चन्द्रबदनी। श्रीदेव सुमन उत्तराखण्ड विश्वविद्यालय के परिसर चन्द्रबदनी (नैखरी) में भारतीय ज्ञान परंपरा, भारतीय भाषाओं और देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को लेकर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। परिसर निदेशक डॉ महंथ मौर्य की अध्यक्षता में आयोजित इस महत्वपूर्ण शैक्षणिक कार्यक्रम का केंद्रबिंदु शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार के अखिल भारतीय शिक्षा समागम-2026 के अंतर्गत निर्धारित विषय “भारतीय ज्ञान परंपरा (भारतीय भाषाओं के परिप्रेक्ष्य में)” रहा। संगोष्ठी का उद्देश्य केवल भारतीय ज्ञान परंपरा की ऐतिहासिक महत्ता पर चर्चा करना नहीं था, बल्कि वर्तमान समय में इसकी उपयोगिता, भारतीय भाषाओं के माध्यम से ज्ञान के संरक्षण तथा नई पीढ़ी तक इस विरासत को प्रभावी ढंग से पहुंचाने की संभावनाओं पर गंभीर विमर्श करना भी रहा। आयोजन के दौरान शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने विषय के विभिन्न पक्षों पर अपने विचार और शोध प्रस्तुत किए। वक्ताओं ने भारतीय भाषाओं को ज्ञान, संस्कृति, परंपरा और जीवन-दृष्टि से जोड़ते हुए कहा कि आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में भारतीय ज्ञान परंपरा को उचित स्थान देकर शिक्षा को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से और अधिक मजबूत किया जा सकता है।
कार्यक्रम की शुरुआत पारंपरिक एवं गरिमामय वातावरण में दीप प्रज्वलन और सरस्वती वंदना के साथ हुई। इसके बाद कार्यक्रम संयोजक डॉ. मूलचन्द्र शुक्ल, असिस्टेंट प्रोफेसर, संस्कृत विभाग ने संगोष्ठी की संपूर्ण रूपरेखा प्रतिभागियों के समक्ष रखते हुए आयोजन के विषय की प्रासंगिकता पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा को वर्तमान शैक्षणिक परिदृश्य में समझने की आवश्यकता पर ध्यान आकर्षित किया और बताया कि भारतीय भाषाओं में सदियों से ज्ञान-विज्ञान, साहित्य, दर्शन, संस्कृति तथा सामाजिक जीवन से संबंधित व्यापक सामग्री सुरक्षित रही है। परिसर के प्राचार्य ने आयोजन में उपस्थित अतिथियों का स्वागत करते हुए भारतीय ज्ञान परंपरा के महत्व पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में केवल आधुनिक ज्ञान-विधाओं का अध्ययन पर्याप्त नहीं है, बल्कि विद्यार्थियों को अपनी सभ्यता, भाषा और ज्ञान परंपरा से भी परिचित कराना आवश्यक है। उनके विचारों में भारतीय परंपरागत ज्ञान को समकालीन शिक्षा से जोड़ने की आवश्यकता प्रमुख रूप से सामने आई। इस अवसर पर आयोजन से जुड़े शिक्षकों और प्रतिभागियों ने भी संगोष्ठी के उद्देश्य को व्यापक शैक्षणिक विमर्श से जोड़ते हुए सक्रिय सहभागिता की।
संगोष्ठी की पृष्ठभूमि और आयोजन के उद्देश्यों को स्पष्ट करते हुए कार्यक्रम सचिव डॉ. दयाधर दीक्षित, असिस्टेंट प्रोफेसर, रसायन विज्ञान विभाग ने प्रतिभागियों को विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने आयोजन के पीछे की शैक्षणिक सोच और भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़े विभिन्न विषयों पर संवाद स्थापित करने की आवश्यकता को सामने रखा। इसके बाद मुख्य अतिथि प्रोफेसर शिवशंकर मिश्र, कुलपति, पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय, उज्जैन (म.प्र.) ने अपने संबोधन से कार्यक्रम को महत्वपूर्ण वैचारिक दिशा प्रदान की। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा की व्यापकता और आज के दौर में उसकी उपयोगिता पर विस्तार से चर्चा करते हुए भारतीय भाषाओं की भूमिका को विशेष रूप से रेखांकित किया। उनके अनुसार भारतीय भाषाएं महज विचारों को एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुंचाने का साधन नहीं हैं, बल्कि इनमें देश की ज्ञान-संपदा, संस्कृति, परंपराएं और जीवन को देखने की विशिष्ट दृष्टि भी समाहित है। उन्होंने भारतीय भाषाओं को जीवंत बनाए रखने तथा उनके माध्यम से उपलब्ध ज्ञान को नई पीढ़ी तक पहुंचाने को आवश्यक बताया। उनके संबोधन ने संगोष्ठी में उपस्थित प्रतिभागियों को भारतीय भाषाओं और ज्ञान परंपरा के बीच मौजूद गहरे संबंधों पर विचार करने का अवसर दिया।
