और समस्या इन जानवरों को परेशान कर रही है और वह है कीड़ों-मक्खियों का बढ़ना। पानी और नमी बढ़ने से जंगलों में मच्छरों, मक्खियों और अन्य कीटों की संख्या असामान्य रूप से बढ़ गई है। ऐसे माहौल से परेशान होकर वन्यजीव ऊंचाई वाले सुरक्षित स्थानों की ओर जाते हैं, लेकिन वहां भी भूस्खलन जैसी आपदाएं उन्हें स्थायी रूप से टिकने नहीं देतीं। यह लगातार पलायन उनके जीवन को अस्त-व्यस्त कर रहा है। भालू, गुलदार और अन्य जीव ऐसे हालात में और ज्यादा बेचौन होकर इंसानी बस्तियों के पास आने लगे हैं, जिससे खतरे की स्थितियां और गंभीर हो रही हैं।
उत्तराखंड वन विभाग में पीसीसीएफ वाइल्डलाइफ रंजन कुमार मिश्रा का कहना है कि मौजूदा समय वन्यजीवों के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण है। भालुओं की गुफाओं और गड्ढों जैसे वास स्थलों में पानी भर गया है, जिससे वे अपने सुरक्षित ठिकाने खो चुके हैं। यही कारण है कि अब ये जानवर बस्तियों की ओर देखने लगे हैं और यह सीधा-सीधा इंसानों के लिए खतरनाक है। मिश्रा बताते हैं कि वन विभाग की टीम लगातार इन परिस्थितियों पर निगरानी रख रही है और लोगों को भी जागरूक किया जा रहा है ताकि किसी तरह की अप्रिय घटना से बचा जा सके। इसके बावजूद जंगल से बस्ती की तरफ आते वन्यजीवों का डर ग्रामीणों के मन में गहराता जा रहा है।
हाल के दिनों में राज्य के कई हिस्सों से वन्यजीवों के हमलों की खबरें लगातार आई हैं। सतपुली क्षेत्र में भालू के हमले की घटना ने सबसे ज्यादा चर्चा बटोरी, क्योंकि इस आक्रामक भालू को देखते हुए वन विभाग को इसे मारने तक के आदेश देने पड़े। पौड़ी जिले में गुलदार के हमले से दो बच्चों की दर्दनाक मौत ने लोगों के बीच आतंक और बढ़ा दिया। इतना ही नहीं, अल्मोड़ा, चंपावत और पौड़ी में भी गुलदार की मौजूदगी और लोगों के बीच दहशत फैलाने वाले कई मामले दर्ज हुए हैं। यह सब घटनाएं इस ओर इशारा करती हैं कि बारिश और आपदा ने इन जानवरों को और ज्यादा आक्रामक और खतरनाक बना दिया है।
आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थिति और भी भयावह नजर आती है। इस साल अब तक वन्यजीवों के हमलों में करीब 32 लोगों की जान जा चुकी है, जबकि 236 से अधिक लोग घायल हुए हैं। इनमें सबसे ज्यादा मौतें बाघों के हमले से हुई हैं, जिनकी संख्या 11 बताई जा रही है। इसके अलावा गुलदार के हमलों में 7 और हाथियों के हमलों में 6 लोगों की मौत दर्ज हुई है। अन्य घटनाओं में भी अलग-अलग वन्यजीवों ने अपनी मौजूदगी से इंसानों को नुकसान पहुंचाया है। यह तथ्य इस बात की पुष्टि करते हैं कि प्राकृतिक आपदा ने वन्यजीवों की सामान्य जीवनचर्या को पूरी तरह बदल दिया है और अब वे असामान्य व्यवहार करने लगे हैं।
राजाजी टाइगर रिजर्व के ऑनरेरी वार्डन राजीव तलवार कहते हैं कि बारिश के कहर ने भालू और स्नो लेपर्ड जैसे जीवों को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है। इसके अलावा घास के मैदानों में रहने वाले अन्य वन्यजीव भी इससे अछूते नहीं रहे। तलवार मानते हैं कि इन परिस्थितियों ने न केवल उनके आवासों को बर्बाद किया है बल्कि उनके व्यवहार में भी स्पष्ट बदलाव लाया है। यह बदलाव आगे चलकर और भी गंभीर परिणाम ला सकता है, क्योंकि यह जानवर असामान्य रूप से इंसानों के करीब आने लगे हैं और टकराव की घटनाएं बढ़ रही हैं।
मौजूदा समय वन्यजीव अपनी सामान्य गतिविधियों की बजाय भोजन और ठिकाने की तलाश में अधिक संघर्ष कर रहे हैं। भालुओं के लिए यह समय बेहद कठिन माना जाता है क्योंकि यह उनका हाइबरनेशन से पहले का वक्त होता है, जब उन्हें सामान्य से कहीं ज्यादा भोजन की जरूरत होती है। बारिश और आपदा ने उनकी इस जरूरत को पूरा करना और भी मुश्किल बना दिया है। यही कारण है कि वे बस्तियों की ओर आ रहे हैं और इंसानों से भिड़ंत बढ़ा रहे हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि जब तक प्राकृतिक हालात सामान्य नहीं होते, तब तक यह समस्या और ज्यादा विकराल होती जाएगी और इंसानों को और ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत होगी।



