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हरिद्वार जमीन घोटाले में बड़ा एक्शन तय, चार्जशीट से कांपे अफसरों के होश

54 करोड़ के भूमि घोटाले में दो IAS और एक PCS समेत 11 अफसर फंसे, चार्जशीट देने को तैयार सरकार ने कसी कमर

हरिद्वार(सुरेन्द्र कुमार)। नगर निगम से जुड़े करोड़ों रुपये के चर्चित भूमि घोटाले में फंसे अफसरों पर अब शिकंजा कसता जा रहा है। इस बहुचर्चित प्रकरण में अब अधिकारियों और कर्मचारियों पर आरोप पत्र जारी होने की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है। ज़मीन की अवैध खरीद-फरोख्त से जुड़े इस मामले में पहले ही जांच पूरी हो चुकी है और अब सरकार की ओर से संबंधित विभागों द्वारा चार्जशीट देने की प्रक्रिया अंतिम चरण में पहुंच गई है। जहां तीन वरिष्ठ अधिकारियों को कार्मिक विभाग द्वारा औपचारिक आरोप पत्र सौंपा जाना है, वहीं अन्य आठ कर्मचारियों को शहरी विकास विभाग की ओर से चार्जशीट दिए जाने की तैयारी लगभग पूरी हो चुकी है। सूत्रों के मुताबिक, इस मामले से जुड़ी सभी प्रशासनिक प्रक्रियाएं पूरी की जा चुकी हैं और बहुत जल्द संबंधित अधिकारियों के नाम चार्जशीट थमा दी जाएगी।

शासन स्तर से इस पूरे प्रकरण को बेहद गंभीरता से देखा जा रहा है। हरिद्वार के इस भूमि घोटाले की परतें खुलते ही राज्य शासन ने तेजी से कार्रवाई शुरू की थी और अब यह मामला एक अहम मोड़ पर पहुंच चुका है। पूर्व में जिन अधिकारियों पर आरोप लगे थे, उनकी भूमिका की गहराई से जांच की जा चुकी है और अब उन पर विधिवत आरोप तय कर दिए जाएंगे। कार्मिक विभाग और शहरी विकास विभाग ने अलग-अलग स्तर पर आवश्यक औपचारिकताएं पूरी कर ली हैं, ताकि किसी भी स्तर पर जांच में बाधा न उत्पन्न हो। कार्मिक विभाग उन अधिकारियों पर सीधा आरोप पत्र सौंपेगा, जो उनके अधिकार क्षेत्र में आते हैं, जबकि शहरी विकास विभाग अपने अधीनस्थ कार्मिकों को चार्जशीट देगा।

इस घोटाले में जिन अफसरों के नाम प्रमुख रूप से सामने आए हैं, उनमें दो आईएएस और एक पीसीएस अधिकारी शामिल हैं। जिन अधिकारियों पर चार्जशीट देने की तैयारी हो रही है, वे हैं दृ कर्मेंद्र सिंह, वरुण चौधरी, और अजयवीर सिंह। इन तीनों अधिकारियों को कार्मिक विभाग से आरोप पत्र सौंपा जाएगा, और इसके लिए मुख्यमंत्री कार्यालय से अंतिम स्वीकृति की प्रतीक्षा की जा रही है। आरोप पत्र मिलने के बाद इन अधिकारियों को तय बिंदुओं के आधार पर अपना पक्ष प्रस्तुत करना होगा। उनके जवाबों की समीक्षा के बाद सरकार द्वारा जांच अधिकारी नामित किया जाएगा, जो पूरे मामले की गहराई से पुनः जांच करेगा।