इसी क्रम में मुख्य वक्ता प्रोफेसर रामबहादुर शुक्ल, विभागाध्यक्ष, संस्कृत विभाग, जम्मू विश्वविद्यालय, जम्मू ने भारतीय ज्ञान परंपरा के विभिन्न आयामों पर विस्तारपूर्वक विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने भारतीय भाषाओं में संरक्षित विशाल ज्ञान-संपदा की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि इस विरासत को केवल पुस्तकों और अभिलेखों तक सीमित रखने के बजाय उसका व्यवस्थित अध्ययन, संरक्षण और नई पीढ़ी तक हस्तांतरण जरूरी है। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक शिक्षा प्रणाली और समकालीन सामाजिक आवश्यकताओं से जोड़ने की जरूरत पर भी बल दिया। उनके विचार में परंपरा और आधुनिकता को एक-दूसरे के विरोध में देखने के बजाय दोनों के बीच सार्थक समन्वय स्थापित किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भारतीय भाषाओं में उपलब्ध ज्ञान-विज्ञान, साहित्य, दर्शन और सांस्कृतिक अनुभवों का अध्ययन वर्तमान पीढ़ी को अपनी बौद्धिक और सांस्कृतिक विरासत को समझने में सहायता कर सकता है। उनके संबोधन ने संगोष्ठी के मूल विषय को व्यापक दृष्टिकोण प्रदान किया और प्रतिभागियों के सामने यह सवाल भी रखा कि आधुनिक शिक्षा के बदलते स्वरूप के बीच भारतीय ज्ञान परंपरा को किस प्रकार प्रभावी तरीके से आगे बढ़ाया जाए।
कार्यक्रम सह-सचिव सुश्री वन्दना, असिस्टेंट प्रोफेसर, राजनीति विज्ञान विभाग ने भी भारतीय ज्ञान परंपरा और भारतीय भाषाओं के संरक्षण को लेकर अपने विचार साझा किए। उन्होंने वर्तमान पीढ़ी के सामने इस विरासत को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी को महत्वपूर्ण बताया और भारतीय भाषाओं के व्यापक प्रचार-प्रसार की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि भाषा किसी भी समाज की सांस्कृतिक पहचान और ज्ञान-स्मृति को संरक्षित रखने का सशक्त माध्यम होती है। यदि भारतीय भाषाओं में मौजूद ज्ञान-संपदा को नई पीढ़ी तक व्यवस्थित रूप से नहीं पहुंचाया गया तो ज्ञान की अनेक महत्वपूर्ण परंपराओं के सामने उपेक्षा का संकट खड़ा हो सकता है। इसी कारण शिक्षा, शोध और सामाजिक जागरूकता के स्तर पर भारतीय भाषाओं के प्रति सकारात्मक वातावरण तैयार करना आवश्यक है। संगोष्ठी में इस बात पर भी विमर्श हुआ कि भारतीय ज्ञान परंपरा को केवल अतीत की उपलब्धि के रूप में देखने के बजाय वर्तमान और भविष्य की जरूरतों के साथ जोड़कर समझा जाए। वक्ताओं ने भारतीय भाषाओं में उपलब्ध विविध ज्ञान-विधाओं के अध्ययन को शिक्षा के व्यापक उद्देश्य से जोड़ते हुए विद्यार्थियों और शोधार्थियों को इस दिशा में नए शोध और अध्ययन के लिए प्रेरित किया।
