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मुख्यमंत्री की सुरक्षा में चूक, कॉर्बेट पार्क में जिप्सी फिटनेस घोटाला उजागर

बिना फिटनेस के जिप्सी से सीएम का दौरा, जांच में विभागीय लापरवाही उजागर, वन मंत्री ने दिए कड़ी कार्रवाई के निर्देश

रामनगर। स्थित कॉर्बेट नेशनल पार्क उस समय सुर्खियों में आ गया, जब छह जुलाई को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के भ्रमण के दौरान सुरक्षा में भारी चूक उजागर हुई। मुख्यमंत्री जिस जिप्सी वाहन से ढेला, झिरना और फाटो पर्यटन जोन का निरीक्षण कर रहे थे, वह वाहन वर्ष 2020 के बाद से अनफिट स्थिति में चल रहा था। वाहन की फिटनेस नवीनीकरण किए बिना उसका इस्तेमाल किया जाना, वह भी मुख्यमंत्री स्तर की सुरक्षा के दौरान, पूरे प्रशासनिक ढांचे पर सवालिया निशान लगाता है। यह मामला सामने आने के बाद वन विभाग और कॉर्बेट प्रशासन में हड़कंप मच गया और पूरे मामले ने उच्च स्तर पर हलचल मचा दी।

उत्तराखंड के वन मंत्री सुबोध उनियाल ने मामले की गंभीरता को देखते हुए त्वरित जांच के निर्देश दिए। इसके बाद कॉर्बेट पार्क के निदेशक डॉ. साकेत बडोला ने इस जांच की ज़िम्मेदारी उपनिदेशक राहुल मिश्रा को सौंपी। विस्तृत जांच में यह स्पष्ट हुआ कि वाहन संबंधित दस्तावेजों की ज़िम्मेदारी जिप्सी चालक मोहम्मद उमर, स्टोर कीपर इरशाद और पंकज की थी। तीनों की मिली-जुली लापरवाही के कारण यह वाहन वर्षों से बिना फिटनेस नवीनीकरण के चल रहा था। यह तथ्य सुरक्षा प्रोटोकॉल की पूरी व्यवस्था पर एक करारा तमाचा है, विशेषकर जब इसमें राज्य के मुख्यमंत्री की यात्रा भी सम्मिलित हो।

इस मामले में आरटीओ विभाग को भी सक्रिय किया गया और क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय (एआरटीओ) द्वारा उक्त वाहन की तकनीकी जांच करवाई गई। यद्यपि तकनीकी रूप से वाहन को फिट घोषित किया गया, लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि वर्षों तक इसके कागज़ातों की अनदेखी की गई थी। यही नहीं, मुख्यमंत्री जैसे संवेदनशील पद पर आसीन व्यक्ति की सुरक्षा में तैनात वाहन की स्थिति जब इस प्रकार की हो, तो अन्य सामान्य प्रयोजन वाले विभागीय वाहनों की दशा की कल्पना भी प्रशासन को झकझोरने वाली होनी चाहिए। डॉ. साकेत बडोला ने भी माना कि इस तरह की लापरवाही बेहद गंभीर है और इससे विभाग की कार्यप्रणाली पर सीधा असर पड़ता है।

जांच के आधार पर दोषियों पर कार्रवाई का चक्र भी तेज़ी से चलाया गया है। वाहन चालक मोहम्मद उमर के खिलाफ विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू कर दी गई है। साथ ही, जिन स्टोर कीपरों इरशाद और पंकज के जिम्मे दस्तावेजों की निगरानी थी, उनके खिलाफ शासन को विस्तृत रिपोर्ट भेज दी गई है। शासन स्तर पर अब इनके खिलाफ आवश्यक दंडात्मक निर्णय लिया जाएगा। यह मामला सिर्फ एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि यह दर्शाता है कि विभागीय तंत्र में किस स्तर पर लापरवाही की जगह बन चुकी है।

इसके साथ ही, यह घटना वन विभाग को अपने समूचे परिवहन तंत्र की समीक्षा करने के लिए मजबूर कर चुकी है। अब कॉर्बेट पार्क के अंतर्गत उपयोग में लिए जा रहे सभी विभागीय वाहनों की दोबारा तकनीकी जांच करवाई जा रही है। इस नई प्रक्रिया का उद्देश्य यह है कि भविष्य में इस तरह की गलती की पुनरावृत्ति न हो और हर स्तर पर जिम्मेदार अधिकारियों को समय पर चेतावनी मिलती रहे। ऐसे कदम निश्चित रूप से एक सकारात्मक संकेत हैं कि विभाग इस चूक को केवल मामूली गलती मानकर छोड़ने के मूड में नहीं है।

इस घटनाक्रम ने शासन-प्रशासन को यह सोचने पर विवश कर दिया है कि क्या केवल तकनीकी फिटनेस ही पर्याप्त है, या फिर दस्तावेजों की वैधता और उनकी समयबद्धता को लेकर अधिकारियों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए। मुख्यमंत्री की मौजूदगी में इस तरह की सुरक्षा लापरवाही न केवल अधिकारियों की संवेदनहीनता दर्शाती है, बल्कि इससे आमजन के मन में भी शासन की कार्यशैली को लेकर आशंकाएं उत्पन्न होती हैं। यदि उच्च पदस्थ लोगों की सुरक्षा में ही ऐसी चूक संभव है, तो बाकी क्षेत्रों में किस स्तर की निगरानी हो रही होगी, इसका अंदाज़ा लगाना कठिन नहीं।

अब यह स्पष्ट हो चुका है कि उत्तराखंड का वन विभाग और विशेष रूप से कॉर्बेट पार्क प्रशासन इस मामले को एक चेतावनी के रूप में लेकर गंभीर समीक्षा की दिशा में कदम बढ़ा चुका है। यह घटना केवल एक वाहन की फिटनेस का मुद्दा नहीं रही, बल्कि यह समूची प्रशासनिक जिम्मेदारी, ईमानदारी और सतर्कता का परीक्षण बन चुकी है। आम जनता और पर्यावरण संरक्षण के प्रति संवेदनशील विभागों को इस घटना से सबक लेते हुए अपने ढांचागत और कार्यशैली संबंधी पहलुओं पर गहराई से पुनर्विचार करना ही होगा। यही नहीं, अब जनता को भी यह देखना होगा कि ऐसे मामलों में केवल लिपिकीय कार्रवाई न हो, बल्कि संरचनात्मक सुधार होकृताकि ष्सरकारी व्यवस्थाष् केवल फाइलों तक सीमित न रह जाए, बल्कि ज़मीन पर भी उसे न्यायोचित और उत्तरदायी बनाकर प्रस्तुत किया जा सके।

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