रामनगर(सुनील कोठारी)। पर्वतीय राज्य उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में हाल के वर्षों में प्राकृतिक आपदाओं की तीव्रता और आवृत्ति ने स्थानीय निवासियों के साथ-साथ विशेषज्ञों को भी गंभीर चिंता में डाल दिया है। विशेष रूप से बादल फटने की घटनाएं अब सामान्य होती जा रही हैं, जो क्षणभर में बड़े पैमाने पर तबाही मचाने में सक्षम होती हैं। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, वायुमंडल में अत्यधिक नमी का अचानक और तीव्र वर्षा के रूप में गिरना इस आपदा का कारण बनता है। इस प्रक्रिया के पीछे जलवायु परिवर्तन को एक प्रमुख कारक माना जा रहा है, क्योंकि वैश्विक तापमान में वृद्धि और हिमालयी ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से पहाड़ी पारिस्थितिकी तंत्र में गंभीर असंतुलन पैदा हो रहा है। इन परिवर्तनों के साथ-साथ अनियोजित निर्माण कार्य और वनों की अंधाधुंध कटाई ने भी आपदा जोखिम को बढ़ा दिया है, जिससे इन क्षेत्रों में जनजीवन निरंतर खतरे में है।
उत्तरकाशी जिले के धराली में हाल ही में खरी गंगा पर बादल फटने की घटना ने एक बार फिर इस भयावह समस्या को उजागर कर दिया। इस घटना में अचानक आई बाढ़ ने होटलों, होमस्टे और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को भारी नुकसान पहुंचाया। वर्ष 2023 के बाद से इस तरह की घटनाओं की संख्या में तेजी से वृद्धि दर्ज की गई है, जिससे निचले इलाकों में बसे कई होटल और बस्तियां बर्बादी का शिकार हो चुकी हैं। विशेषज्ञ चेतावनी देते रहे हैं कि हिमालयी क्षेत्रों में हो रहे अनियोजित निर्माण, नदियों के किनारे बने मकान और सड़कों का विस्तार प्रकृति के साथ गंभीर छेड़छाड़ है। लगभग पांच हजार किलोमीटर की मैदानी पट्टी से अलग कई स्थानों पर बेतरतीब जनसंख्या वृद्धि ने पर्यावरणीय दबाव को कई गुना बढ़ा दिया है। 2016 में उच्चतम न्यायालय ने इस स्थिति पर चिंता जताते हुए बताया था कि उत्तराखंड में लगभग पंद्रह सौ नाले अब सड़कों में तब्दील हो चुके हैं, जो प्राकृतिक जल प्रवाह को बाधित कर रहे हैं।

इतिहास पर नजर डालें तो यह समस्या नई नहीं है। 7 फरवरी 2021 को ज्योतिर्मठ विकासखंड के रेणी गांव में ग्लेशियर टूटने से धौली गंगा में भयंकर बाढ़ आई थी, जिसमें 107 लोगों की जान गई थी। 2023 में ऋषिगंगा, यमुनोत्री और बागेश्वर में भी बादल फटने और भारी बारिश की घटनाओं में 10 लोगों की मौत हुई। 5 अगस्त 2025 को उत्तरकाशी गंगोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग पर धराली में हुई बादल फटने की घटना ने फिर एक बार दिखा दिया कि पहाड़ी क्षेत्रों में आपदा का खतरा लगातार मंडरा रहा है। तेज बारिश और बाढ़ के कारण स्थानीय ढांचागत संरचनाएं बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गईं, जिससे लोगों की आजीविका और पर्यटन पर भी गंभीर असर पड़ा।
पिछले पच्चीस वर्षों में उत्तराखंड के विभिन्न हिस्सों में हुई बादल फटने की घटनाएं बड़े पैमाने पर जान-माल के नुकसान का कारण बनी हैं। 2002 में उत्तरकाशी जिले के कई गांवों में इस आपदा ने तबाही मचाई, जिसमें दर्जनों लोगों की मौत हुई। 2010 में पिथौरागढ़ के मुनस्यारी क्षेत्र में बादल फटने से कई मकान बह गए और 35 से अधिक लोगों की जान चली गई। 2012 में उत्तरकाशी में हुई एक और घटना में 30 लोग मारे गए और 36 गांव प्रभावित हुए। वर्ष 2013 में आई केदारनाथ त्रासदी तो अब भी लोगों की स्मृतियों में ताजा है, जब चौराबाड़ी ग्लेशियर झील के फटने के बाद आई बाढ़ ने हजारों लोगों की जान ली और पूरे क्षेत्र को खंडहर में बदल दिया।

इन भयावह घटनाओं के बीच भी निर्माण गतिविधियां बिना किसी ठोस योजना और पर्यावरणीय आकलन के जारी हैं। नदियों के किनारे होटलों, मकानों और दुकानों का निर्माण हो रहा है, जिससे नदी का प्राकृतिक बहाव अवरुद्ध होता है और आपदा के समय पानी का दबाव सीधे आबादी वाले क्षेत्रों में पहुंच जाता है। पिछले डेढ़ दशक में नालों और जलधाराओं के किनारे सड़कों और अन्य ढांचागत परियोजनाओं के विकास ने पहाड़ों के भूगोल और जल विज्ञान को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। स्थानीय लोग और पर्यावरणविद बार-बार चेतावनी दे रहे हैं कि यदि यह सिलसिला नहीं रुका, तो आने वाले वर्षों में नुकसान और भी अधिक होगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता, लेकिन उचित योजना, सतत विकास और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से इन आपदाओं के जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है। पर्वतीय क्षेत्रों में निर्माण कार्यों पर सख्त नियंत्रण, नदियों के किनारों पर निर्माण पर प्रतिबंध और वनों के संरक्षण की दिशा में ठोस कदम उठाना अनिवार्य है। स्थानीय प्रशासन, वैज्ञानिक संस्थान और जनता के बीच बेहतर समन्वय से ही इस चुनौती का सामना किया जा सकता है। धराली, उत्तरकाशी और अन्य क्षेत्रों में हुई हालिया घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि तुरंत प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो हिमालयी राज्यों का भविष्य गंभीर संकट में पड़ सकता है। प्राकृतिक आपदाओं की यह बढ़ती श्रृंखला केवल चेतावनी नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई की मांग कर रही है, ताकि आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित और संतुलित पर्यावरण मिल सके।



