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भाजपा की नई टीम में निशंक खाली हाथ, नेता की उपयोगिता पर उठे सियासी सवाल

केंद्रीय कार्यकारिणी में उत्तराखंड के पांच चेहरों को जगह, महेंद्र भट्ट की बढ़ती संगठनात्मक पकड़ के बीच पूर्व मुख्यमंत्री निशंक की अगली भूमिका को लेकर भाजपा के भीतर तेज हुआ सियासी मंथन समर्थकों की उम्मीदें टिकी।

देहरादून। भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व में नई टीम के गठन और उत्तराखंड में संगठनात्मक समीकरणों के बीच पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री डा रमेश पोखरियाल निशंक की मौजूदा भूमिका को लेकर राजनीतिक चर्चाएं एक बार फिर तेज होती दिखाई दे रही हैं। केंद्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की नई टीम के ऐलान के बाद जहां उत्तराखंड से कई नेताओं को संगठन में स्थान मिला है, वहीं लंबे राजनीतिक अनुभव वाले डा रमेश पोखरियाल निशंक को फिलहाल कोई नई जिम्मेदारी नहीं मिलने से उनके राजनीतिक भविष्य और पार्टी में उनकी उपयोगिता को लेकर सवाल उठने लगे हैं। पार्टी के भीतर इस स्थिति को लेकर अलग-अलग तरह के राजनीतिक आकलन किए जा रहे हैं। उनके समर्थकों और प्रशंसकों के बीच भी इस बात को लेकर निराशा बताई जा रही है कि उत्तराखंड से जुड़े कई नेताओं को संगठन में नई भूमिकाएं मिलीं, लेकिन राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री को अभी तक संगठनात्मक जिम्मेदारी से दूर रखा गया है। विशेष रूप से उनकी लंबी राजनीतिक पारी, केंद्र और राज्य सरकारों में निभाई गई महत्वपूर्ण भूमिकाओं तथा संगठन के साथ उनके पुराने संबंधों को देखते हुए यह विषय भाजपा के राजनीतिक गलियारों में चर्चा का केंद्र बन गया है।

राजनीतिक परिदृश्य पर नजर डालें तो भाजपा की केंद्रीय कार्यकारिणी में उत्तराखंड से तीर्थ सिंह रावत समेत पांच नेताओं को स्थान दिया जाना राज्य संगठन के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि के तौर पर देखा जा रहा है। केंद्रीय स्तर पर प्रदेश के नेताओं की मौजूदगी बढ़ने के बीच डा रमेश पोखरियाल निशंक को किसी नई भूमिका में जगह नहीं मिलना स्वाभाविक रूप से राजनीतिक विश्लेषकों का ध्यान आकर्षित कर रहा है। नई शिक्षा नीति के सूत्रधार के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने वाले निशंक पिछले करीब चार वर्षों से पार्टी की सक्रिय जिम्मेदारियों से अपेक्षाकृत दूर नजर आ रहे हैं। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में हरिद्वार से दो बार प्रतिनिधित्व करने के बावजूद उन्हें टिकट नहीं दिया गया था, जिसके बाद उनके राजनीतिक समर्थकों के बीच असमंजस की स्थिति और गहरी हुई। इसके बाद भी संगठन की ओर से उन्हें कोई प्रमुख नई जिम्मेदारी नहीं मिली। यही कारण है कि अब केंद्रीय टीम के विस्तार के बाद यह चर्चा फिर सामने आई है कि पार्टी भविष्य में निशंक की राजनीतिक और प्रशासनिक क्षमता का किस तरह इस्तेमाल करती है। हालांकि पार्टी की ओर से उनकी भूमिका को लेकर कोई स्पष्ट असंतोष या निर्णय सार्वजनिक तौर पर सामने नहीं आया है, इसलिए मौजूदा स्थिति को लेकर राजनीतिक आकलन मुख्यतः संगठनात्मक घटनाक्रमों और संभावनाओं पर आधारित हैं।

