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चुकुम गांव के विस्थापन को मिली नई राह, हाथीडंगर में 40 हेक्टेयर भूमि पर जताई सहमति

तीन दशक से आपदा के साये में जी रहे चुकुम गांववासियों को अब सुरक्षित भविष्य की उम्मीद, विस्थापन की प्रक्रिया जल्द हो सकती है शुरू।

रामनगर।उत्तराखंड के नैनीताल जिले के रामनगर तहसील से करीब 24 किलोमीटर की दूरी पर स्थित आपदा प्रभावित चुकुम गांव के लिए एक बार फिर से राहत की उम्मीद दिखाई दी है। वर्षों से लगातार स्थायी पुनर्वास की मांग कर रहे इस गांव के निवासियों को शनिवार को रामनगर तराई पश्चिमी वन प्रभाग के अंतर्गत आमपोखरा रेंज के हाथीडंगर क्षेत्र में नई भूमि दिखाई गई, जिसे देखकर ग्रामीणों में उत्साह की लहर दौड़ गई। करीब 40 हेक्टेयर में फैली इस भूमि को प्रशासन द्वारा विस्थापन के लिए उपयुक्त पाया गया है। यदि सभी औपचारिकताएं समय पर पूरी हो जाती हैं तो चुकुम गांव के लगभग 120 परिवारों को इस स्थान पर सुरक्षित और स्थायी रूप से बसाया जा सकता है, जिससे उनका दशकों पुराना संघर्ष एक सकारात्मक परिणति की ओर बढ़ सकेगा।

लगभग तीन दशकों से लगातार असुरक्षा और कठिनाइयों का सामना कर रहे चुकुम गांव के निवासियों ने पहली बार एक स्वर में दिखाई गई भूमि को लेकर सहमति जताई है। यह गांव रामनगर वन प्रभाग के अंतर्गत आता है और आपदाओं की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील माना जाता है। बरसात के मौसम में कोसी नदी के उफान से यह गांव पूरी तरह से अलग-थलग पड़ जाता है, जिससे स्कूली बच्चों, महिलाओं और बीमार व्यक्तियों को जान जोखिम में डालकर जीवन-यापन करना पड़ता है। स्कूल जाने वाले बच्चों को प्रतिदिन नदी पार कर मोहान इंटर कॉलेज जाना पड़ता है और किसी की तबीयत बिगड़ने पर 25 किलोमीटर दूर रामनगर तक पहुंचना एक चुनौती बन जाता है। बारिश के महीनों में यह दुश्वारियां और भी विकराल रूप ले लेती हैं।

अब तक विस्थापन की दिशा में हुई कई कोशिशें या तो असफल रहीं या फिर अधूरी छोड़ दी गईं। वर्ष 2016 में एक सर्वे भी करवाया गया था, परंतु उसकी कोई ठोस परिणति नहीं निकली। इसके पश्चात जसपुर के केलाखेड़ा क्षेत्र में भूमि चिन्हित की गई, पर ग्रामीणों ने वहां बसने से इनकार कर दिया। फिर से आमपोखरा रेंज में एक और स्थल की पहचान की गई, लेकिन वह क्षेत्र पहले ही पौधरोपण की प्रक्रिया में शामिल हो चुका था, इसलिए वह भी अनुपयुक्त घोषित कर दिया गया। अब प्रशासन ने हाथीडंगर क्षेत्र के प्लॉट नंबर 50 को चिन्हित कर ग्रामीणों को वहां ले जाकर भूमि का निरीक्षण करवाया और इस बार सभी परिवारों ने एकमत होकर इसे उपयुक्त बताया है। चुकुम गांव के लोगों को यह स्थान रहने योग्य और सुरक्षित प्रतीत हुआ, जिसके चलते इस बार विस्थापन की उम्मीदें अधिक प्रबल हो गई हैं।

प्रशासन की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया है कि अब सभी ग्रामीणों से शपथ पत्र लिए जा रहे हैं और जल्द ही एक विस्तृत प्रस्ताव तैयार किया जाएगा। इस प्रस्ताव में केवल भूमि ही नहीं, बल्कि सड़क, पेयजल, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सभी बुनियादी सुविधाओं को भी सम्मिलित किया जाएगा। उपजिलाधिकारी प्रमोद कुमार ने जानकारी देते हुए बताया कि राज्य सरकार को भेजे जाने वाले प्रस्ताव में सभी आवश्यक पहलुओं का उल्लेख किया जाएगा और अनुमति मिलते ही विस्थापन की प्रक्रिया को अंजाम देने में देरी नहीं की जाएगी। ग्रामीणों को पुनर्वास के साथ सम्मानजनक जीवन देने की दिशा में यह एक निर्णायक कदम माना जा रहा है।

ग्रामीणों की प्रतिक्रियाएं भी इस बार काफी स्पष्ट और संतुष्टिपूर्ण रही हैं। ग्रामीण मोहन सिंह ने बताया कि वह साल 1993 से विस्थापन की मांग कर रहे हैं, लेकिन हर बार केवल आश्वासन ही मिले। कभी जसपुर भेजा गया, कभी केलाखेड़ा, फिर आमपोखरा, लेकिन कोई जगह उनके अनुरूप नहीं रही। अब जो भूमि हाथीडंगर क्षेत्र में दिखाई गई है, वह उन्हें पूरी तरह से संतोषजनक लगी और सभी ग्रामीण वहां बसने को राजी हैं। महिला लीला रावत ने कहा कि इतने वर्षों से हम आपदा की छाया में जीवन बिता रहे हैं, हर बार सरकारों ने सिर्फ वादा किया, लेकिन पहली बार ऐसा लग रहा है कि हमारी पुकार सुनी गई है। ग्रामीण सौरभ कुमार ने भी यही भावना व्यक्त की कि प्रशासन द्वारा दिखाई गई भूमि देखकर पूरे गांव के लोगों ने राहत की सांस ली है और अगर यही जमीन उन्हें मिलती है तो वे निश्चित रूप से वहां बसना चाहेंगे।

चुकुम गांव की स्थिति इतनी विकट रही है कि वहां रहना जीवन को दांव पर लगाने जैसा है। न सड़क है, न स्वास्थ्य केंद्र, और न ही मूलभूत सुविधाओं की कोई व्यवस्था। बरसात के मौसम में गांव का बाकी दुनिया से संपर्क पूरी तरह टूट जाता है, जिससे महीनों तक लोग कैद होकर रह जाते हैं। स्कूली बच्चों को शिक्षा के लिए नदी पार करनी पड़ती है, जो हर साल जानलेवा साबित होता है। ऐसी हालत में वर्षों से सुरक्षित और सुविधायुक्त जीवन के लिए संघर्ष कर रहे ग्रामीणों को अब पहली बार राहत की वास्तविक उम्मीद दिखाई दी है। अगर शासन की ओर से इस बार स्वीकृति मिलती है, तो यह गांव उत्तराखंड के उन दुर्लभ उदाहरणों में शामिल हो जाएगा, जहां प्रशासनिक इच्छाशक्ति ने तीन दशक पुराने एक संकट का स्थायी समाधान निकालने में सफलता प्राप्त की है।

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