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हाईकोर्ट ने रामनगर पुछड़ी परिवारों की बेदखली रोककर दी बड़ा और न्यायपूर्ण राहत संदेश

नैनीताल विकास प्राधिकरण की मनमानी पर कोर्ट ने लगाया रोक, रजिस्ट्रीशुदा जमीन और बैंक ऋण से बने मकानों वाले 36 परिवारों को मिली बड़ी राहत।

रामनगर। ग्राम पुछड़ी में 36 परिवारों के लिए बड़ी राहत की खबर सामने आई है। नैनीताल विकास प्राधिकरण (एनडीए) द्वारा चलाए जा रहे ध्वस्तीकरण अभियान को हाईकोर्ट ने फिलहाल रोक दिया है। यह निर्णय उन परिवारों के लिए निश्चित तौर पर राहत भरा है, जिनके घर और जमीन कई वर्षों से सुरक्षित मानी जा रही थी। अधिवक्ता दुष्यंत मैनाली ने कोर्ट में यह साबित किया कि उनके मुवक्किलों ने लगभग पंद्रह साल पहले रजिस्ट्रीशुदा ज़मीन खरीदी थी और उनकी नाम खतौनी में दर्ज हैं। इसके अलावा, घर निर्माण बैंक ऋण से कराया गया था। बावजूद इसके, प्राधिकरण ने दीवारों पर गलत नामों के नोटिस चिपकाकर एकतरफा बेदखली आदेश पारित किए थे, जो सुप्रीम कोर्ट की स्पष्ट गाइडलाइंस के खिलाफ है। इस मामले में हाईकोर्ट ने कार्रवाई को रोकते हुए कहा कि कोई भी बेदखली का आदेश तब तक लागू नहीं होगा जब तक कोर्ट अन्यथा न कहे।

न्यायालय को प्रस्तुत दस्तावेज़ों में यह भी उजागर हुआ कि एनडीए जिस 1987 के रामनगर मास्टर प्लान का हवाला दे रहा है, वह कभी अधिसूचित नहीं हुआ और न ही उस पर शहर की योजनाओं के अनुरूप कोई कार्य हुआ। अधिवक्ता दुष्यंत मैनाली ने स्पष्ट किया कि ग्राम पुछड़ी के लिए 13 नवम्बर 2017 की शासन अधिसूचना में यह तय किया गया था कि यह क्षेत्र उन गांवों में शामिल है, जहां प्राधिकरण से नक्शा पास कराने की बाध्यता नहीं है। इसके बावजूद प्राधिकरण ने ऐसा दिखाने की कोशिश की कि मकान निर्माण अवैध है। कोर्ट में यह बात रखते हुए मैनाली ने कहा कि यह न केवल नियमों का उल्लंघन है, बल्कि स्थानीय लोगों के अधिकारों के साथ भी खिलवाड़ है। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए दोनों पक्षों को सुनने के बाद 26 अगस्त 2025 को प्रस्तावित ध्वस्तीकरण कार्रवाई पर रोक लगा दी।

इस मामले की जांच में यह भी सामने आया कि प्राधिकरण द्वारा जारी नोटिस और बेदखली आदेश पूरी तरह से गलत और मनमानी तरीके से पारित किए गए थे। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब जमीन रजिस्ट्रीशुदा है, खतौनी में नाम दर्ज हैं और मकान बैंक ऋण से बन चुका है, तब प्राधिकरण का यह कदम अनुचित और गैरकानूनी माना जाएगा। दुष्यंत मैनाली ने कहा कि उनके मुवक्किलों को प्राधिकरण द्वारा परेशान करने का उद्देश्य अस्पष्ट है, और यह देखने की जरूरत है कि आखिर किसके दबाव में सरकारी विभाग इस तरह की कार्रवाई करने पर उतारू हुआ। इस कदम से स्थानीय निवासियों में गहरा आक्रोश और असुरक्षा की भावना व्याप्त हो गई थी।

हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब ग्रामीणों में एक राहत की लहर दौड़ गई है। प्राधिकरण को कोर्ट की रोक के बाद फिलहाल कोई भी ध्वस्तीकरण कार्रवाई करने से रोका गया है। यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सीधे तौर पर ग्रामीणों के निवास और उनकी संपत्ति के अधिकार से जुड़ा है। दुष्यंत मैनाली ने अदालत में यह भी बताया कि उनके मुवक्किलों ने सभी कानूनी प्रक्रिया पूरी की थी और मकान निर्माण में कोई भी नियम उल्लंघन नहीं किया गया। बावजूद इसके प्राधिकरण ने नियमों की अनदेखी कर एकतरफा कार्रवाई की कोशिश की, जो न केवल न्याय के खिलाफ है, बल्कि आम जनता के विश्वास को भी कमजोर करती है।

ग्रामीणों के लिए यह जीत केवल मकान बचाने की ही नहीं, बल्कि उनके अधिकारों की रक्षा की भी जीत है। कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि किसी भी सरकारी प्राधिकरण को बिना कानूनी प्रक्रिया पूरी किए और बिना उचित नोटिस दिए बेदखली नहीं कर सकता। दुष्यंत मैनाली ने इस अवसर पर कहा कि यह आदेश अन्य ग्रामीणों और शहरवासियों के लिए भी एक संदेश है कि किसी भी प्रकार की मनमानी और अनुचित कार्रवाई अदालत की नजर से बच नहीं सकती। यह मामला भविष्य में प्राधिकरण की कार्रवाइयों में पारदर्शिता और कानूनी प्रक्रिया की आवश्यकता को और अधिक मजबूत करेगा।

इस पूरे घटनाक्रम के दौरान यह सवाल उठता है कि आखिर प्राधिकरण किसके दबाव में था और क्यों उसने 36 परिवारों को बेघर करने की कोशिश की। जब जमीन रजिस्ट्रीशुदा है, मकान बैंक ऋण से बन चुके हैं और खतौनी में नाम दर्ज हैं, तब इस तरह की कार्रवाई का कोई कानूनी आधार नहीं है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि ग्रामीणों के साथ अन्याय नहीं होने दिया जाएगा। इस आदेश के बाद स्थानीय लोग अब अपने घरों और जमीन के साथ सुरक्षित महसूस कर रहे हैं और प्राधिकरण की मनमानी पर अंकुश लगने की उम्मीद कर रहे हैं।

रामनगर के ग्राम पुछड़ी के 36 परिवारों को हाईकोर्ट की कार्रवाई ने नई उम्मीद दी है। यह मामला केवल स्थानीय विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे उत्तराखंड में प्राधिकरण की कार्यप्रणाली और नागरिक अधिकारों के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है। दुष्यंत मैनाली और उनके मुवक्किलों ने जिस तरह कोर्ट में मजबूत तर्क प्रस्तुत किए, उसने स्पष्ट किया कि कानूनी प्रक्रिया और नियमों का पालन हर स्थिति में आवश्यक है। 26 अगस्त 2025 तक ध्वस्तीकरण रोक का आदेश ग्रामीणों के लिए राहत और न्याय की गारंटी बनकर सामने आया है।

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