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मनसा देवी हादसे ने खोली व्यवस्थाओं की पोल भक्तों की आस्था पर पड़ा भारी बोझ

कूड़े के ढेर, लापरवाही और बदइंतजामी ने मिलकर भक्ति स्थल को बना दिया खतरे का केंद्र, हादसे ने खोले कई प्रशासनिक राज

हरिद्वार। मनसा देवी मंदिर यात्रा हाल ही में एक भयानक हादसे की गवाह बनी, जिसने धार्मिक आस्था और प्रशासनिक जिम्मेदारियों के बीच संतुलन पर सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। 27 जुलाई को मंदिर की ओर जा रहे श्रद्धालुओं के मार्ग पर भगदड़ मच गई, जिसमें अब तक 8 लोगों की जान जा चुकी है और 30 लोग अब भी अस्पतालों में इलाजरत हैं। यह घटना केवल एक भीषण दुर्घटना नहीं, बल्कि उससे कहीं अधिक गहरी समस्याओं की ओर इशारा करती हैकृजिनमें अव्यवस्थित सफाई व्यवस्था, कूड़े का अंबार और जिम्मेदार संस्थाओं की निष्क्रियता शामिल है। हजारों श्रद्धालुओं के प्रति दिन दर्शन हेतु आने वाले इस पवित्र स्थल पर, हादसे के बाद जब मीडिया की नजरें मुड़ीं, तो पहाड़ की तलहटी से लेकर ऊंचाई तक फैले कचरे के ढेरों की तस्वीरें कैमरे में कैद हुईं। श्रद्धा और भक्ति के केंद्र माने जाने वाले इस क्षेत्र में कूड़े का ऐसा दृश्य बेहद शर्मनाक और चिंता जनक है।

स्थानीय निवासियों की मानें तो मां मनसा देवी मंदिर के मार्ग पर फैला यह कचरा कोई नई समस्या नहीं है, बल्कि यह गंदगी 11 जुलाई से पहले से ही लगातार जमा हो रही है, जब कांवड़ मेला आरंभ भी नहीं हुआ था। कचरे का यह अंबार मंदिर की पवित्रता के साथ-साथ पर्यावरण के लिए भी खतरा बन चुका है। जब इस गंभीर मसले पर मां मनसा देवी मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत रविंद्र पुरी से सवाल किए गए तो उन्होंने साफ किया कि मंदिर परिसर की सफाई की जिम्मेदारी ट्रस्ट की है और वहां नियमित रूप से सफाई कराई जाती है। उनका यह बयान यह स्पष्ट करता है कि मंदिर के बाहरी इलाके, जहां यह कूड़ा फैला है, उनकी देखरेख में नहीं आता। लेकिन बात केवल जिम्मेदारी बांटने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, क्योंकि यह पूरा इलाका राजाजी नेशनल पार्क के अंतर्गत आता है, जहां प्रशासन और वन विभाग दोनों की जवाबदेही बनती है कि इस पवित्र स्थल की गरिमा को बनाए रखा जाए।

राजाजी नेशनल पार्क के रेंजर बी तिवारी ने इस विषय में जानकारी देते हुए बताया कि वन विभाग समय-समय पर सफाई अभियानों को अंजाम देता है। उनका कहना था कि सीमित संसाधनों और कम स्टाफ के बावजूद विभाग प्रयासरत रहता है कि पहाड़ की सफाई होती रहे, जिसमें नगर निगम का सहयोग भी लिया जाता है। हालांकि, जो तस्वीरें और स्थानीय लोगों की प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं, वे इस कथन के उलट एक गंभीर सच्चाई की ओर संकेत करती हैं। लोगों ने बताया कि यह कूड़ा श्रद्धालुओं के मुकाबले उन फलों की दुकानों से ज्यादा उत्पन्न हो रहा है जो मनसा देवी मंदिर के रास्ते पर लगी हुई हैं। ये दुकानदार अपना बचा हुआ सामान और डिस्पोजेबल कचरा सीधे पहाड़ पर फेंक देते हैं। प्लास्टिक की थैलियां, प्रसाद के पत्ते, बोतलें और अन्य गंदगी का सैलाब हर ओर पसरा हुआ है, जो साफ-सफाई की मौजूदा व्यवस्था पर सीधा तमाचा है।

जहां तक पर्यावरणीय खतरे की बात है, मनसा देवी मंदिर जिस बिल्व पर्वत पर स्थित है, वहां हाथी, गुलदार, सांभर जैसे कई जंगली जीवों का बसेरा है। कई बार इन जानवरों को कूड़े के ढेरों के आसपास मंडराते हुए भी देखा गया है, जो न केवल उनके लिए खतरनाक है बल्कि मानव-वन्यजीव संघर्ष की स्थिति को भी जन्म दे सकता है। वन विभाग के कर्मचारी और मंदिर ट्रस्ट के सदस्य इस इलाके में नियमित रूप से मौजूद रहते हैं, लेकिन फिर भी वर्षों से जमी गंदगी हटाने के लिए कोई स्थायी समाधान अब तक नहीं निकाला गया है। न पैदल मार्ग की सीढ़ियों पर सफाई की समुचित व्यवस्था है, न दुकानों के पीछे फेंके जा रहे कूड़े की निगरानी। ऊपरी तौर पर भले ही साफ-सफाई दिखाई दे, पर जब नीचे की परतों में सड़ चुका कूड़ा देखा जाए तो साफ हो जाता है कि यहां केवल दिखावे की सफाई की जा रही है।

27 जुलाई को हुए हादसे ने मानो इस पूरे अनदेखे गंदगी के ढेर पर से पर्दा हटा दिया। भगदड़ की वजह प्रशासनिक बयानों के अनुसार करंट फैलने की अफवाह बताई जा रही है, लेकिन इससे ज्यादा महत्वपूर्ण है यह समझना कि अगर रास्ता सुव्यवस्थित होता, भीड़ नियंत्रण की पुख्ता योजना होती और सफाई के साथ रास्तों की स्थिति दुरुस्त होती, तो शायद यह दर्दनाक मंजर देखने को न मिलता। हजारों की भीड़ जब जान बचाने को एक-दूसरे पर गिरने लगी, तो इस धार्मिक स्थल का यह रूप किसी भयावह त्रासदी से कम नहीं था। बच्चे, महिलाएं, वृद्धकृकोई भी इस भगदड़ से अछूता नहीं रहा। घटना की गंभीरता को देखते हुए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने तत्काल मजिस्ट्रियल जांच के आदेश दिए हैं, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भी इस त्रासदी पर दुख व्यक्त किया है।

अब समय आ गया है कि श्रद्धा के इस केन्द्र की गरिमा को केवल भक्ति से नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और प्रशासनिक संवेदनशीलता से भी संरक्षित किया जाए। यह केवल हरिद्वार या उत्तराखंड की नहीं, पूरे देश की प्रतिष्ठा से जुड़ा मामला है। मनसा देवी जैसे स्थलों पर सफाई व्यवस्था से लेकर आपदा प्रबंधन तक, हर पहलू पर गंभीरता से काम करने की आवश्यकता है। वरना श्रद्धा की राह में ऐसे हादसे आने वाले समय में आस्था को डगमगाने में देर नहीं करेंगे।

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