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रक्षाबंधन पर उर्वशी दत्त बाली का संदेश मिलकर मनाएं त्योहार और जोड़ें रिश्तों के दिल

परिवारिक रिश्तों की मजबूती और अपनापन बढ़ाने का आह्वान करते हुए उर्वशी दत्त बाली ने रक्षाबंधन पर सभी से मनमुटाव भूलकर प्रेम और हंसी के साथ त्योहार मनाने की अपील

काशीपुर। रक्षाबंधन के पावन अवसर पर नगर की प्रथम महिला और महापौर दीपक बाली की धर्मपत्नी और डी- बाली ग्रुप की डायरेक्टर श्रीमती उर्वशी दत्त बाली ने पारिवारिक एकता और रिश्तों की मिठास पर विशेष जोर देते हुए एक प्रेरक संदेश दिया। उन्होंने कहा कि देश की सांस्कृतिक परंपराओं में त्योहार केवल सजावट, मिठाइयों और रंग-बिरंगी खुशियों के लिए नहीं होते, बल्कि ये वे अवसर हैं जो परिवारों के दिलों को करीब लाते हैं और रिश्तों में मजबूती भरते हैं। वर्षभर में अलग-अलग समय पर आने वाले ये पर्व न केवल बाजारों में रौनक बढ़ाते हैं, बल्कि लोगों को एक-दूसरे से मिलने और अपनेपन की अनुभूति कराने का भी काम करते हैं। उन्होंने बताया कि त्योहारों का असली अर्थ केवल उत्सव मनाना नहीं, बल्कि भावनाओं का आदान-प्रदान करना और पूरे साल एकता, प्रेम और सौहार्द का वातावरण बनाए रखना है।

त्योहारों के महत्व पर विस्तार से चर्चा करते हुए श्रीमती बाली ने कहा कि आजकल जैसे-जैसे संयुक्त परिवार टूटकर छोटे होते जा रहे हैं, वैसे-वैसे इन अवसरों पर अपनों की कमी और ज्यादा महसूस होने लगी है। उन्होंने कहा कि “त्योहार तभी अपनी पूरी खूबसूरती दिखाते हैं जब हम सभी एक साथ बैठकर, हंसकर और प्रेमपूर्वक उन्हें मनाते हैं।” उन्होंने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि छोटी-छोटी नोकझोंक हर परिवार का हिस्सा होती है, मगर इन्हें दिल पर नहीं लेना चाहिए, क्योंकि यही हल्के-फुल्के मतभेद रिश्तों में जीवंतता और गर्माहट बनाए रखते हैं। उन्होंने एक उदाहरण देते हुए कहा कि अगर कोई व्यक्ति जंगल में अकेला तीन दिन बिता दे, तो न बातचीत करने वाला होगा, न हंसाने वाला, न तकरार करने वालाकृऔर यही दिखाता है कि रिश्तों की खूबसूरती इन आपसी पलों में ही छिपी होती है। उनके अनुसार हल्की-फुल्की तकरार रिश्तों को और गहराई देती है, इसलिए इन्हें मन में बोझ बनाकर रखने की बजाय मुस्कुराते हुए भूल जाना चाहिए और त्योहारों को पूरे जोश और अपनत्व के साथ मनाना चाहिए।

अपने संदेश में उन्होंने लोगों से यह भी आग्रह किया कि दूरियां इतनी न बढ़ाएं कि अपनों का चेहरा देखना भी अच्छा न लगे। उन्होंने कहा कि जीवन केवल एक बार मिलता है और इस जीवन में अपनेपन का एहसास, आपसी मेल-मिलाप, प्रेम और हंसी-ठिठोली ही सबसे बड़ा खजाना है। उन्होंने विशेष रूप से भाई-बहन जैसे पवित्र रिश्तों की अहमियत पर जोर देते हुए कहा कि इन बंधनों को कभी कमजोर न होने दें, बल्कि हर अवसर पर इन्हें और मजबूत करें। उनका मानना है कि जिंदगी में मिलना-जुलना, प्यार जताना, मजाक करना और कभी-कभार की बहस भी रिश्तों का हिस्सा है, जिसे हमें अपनाना चाहिए, न कि उससे दूर भागना चाहिए। उन्होंने सभी से अपील की कि खासकर रक्षाबंधन जैसे पवित्र अवसर पर मनमुटाव को भूलकर केवल अपनेपन की डोर को और मजबूत बनाना ही सबसे बड़ी खुशी है।

श्रीमती बाली ने अपने वक्तव्य में बुजुर्ग माता-पिताओं के प्रति भी विशेष संवेदनशीलता दिखाते हुए कहा कि अगर परिवार में बच्चों के बीच किसी तरह का मतभेद है, तो बुजुर्गों को इसमें मध्यस्थ बनकर सुलह करवानी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि बुजुर्गों का सबसे बड़ा आनंद तब होता है जब वे अपने पूरे परिवार को एक साथ बैठा, हंसता-बोलता और साथ भोजन करता देख पाते हैं। उनके अनुसार, उम्र के अंतिम पड़ाव पर जब बुजुर्ग शारीरिक रूप से अधिक सक्रिय नहीं रह पाते, तब उनका सुख केवल इस बात में छिपा होता है कि वे अपने परिवार को एकजुट देख सकें। उन्होंने परिवार के सभी सदस्यों से अनुरोध किया कि इस खुशी को उनसे न छीनें, बल्कि त्योहारों पर पूरे परिवार के साथ बैठकर उनके चेहरे पर मुस्कान लाने की कोशिश करें।

अंत में उन्होंने जोर देकर कहा कि परिवार की असली ताकत केवल साथ बैठकर खाना खाने या त्योहार मनाने में नहीं, बल्कि उस आत्मीयता और जुड़ाव में है जो हर सदस्य के दिल में बसता है। रक्षाबंधन जैसे पावन अवसर पर जब भाई अपनी बहन की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधता है और बहन उसके दीर्घायु होने की प्रार्थना करती है, तो वह पल केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि प्रेम और विश्वास की गहरी मिसाल होता है। श्रीमती बाली के इस भावपूर्ण संदेश ने स्पष्ट कर दिया कि त्योहार केवल तिथियों का मेल नहीं, बल्कि दिलों का संगम हैं, और इन्हें मिलकर मनाना ही इनका सबसे पवित्र रूप है।

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