रामनगर। उत्तराखंड में सहकारिता विभाग की ओर से इस बार राज्यभर में एक नई पहल के तहत 3 अक्टूबर से 31 दिसम्बर तक विशेष सहकारिता मेले आयोजित किए जाएंगे जिनमें ग्रामीण अंचलों के किसानों, महिला स्व सहायता समूहों और विभिन्न सहकारी संस्थाओं को अपने उत्पादों के प्रदर्शन और बिक्री का अवसर मिलेगा। प्रदेश में लंबे समय से स्थानीय उत्पादों को बाजार तक पहुंचाने के प्रयास जारी थे लेकिन इस योजना के अंतर्गत अब बड़े स्तर पर मंच उपलब्ध कराया जा रहा है जिससे न केवल उत्पादन करने वाले वर्ग को लाभ होगा बल्कि उपभोक्ताओं को भी शुद्ध और देसी वस्तुएं एक ही जगह पर आसानी से उपलब्ध हो सकेंगी। मेले में कृषि आधारित वस्तुएं, जैविक उत्पाद, हस्तशिल्प, बागवानी से जुड़े सामान, गृह उद्योग से निर्मित सामग्री और महिला समूहों द्वारा तैयार विविध वस्तुओं की बिक्री होगी, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी और युवाओं में रोजगार के नए रास्ते भी खुलेंगे।
प्रदेश सरकार का यह प्रयास सहकारिता को नयी दिशा देने वाला माना जा रहा है क्योंकि इससे छोटे किसानों और महिला समूहों को सीधे बाजार तक पहुंचने का अवसर मिलेगा, जबकि अब तक उन्हें बिचौलियों पर निर्भर रहना पड़ता था। स्थानीय उत्पादों की बिक्री बढ़ने से न केवल इन वर्गों की आय में वृद्धि होगी बल्कि आत्मनिर्भर उत्तराखंड के संकल्प को भी मजबूती मिलेगी। सहकारिता मेलों में शामिल होने वाले महिला समूह लंबे समय से अलग-अलग तरह के हस्तनिर्मित उत्पाद तैयार कर रहे थे लेकिन उनके सामने विपणन की समस्या सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ी थी। इस मंच से उन्हें ग्राहकों तक सीधा संपर्क मिलेगा और उनके सामान की सही कीमत भी सुनिश्चित हो पाएगी। किसानों के लिए भी यह आयोजन किसी वरदान से कम नहीं होगा क्योंकि वे अपने कृषि उत्पाद सीधे उपभोक्ताओं तक पहुंचा सकेंगे और इससे खेती को टिकाऊ बनाने की दिशा में भी बड़ा कदम साबित होगा।
इन मेलों के आयोजन का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि पर्वतीय और ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी कई किसान और महिला समूह छोटे स्तर पर उत्पादन करते हैं और उनके सामान की पहचान बाजार तक नहीं पहुंच पाती। सहकारिता विभाग के इस निर्णय से राज्य के विभिन्न जिलों में तैयार किए जाने वाले विशिष्ट उत्पाद जैसे मंडुवा, झंगोरा, जैविक सब्जियां, शहद, पहाड़ी दालें और हस्तनिर्मित सामान बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंच पाएंगे। इससे उपभोक्ताओं में स्थानीय वस्तुओं के प्रति रुचि भी बढ़ेगी और प्रदेश की पारंपरिक पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर नई ऊंचाई मिलेगी। मेले एक तरह से लोक उत्सव का रूप लेंगे जहां खरीददारी के साथ-साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जा सकते हैं और लोग अपने परिवारों के साथ पारंपरिक माहौल में आनंद ले सकेंगे।
उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियां और यहां की ग्रामीण अर्थव्यवस्था हमेशा से चुनौतीपूर्ण रही है, लेकिन सहकारिता मेलों से यह उम्मीद की जा रही है कि इससे दूरस्थ इलाकों में उत्पाद बनाने वाले लोगों को नयी ऊर्जा मिलेगी। महिला स्व सहायता समूह लंबे समय से परिश्रम करके जो उत्पाद तैयार कर रहे थे उन्हें अब सही मंच मिलने जा रहा है, जिससे उनके आत्मविश्वास में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी होगी। मेले से प्रदेश के युवाओं को भी उद्यमिता की ओर प्रेरणा मिलेगी क्योंकि वे देख सकेंगे कि किस तरह परंपरागत वस्तुओं को नए अंदाज में प्रस्तुत करके बाजार में अच्छी कीमत हासिल की जा सकती है। इस दौरान राज्य सरकार का उद्देश्य केवल बिक्री बढ़ाना ही नहीं बल्कि स्थानीय संसाधनों को टिकाऊ विकास की दिशा में मोड़ना भी है ताकि आने वाले वर्षों में सहकारिता की यह श्रृंखला प्रदेश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन सके।
इन सहकारिता मेलों से पर्यटन क्षेत्र को भी अप्रत्यक्ष रूप से लाभ मिलने की संभावना जताई जा रही है क्योंकि इन मेलों का आयोजन नवरात्र और दीपावली से लेकर क्रिसमस और नए साल तक के बीच होगा जब राज्य में बाहर से बड़ी संख्या में पर्यटक आते हैं। ऐसे में मेले पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बनेंगे और वे यहां की संस्कृति, खानपान और स्थानीय उत्पादों को नजदीक से जान पाएंगे। इससे न केवल मेलों का दायरा बढ़ेगा बल्कि प्रदेश की छवि भी सशक्त होगी। स्थानीय किसानों और महिला समूहों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान दिलाने का मार्ग खुलेगा क्योंकि कई बार पर्यटक अपने साथ यहां की वस्तुएं बाहर ले जाते हैं और वहां उनका प्रचार-प्रसार होता है। इस प्रकार सहकारिता मेलों का यह आयोजन केवल आर्थिक गतिविधि तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि यह सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक स्तर पर प्रदेश को नई पहचान देने वाला साबित होगा।



