नई दिल्ली(सुनील कोठारी)। देश में हुनर विकास को आर्थिक प्रगति की रीढ़ मानते हुए केंद्र सरकार हर साल हजारों करोड़ रुपये का बजट आवंटित करती है, लेकिन वास्तविक तस्वीर इस दावे से बिल्कुल उलट नजर आती है। शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में प्रशिक्षित और दक्ष कर्मचारियों की भारी कमी बनी हुई है, वहीं बेरोज़गारी का आंकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है। तमाम नीतियों, योजनाओं और प्रमाणपत्रों के बावजूद, जमीनी हकीकत यह दर्शाती है कि अवसर लगातार हाथ से निकल रहे हैं और पूरी व्यवस्था कहीं न कहीं असफल साबित हो रही है। यह स्थिति ऐसे तीखे सवाल उठाती है कि आखिर वह भारी-भरकम फंड कहां जा रहा है, प्रशिक्षण सामग्री और पाठ्यक्रम किसके द्वारा तैयार किए जा रहे हैं, क्या प्रशिक्षण संस्थानों की विश्वसनीयता पर भरोसा किया जा सकता है या यह सब महज़ फंड के दुरुपयोग और राजनीतिक संरक्षण के खेल का एक हिस्सा है। जब सिखाए जा रहे कौशल और उन पर खर्च किए जा रहे धन के बीच कोई समानता ही न हो, तो यह पूरी प्रक्रिया संदेह के घेरे में आ जाती है। इसीलिए, स्किल विकास और रोज़गार योजनाओं की गहन पड़ताल करना आवश्यक हो गया है, जिनके लिए कुल 48,000 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है।
प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (पीएमकेवीवाई) को 15 जुलाई 2015 को लॉन्च किया गया था, जिसके लिए कुल 10,570.18 करोड़ रुपये का फंड निर्धारित किया गया। आंकड़े बताते हैं कि इसमें से 9,803.23 करोड़ रुपये खर्च हुए, जबकि शेष 766.95 करोड़ का हिसाब आज तक साफ नहीं हो पाया। इस योजना के तहत वैमानिकी, कृषि, सौंदर्य प्रसाधन जैसे 36 क्षेत्रों में प्रशिक्षण देने का दावा किया गया, मगर कई बार दिए गए कौशल अस्पष्ट और अप्रभावी साबित हुए, जिससे बेहतर रोजगार के अवसर नहीं बन पाए। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर आशीष राठी ने खुलासा किया कि उनके भाई को गुरुग्राम में नौकरी का आश्वासन देकर केवल 15 दिन की ट्रेनिंग और एक प्रमाणपत्र थमा दिया गया, उसके बाद कोई संपर्क नहीं किया गया। सरकारी आंकड़े भी कई सवाल खड़े करते हैं-फेज़ 2 में जहां 1.1 करोड़ उम्मीदवारों को ट्रेनिंग दी गई, वहीं फेज़ 3 में यह संख्या 93 फीसदी घटकर केवल 7.37 लाख रह गई, और फेज़ 4 में महज 5.43 लाख पर आ गई। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि प्लेसमेंट का अनुपात वर्षों में लगातार गिरा, 2016 के 12.7 फीसदी से घटकर पीएमकेवीवाई-4 में केवल 0.37 फीसदी तक सिमट गया। शारदा प्रसाद समिति ने पहले ही चेताया था कि अधिकांश प्रशिक्षण बेहद छोटे समय के थे, कई तो 10 दिन से भी कम के, जिसमें अभ्यर्थियों की पूर्व शिक्षा का कोई ध्यान नहीं रखा गया।
दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्य योजना (डीडीयू-जीकेवाई) सितंबर 2014 में शुरू हुई थी, जिसका उद्देश्य सौंदर्य प्रसाधन, एक्सपोर्ट असिस्टेंट, मेसन टाइलिंग और बेकिंग टेक्नीशियन सहित 250 तरह के कौशलों में उच्चस्तरीय प्रशिक्षण देना था। लेकिन न पाठ्यक्रम की गुणवत्ता में पारदर्शिता रही, न प्रशिक्षकों की योग्यता पर ध्यान दिया गया। दिल्ली के प्रतिज्ञा स्किल डेवलपमेंट सेंटर में 250 से ज्यादा लोगों को ट्रेनिंग दी गई, लेकिन प्लेसमेंट का आधिकारिक आंकड़ा महज 27 फीसदी रहा, क्योंकि कई नियोक्ता नकद भुगतान करते थे, जिसके प्रमाण उपलब्ध नहीं कराए जा सके। संशोधित अनुमान बताते हैं कि 2022 तक इस योजना पर 9,111 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं और 11 साल में 16,90,046 व्यक्तियों को ट्रेनिंग दी गई, जिनमें से 10,97,265 को रोजगार मिला। आंकड़े यह भी दर्शाते हैं कि सरकार ग्रामीण युवाओं तक इस योजना की जागरूकता पहुंचाने में असफल रही। आकाश डावर ने बताया कि उनके भाई को यूपी में खुदरा कारोबार का कोर्स करवाकर दूसरे शहर में नौकरी का भरोसा दिया गया, लेकिन वहां न काम मिला, न वेतनकृकेवल मुफ्त की ट्रेनिंग और लौटने पर बेरोज़गारी का सामना।

नेशनल रूरल लाइवलिहुड्स मिशन (डीएवाई-एनआरएलएम) 2011 और नेशनल अर्बन लाइवलिहुड्स मिशन (डीएवाई-एनयूएलएम) 2013 में शुरू हुए, जिन्हें मिलाकर दीनदयाल अंत्योदय योजना के लिए कुल 4,351 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया। उद्देश्य गरीब परिवारों को कौशल प्रशिक्षण और आसान कर्ज सुविधा प्रदान कर सशक्त बनाना था, लेकिन यह जानकारी ही नहीं दी गई कि ग्रामीण महिलाओं या खोमचे वालों को कौन से विशेष कौशल सिखाए गए। भ्रष्टाचार की कहानियां भी सामने आईंकृजैसे एक वर्कर, आशा ने बताया कि उनके एसएचजी को टेलरिंग ट्रेनिंग का वादा किया गया था, ट्रेनर महज़ दो बार आया और फिर गायब हो गया, जबकि ईएमआई वे आज भी भर रही हैं।
युवाओं को अप्रेंटिसशिप के जरिए सशक्त करने के लिए 2016 में नेशनल एपरेंटिसशिप प्रोमोशन स्कीम (एनएपीएस) लाई गई, लेकिन यह भी नतीजों के मामले में नाकाम रही। न तो लाभार्थियों के राज्यवार आंकड़े दिए गए, न यह सुनिश्चित किया गया कि प्रशिक्षणार्थियों को उचित कौशल और वेतन मिला या नहीं। 2018 में दायर एक आरटीआई से खुलासा हुआ कि 10,000 करोड़ रुपये के बजट में से 2020 के मध्य तक केवल 108 करोड़ रुपये ही वितरित हुए, जो कुल आवंटन का महज 1 फीसदी है। इसके बावजूद, एनएपीएस-1.0 की नाकामी पर चर्चा किए बिना एनएपीएस-2.0 (2022-26) के लिए 1,942 करोड़ रुपये का नया बजट घोषित कर दिया गया।
यह पूरी तस्वीर न केवल सरकारी तंत्र की लापरवाही को उजागर करती है, बल्कि इसे युवाओं के साथ एक बड़े विश्वासघात के रूप में देखा जा रहा है। लाखों युवाओं का भविष्य, उनके सपने और भारत के विकास के दावे इस अपारदर्शी व्यवस्था के बोझ तले दबते जा रहे हैं। सरकार के सामने अब दो ही रास्ते हैंकृया तो कौशल विकास कार्यक्रमों में पूरी पारदर्शिता और जवाबदेही लाकर वास्तविक नतीजे पेश करे, या फिर इन 48,000 करोड़ रुपये को स्वास्थ्य, शिक्षा और स्वच्छता जैसे क्षेत्रों में निवेश करने का साहस दिखाए, जहां इनका सही मायनों में उपयोग हो सके। यह मामला सिर्फ धन के दुरुपयोग का नहीं, बल्कि राष्ट्र की अगली पीढ़ी और उसकी उम्मीदों के भविष्य का है, जिसे नज़रअंदाज़ करने की कीमत बहुत भारी पड़ सकती है।



