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कॉर्बेट घोटाले पर ‘सहर प्रजातंत्र’ की खबर के बाद मुख्यमंत्री ने दी सीबीआई को अभियोजन की अनुमति

‘सहर प्रजातंत्र’ की प्रभावशाली रिपोर्टिंग के बाद हरकत में आई सरकार, भ्रष्टाचार में लिप्त अफसरों पर अब शुरू होगी सीबीआई की कठोर कार्रवाई।

रामनगर। कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के पाखरो क्षेत्र में अवैध निर्माण और बड़े पैमाने पर वृक्षों की कटाई को लेकर जिस खबर को ‘सहर प्रजातंत्र’ ने बड़े जोरशोर से प्रकाशित किया था, उसने अब पूरे राज्य में भूचाल ला दिया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने खबर प्रकाशित होने के चंद घंटों बाद ही मामले की गंभीरता को समझते हुए तुरंत एक्शन लिया और सीबीआई को अभियोजन की अनुमति दे दी। वर्षों से दबे इस विवाद पर जैसे ही प्रकाश डाला गया, शासन स्तर पर हलचल शुरू हो गई। यह वही मामला है जो राज्य की पूर्ववर्ती सरकार के दौरान शुरू हुआ था और लंबे समय से अटका हुआ था। इस अनुमति के जरिए न केवल न्यायिक प्रक्रिया को गति मिली है, बल्कि इससे यह भी स्पष्ट हो गया है कि सरकार अब इस मामले को दबाने के मूड में नहीं है, चाहे इसमें कितनी भी ऊंची पहुंच वाले अधिकारी क्यों न हों।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा लिए गए इस निर्णय ने न केवल वन संरक्षण कानूनों की अनदेखी के गंभीर परिणामों को उजागर किया है, बल्कि इससे यह भी साफ हो गया है कि सरकार अब भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति पर आगे बढ़ रही है। पाखरो टाइगर सफारी निर्माण को लेकर जिन अनियमितताओं की बात वर्षों से की जा रही थी, उन पर अब सीबीआई को सीधा अभियोजन चलाने की इजाजत मिल चुकी है। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि जिन दो पूर्व अधिकारियों अखिलेश तिवारी और किशन चंद पर गंभीर आरोप लगे हैं, उनके विरुद्ध अब कानूनी कार्रवाई की राह खुल चुकी है। ये वही अधिकारी हैं जिनके खिलाफ जांच रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से दोष दर्शाए गए थे और अब उन बिंदुओं को आधार बनाकर उन्हें न्याय के कटघरे में लाया जा रहा है।

इस मामले की जड़ें वर्ष 2019 तक जाती हैं, जब उस समय की सरकार ने कॉर्बेट नेशनल पार्क के पाखरो क्षेत्र में टाइगर सफारी के निर्माण की योजना बनाई थी। इसके लिए केंद्र सरकार से पर्यावरणीय अनुमति भी मांगी गई थी। सरकार की ओर से दावा किया गया था कि सफारी निर्माण हेतु महज 163 पेड़ों को हटाया जाएगा, लेकिन बाद की जांच में चौंकाने वाला खुलासा हुआ। हकीकत में 163 नहीं, बल्कि 6,903 पेड़ काट डाले गए थे, जो कि वन्यजीव संरक्षण कानूनों और पर्यावरणीय संतुलन के साथ सीधा खिलवाड़ था। यह आंकड़ा न केवल भयावह है, बल्कि यह स्पष्ट करता है कि किस हद तक तथ्यों को छुपाकर इस निर्माण को आगे बढ़ाया गया। इससे यह सवाल भी उठता है कि आखिरकार किसकी शह पर इतनी बड़ी लापरवाही की गई और कौन-कौन इसके पीछे शामिल था।

सीबीआई इस मामले में अप्रैल माह से अभियोजन की अनुमति के लिए सरकार के जवाब का इंतजार कर रही थी। नियमों के अनुसार 120 दिनों के भीतर शासन को जवाब देना होता है, अन्यथा माना जाता है कि अनुमति स्वतरू दे दी गई है। इस अवधि में शासन पर दबाव भी बना, लेकिन कार्रवाई टलती रही। मगर जैसे ही ‘सहर प्रजातंत्र’ ने इस मामले को विस्तारपूर्वक प्रकाशित किया, पूरा शासन-प्रशासन जाग उठा। खबर के कुछ ही घंटों में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने स्वयं इसका संज्ञान लेकर तत्काल सीबीआई को हरी झंडी दे दी। इससे पहले तक यह मामला ठंडे बस्ते में था और संबंधित अधिकारी भी कार्रवाई से बेखौफ नजर आ रहे थे, लेकिन अब स्थिति पूरी तरह से बदल गई है।

साफ है कि अब उत्तराखंड में वन क्षेत्र से जुड़े अपराधों को लेकर लापरवाही का दौर समाप्त होता नजर आ रहा है। मुख्यमंत्री के इस निर्णय से स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि चाहे मामला पूर्व सरकार के कार्यकाल का ही क्यों न हो, वर्तमान सरकार किसी भी स्तर पर ढिलाई नहीं बरतने जा रही है। ‘सहर प्रजातंत्र’ की रिपोर्टिंग ने जिस तरह इस विषय को मुखर किया, उसने पत्रकारिता की शक्ति को फिर से रेखांकित किया है। वही खबर जो वर्षों से नजरअंदाज हो रही थी, उसने आज शासन को कार्रवाई के लिए बाध्य कर दिया। यह न केवल मीडिया की जीत है, बल्कि उन जंगलों, पेड़ों और वन्यजीवों की भी विजय है जिनकी आवाज कभी सुनी नहीं गई थी।

आखिर में यह प्रकरण एक बड़ी चेतावनी भी बनकर सामने आया है कि पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी और सरकारी तंत्र की ढिलाई जब मिल जाती है, तो उसका खामियाजा आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ता है। अब जबकि इस मामले में कानूनी प्रक्रिया तेज हो चुकी है, उम्मीद की जा सकती है कि दोषी अधिकारी सिर्फ जांच के घेरे में नहीं रहेंगे, बल्कि उन्हें उनके कृत्यों की पूरी कीमत भी चुकानी होगी। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की ओर से लिए गए इस फैसले ने न केवल पारदर्शिता की नई मिसाल पेश की है, बल्कि शासन में जवाबदेही की एक मजबूत दीवार भी खड़ी की है।

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