रामनगन(सुनील कोठारी)। देश की सबसे प्रतिष्ठित चयन संस्थाओं में गिनी जाने वाली कर्मचारी चयन आयोग यानी एसएससी एक बार फिर विवादों के घेरे में आ चुकी है। लाखों युवाओं का सपना लिए बैठी इस संस्था पर अब यह आरोप लग रहे हैं कि उसने न केवल परीक्षा की निष्पक्षता को तार-तार किया बल्कि पूरी प्रक्रिया को शक के घेरे में लाकर युवाओं के भविष्य को गहरी अंधेरी सुरंग में धकेल दिया। एसएससी परीक्षा घोटाले को लेकर सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक गुस्से की लहर दौड़ गई है। युवाओं का कहना है कि उन्होंने दिन-रात एक करके जिस परीक्षा की तैयारी की, उसमें पेपर लीक, नकल माफिया और तकनीकी गड़बड़ियों ने सब कुछ बर्बाद कर दिया। यह घोटाला सिर्फ एक परीक्षा नहीं, बल्कि उस भरोसे पर हमला है, जो युवा वर्षों से सरकार की चयन प्रक्रिया पर करते आए हैं।
बीते कुछ वर्षों में एसएससी द्वारा आयोजित परीक्षाओं में जिस प्रकार से बार-बार पेपर लीक की घटनाएं सामने आई हैं, उससे युवाओं का धैर्य अब टूट चुका है। लाखों छात्रों ने अपने करियर की सारी संभावनाएं इसी परीक्षा पर टिका दी थीं, लेकिन जब परीक्षा केंद्रों पर तकनीकी गड़बड़ियों से लेकर प्रश्नपत्र सोशल मीडिया पर वायरल होने तक की खबरें आईं, तो उम्मीदवारों को ऐसा महसूस हुआ जैसे उनके सपनों को जानबूझकर रौंदा जा रहा है। परीक्षा के दौरान बार-बार सर्वर का डाउन होना, लॉगिन में समस्या आना, या परीक्षा का समय खत्म होने से पहले ही सिस्टम लॉक हो जाना जैसी घटनाएं कोई सामान्य लापरवाही नहीं कही जा सकतीं। यह एक ऐसा चक्रव्यूह बन गया है, जिसमें मेहनती और ईमानदार छात्र फंसकर रह गए हैं, और परीक्षा माफिया ने एक बार फिर सिस्टम की कमजोरी को भुनाया है।
इस घोटाले ने सिर्फ छात्रों की मेहनत पर पानी नहीं फेरा, बल्कि सरकारी व्यवस्था की पारदर्शिता पर भी गहरा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। जिन परीक्षाओं को निष्पक्ष माना जाता था, आज वही सबसे अधिक विवादित होती जा रही हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह सब कुछ उस दौर में हो रहा है जब देश डिजिटल इंडिया के दावे कर रहा है और ऑनलाइन परीक्षाओं को पारदर्शिता का माध्यम बताया जा रहा है। सवाल यह भी उठता है कि अगर बार-बार तकनीकी समस्याएं और सुरक्षा चूक होती रही हैं, तो आखिर क्यों एसएससी जैसे संस्थान ने समय रहते कोई कठोर कदम नहीं उठाया? क्यों नकल गिरोहों को पकड़ने के लिए कोई ठोस कार्ययोजना नहीं बनाई गई? और क्यों अभ्यर्थियों की शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया गया?
एसएससी परीक्षा घोटाले ने इस बात को एक बार फिर साबित कर दिया है कि सिर्फ तकनीक से पारदर्शिता नहीं लाई जा सकती, जब तक कि उसे नियंत्रित करने वाले हाथ ईमानदार न हों। अब जबकि पूरे देश में छात्रों का गुस्सा फूट पड़ा है, मांग की जा रही है कि इस घोटाले की निष्पक्ष जांच हो और दोषियों को सख्त सज़ा मिले। सोशल मीडिया पर हैशटैग #SSCSCAM ट्रेंड कर रहा है और युवा खुलकर यह सवाल उठा रहे हैं कि आखिर कब तक उनकी मेहनत यूं ही सिस्टम की अनदेखी का शिकार होती रहेगी। कई संगठनों ने विरोध प्रदर्शन की चेतावनी दी है और सरकार से यह भी मांग की है कि परीक्षा प्रणाली में पूरी तरह से सुधार किया जाए ताकि भविष्य में कोई भी छात्र इस प्रकार की पीड़ा से न गुज़रे।
यह घोटाला महज़ एक विभागीय विफलता नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का आईना है जो बार-बार युवाओं के विश्वास के साथ खिलवाड़ करती आई है। प्रतियोगी परीक्षाओं के माध्यम से सरकारी नौकरी पाने की उम्मीद लगाए बैठे करोड़ों युवाओं के लिए यह एक बड़ा झटका है। ऐसे में सवाल यह नहीं कि किसने पेपर लीक किया, सवाल यह है कि जो जिम्मेदार थे, उन्होंने इस घोटाले को रोकने के लिए क्या किया? क्या एसएससी की जिम्मेदारी नहीं बनती थी कि वह परीक्षा की शुचिता बनाए रखने के लिए हर संभव उपाय करता? जब परीक्षाएं बार-बार विवादों में घिर जाती हैं और फिर भी किसी को सज़ा नहीं मिलती, तो इससे माफियाओं के हौसले और बुलंद हो जाते हैं।
आज लाखों युवा निराशा और अविश्वास के दौर से गुजर रहे हैं। वे पूछ रहे हैं कि क्या मेहनत करने से भी अब भविष्य सुरक्षित नहीं रह गया है? परीक्षा घोटालों की यह परंपरा अगर यूं ही चलती रही, तो आने वाले समय में देश की प्रशासनिक व्यवस्था में योग्य और ईमानदार लोगों की जगह ऐसे लोग पहुंचेंगे, जो फर्जीवाड़े के जरिए सिस्टम में घुसपैठ करेंगे। यह सिर्फ युवाओं का ही नहीं, बल्कि देश के भविष्य का भी अपमान है। इसलिए अब वक्त आ गया है कि सरकार इस मामले को गंभीरता से ले और सख्त कार्रवाई कर वह संदेश दे कि अब इस प्रकार की गड़बड़ियों को किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। वरना हर घोटाले के साथ देश एक-एक प्रतिभा को खोता रहेगा।