संगोष्ठी का तकनीकी पक्ष भी विषय की व्यापकता को सामने लाने वाला रहा। विश्वविद्यालय एवं परिसर के शिक्षकगण, शोधार्थी तथा विद्यार्थी बड़ी संख्या में इसमें उपस्थित रहे और उन्होंने शोध-पत्र प्रस्तुतियों तथा विषयगत चर्चा में सक्रिय भागीदारी की। तकनीकी सत्र में भारतीय भाषाओं में निहित ज्ञान-विज्ञान, साहित्य, संस्कृति, लोक परंपराओं, पारंपरिक शिक्षा पद्धतियों और भारतीय ज्ञान परंपरा के समकालीन संदर्भ जैसे अनेक विषयों पर शोधपरक शोधपत्र प्रस्तुत किए गए। इन प्रस्तुतियों के माध्यम से प्रतिभागियों ने यह दिखाने का प्रयास किया कि भारतीय ज्ञान परंपरा का दायरा केवल धार्मिक या सांस्कृतिक विषयों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें ज्ञान की अनेक शाखाओं और जीवन के विविध क्षेत्रों से जुड़े अनुभव शामिल हैं। शोधार्थियों और विद्यार्थियों की प्रस्तुतियों ने संगोष्ठी को केवल वक्ताओं के संबोधन तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि इसे सक्रिय अकादमिक संवाद का मंच बनाया। विभिन्न विषयों पर हुए विमर्श में प्रतिभागियों ने भारतीय भाषाओं के माध्यम से संरक्षित ज्ञान की उपयोगिता, उसके दस्तावेजीकरण, अध्ययन और वर्तमान संदर्भों में पुनर्पाठ की संभावनाओं पर विचार रखा। इससे आयोजन में शोध आधारित दृष्टिकोण और अधिक मजबूत हुआ।
समापन सत्र में डॉ. गुरु प्रसाद थपलियाल, असिस्टेंट प्रोफेसर, भूगोल विभाग ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। उन्होंने आयोजन को सफल बनाने में सहयोग देने वाले सभी अतिथियों, वक्ताओं, शोध-पत्र वाचकों, आयोजकों, शिक्षकों और प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने संगोष्ठी के दौरान सामने आए विचारों और शोध प्रस्तुतियों को भारतीय ज्ञान परंपरा तथा भारतीय भाषाओं के क्षेत्र में आगे होने वाले कार्यों के लिए उपयोगी बताया। पूरे आयोजन के दौरान परिसर में भारतीय ज्ञान, भाषा, संस्कृति और शिक्षा को लेकर गंभीर एवं सार्थक वातावरण दिखाई दिया। कार्यक्रम में शामिल प्रतिभागियों के बीच यह समझ मजबूत हुई कि भारतीय ज्ञान परंपरा को सुरक्षित रखने के लिए केवल संरक्षण की बात पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे अध्ययन, शोध, शिक्षा और सामाजिक संवाद का हिस्सा बनाना भी जरूरी है। चन्द्रबदनी परिसर में आयोजित इस राष्ट्रीय संगोष्ठी ने इसी दिशा में एक ऐसा मंच उपलब्ध कराया, जहां देश के अलग-अलग शैक्षणिक दृष्टिकोणों को भारतीय भाषाओं और ज्ञान परंपरा के संदर्भ में एक साथ रखा गया। इससे विद्यार्थियों और शोधार्थियों को विषय की गहराई समझने तथा नए शोध क्षेत्रों की संभावनाओं पर विचार करने का अवसर भी मिला।
आयोजन की व्यापकता को देखते हुए यह एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी भारतीय ज्ञान परंपरा और भारतीय भाषाओं के प्रति जागरूकता बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल बनकर सामने आई। कार्यक्रम में हुई चर्चाओं ने यह संदेश दिया कि भारत की पारंपरिक ज्ञान-संपदा को आधुनिक शिक्षा के साथ जोड़ना समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। भारतीय भाषाओं में उपलब्ध साहित्य, विज्ञान, लोकज्ञान, सांस्कृतिक अनुभव, शिक्षा पद्धतियां और सामाजिक जीवन से जुड़े विविध आयाम आज भी शोध और अध्ययन के लिए व्यापक संभावनाएं रखते हैं। ऐसे आयोजनों के माध्यम से इन विषयों पर अकादमिक संवाद को बढ़ावा मिलने के साथ युवा पीढ़ी में अपनी भाषाई और सांस्कृतिक विरासत के प्रति रुचि भी विकसित की जा सकती है। परिसर निदेशक डॉ महंथ मौर्य की अध्यक्षता में आयोजित इस कार्यक्रम ने शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों को एक साझा मंच पर विचार रखने का अवसर दिया। शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार के अखिल भारतीय शिक्षा समागम-2026 के अंतर्गत आयोजित यह संगोष्ठी भारतीय ज्ञान परंपरा को समकालीन शैक्षिक संदर्भों से जोड़ने की दिशा में सार्थक कदम के रूप में सामने आई। चन्द्रबदनी परिसर में हुए इस वैचारिक मंथन से भारतीय भाषाओं और ज्ञान परंपरा के संरक्षण, अध्ययन तथा व्यापक प्रचार-प्रसार को नई गति मिलने की उम्मीद जगी है।