जांच अधिकारी के चयन में भी विशेष सावधानी बरती जा रही है। चूंकि इस मामले में जिलाधिकारी स्तर के अधिकारी पर आरोप तय किए जा रहे हैं, इसलिए जांच अधिकारी उससे दो ग्रेड ऊपर का अधिकारी ही बनाया जाएगा, जो संभवतः प्रमुख सचिव स्तर का हो सकता है। हालांकि सरकार किसी वरिष्ठ सचिव को भी यह जिम्मेदारी सौंप सकती है। यह सब तय करेगा कि मामले में आगे किस स्तर पर कार्रवाई आगे बढ़ेगी और दोषी पाए गए अफसरों के विरुद्ध कौन-कौन सी अनुशासनात्मक कार्रवाइयां होंगी।

हरिद्वार भूमि घोटाले की जड़ में जिस भूमि की खरीद है, वह करीब 54 करोड़ रुपये की बताई जा रही है। न तो इस खरीद के लिए शासन की कोई स्पष्ट स्वीकृति ली गई थी और न ही उस प्रक्रिया का अनुपालन किया गया, जो जमीन की खरीद से पहले नियमानुसार जरूरी होता है। कोई अधिग्रहण समिति न बनाई गई, न कोई कानूनी प्रक्रिया अपनाई गई। ऐसे में अब जिन अफसरों को चार्जशीट दी जा रही है, उनके लिए इस घोटाले पर संतोषजनक उत्तर देना आसान नहीं होगा। इसीलिए यह मामला शासन के उच्चतम स्तर तक गंभीरता से विचाराधीन है।

प्रमुख सचिव आनंद वर्धन ने इस विषय में जानकारी देते हुए स्पष्ट किया है कि चार्जशीट से संबंधित फाइल को विचारार्थ उच्चस्तर पर भेजा जा चुका है और जल्द ही इस पर अंतिम निर्णय ले लिया जाएगा। इससे यह स्पष्ट है कि शासन अब इस प्रकरण को लटकाने के बजाय जल्द से जल्द निर्णय लेकर दोषियों पर कड़ी कार्रवाई करना चाहता है, ताकि भविष्य में ऐसी अनियमितताएं रोकी जा सकें।

गौरतलब है कि तीन जून को इस घोटाले में शामिल सात प्रमुख अफसरों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया था। निलंबित किए गए अधिकारियों में शामिल हैंरू कर्मेंद्र सिंह (तत्कालीन जिलाधिकारी व नगर निगम प्रशासक), वरुण चौधरी (नगर आयुक्त), अजयवीर सिंह (उप जिलाधिकारी), निकिता बिष्ट (वरिष्ठ वित्त अधिकारी), विक्की (वरिष्ठ वैयक्तिक सहायक), राजेश कुमार (रजिस्ट्रार कानूनगो), और कमलदास (मुख्य प्रशासनिक अधिकारी)।

वहीं इससे पूर्व भी कई अधिकारियों और कर्मचारियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा चुकी है। इनमें शामिल हैंरू रविंद्र कुमार दयाल (प्रभारी सहायक नगर आयुक्त, सेवा समाप्त), आनंद सिंह मिश्रवाण (प्रभारी अधिशासी अभियंता, निलंबित), लक्ष्मीकांत भट्ट (कर एवं राजस्व अधीक्षक, निलंबित), दिनेश चंद्र कांडपाल (अवर अभियंता, निलंबित) और वेदपाल (संपत्ति लिपिक, सेवा विस्तार समाप्त)। इस पूरे मामले ने एक बार फिर यह प्रमाणित किया है कि उच्चस्तरीय पदों पर बैठे अधिकारी भी यदि भ्रष्टाचार में लिप्त पाए जाते हैं, तो अब शासन उन्हें बख्शने के मूड में नहीं है। हरिद्वार भूमि घोटाला उत्तराखंड प्रशासनिक इतिहास में एक बड़े घोटाले के रूप में दर्ज होता जा रहा है, जिसमें अब तक की कार्रवाई दर्शाती है कि सरकार ने इसे पूरी गंभीरता से लिया है और दोषियों को सजा दिलाने के लिए कानूनी प्रक्रिया को तेजी से आगे बढ़ाया जा रहा है।

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