उत्तराखंड की राजनीति में डा रमेश पोखरियाल निशंक का सफर लंबा और कई महत्वपूर्ण पड़ावों से भरा रहा है। वर्ष 1991 से सक्रिय राजनीति में रहने के दौरान उन्होंने उत्तर प्रदेश के दौर में भी मंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली और उत्तराखंड राज्य गठन के बाद प्रदेश की राजनीति में लगातार महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उत्तराखंड सरकार में मंत्री रहने के साथ-साथ वह प्रदेश के मुख्यमंत्री भी बने और बाद में केंद्र की राजनीति में पहुंचकर मानव संसाधन विकास तथा शिक्षा मंत्री जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाली। केंद्र सरकार में उनके कार्यकाल के दौरान शिक्षा क्षेत्र से जुड़े कई बड़े निर्णयों और नीतिगत पहलों के कारण उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली। विशेष रूप से नई शिक्षा नीति को लेकर उनका नाम प्रमुखता से सामने आया। यही लंबा राजनीतिक और प्रशासनिक अनुभव वर्तमान चर्चाओं का आधार भी बन रहा है। भाजपा में संगठन और सरकार दोनों स्तरों पर लंबी पारी खेलने वाले नेताओं में उनका नाम प्रमुखता से लिया जाता है। इसके बावजूद वर्ष 2022 के बाद से उनकी सक्रिय राजनीतिक भूमिका पहले की तुलना में सीमित दिखाई देने लगी है। इसी अंतर को लेकर पार्टी कार्यकर्ताओं और राजनीतिक पर्यवेक्षकों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि इतने व्यापक अनुभव वाले नेता को आगे संगठन किस भूमिका में देखता है।

केंद्रीय शिक्षा मंत्री पद से निवृत्त होकर जब डा रमेश पोखरियाल निशंक उत्तराखंड लौटे थे, तब राजनीतिक हलकों में कई तरह की संभावनाएं व्यक्त की गई थीं। उस समय यह चर्चा भी सामने आई थी कि भाजपा उनके लंबे राजनीतिक अनुभव और संगठनात्मक समझ का इस्तेमाल प्रदेश स्तर पर किसी महत्वपूर्ण भूमिका के लिए कर सकती है। कुछ राजनीतिक समीकरणों में यह संभावना भी जताई गई कि उन्हें प्रदेश भाजपा की कमान सौंपी जा सकती है। उनके समर्थकों को उम्मीद थी कि राज्य की राजनीति में उनकी वरिष्ठता और संगठनात्मक अनुभव को देखते हुए पार्टी उन्हें कोई बड़ी जिम्मेदारी देगी। लेकिन बाद में भाजपा ने प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए महेंद्र भट्ट को आगे किया और यह संभावना समाप्त हो गई। इसके बाद राज्यसभा तथा लोकसभा चुनावों में भी पार्टी की ओर से निशंक को कोई प्रमुख भूमिका नहीं मिली। विशेष रूप से 2024 के लोकसभा चुनाव में हरिद्वार से उनका टिकट कटना उनके राजनीतिक समर्थकों के लिए बड़ा घटनाक्रम माना गया। अब जब पार्टी की केंद्रीय टीम में भी नए चेहरों और विभिन्न राज्यों के नेताओं को जिम्मेदारियां दी गई हैं, तब निशंक के नाम को लेकर चर्चाओं का दोबारा तेज होना इसी घटनाक्रम की कड़ी के रूप में देखा जा रहा है।

इधर महेंद्र भट्ट का राजनीतिक सफर भी उत्तराखंड भाजपा के मौजूदा संगठनात्मक समीकरणों को समझने के लिए महत्वपूर्ण हो गया है। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष के तौर पर जिम्मेदारी संभालने के बाद उन्हें राज्यसभा भेजे जाने से पार्टी में उनकी स्थिति और मजबूत हुई। उपलब्ध राजनीतिक घटनाक्रम के अनुसार उनका प्रदेश अध्यक्ष के रूप में कार्यकाल लगातार लंबा होता गया और वह उत्तराखंड भाजपा के सबसे लंबे समय तक प्रदेश अध्यक्ष रहने वाले नेताओं में प्रमुख स्थान पर पहुंच गए हैं। प्रदेश संगठन की कमान संभालते हुए राज्यसभा सांसद की भूमिका निभाना भी उनके लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक स्थिति है। एक ओर संगठन की जिम्मेदारी और दूसरी ओर संसद में प्रतिनिधित्व, दोनों भूमिकाओं के कारण भाजपा के मौजूदा नेतृत्व ढांचे में महेंद्र भट्ट का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। इसके विपरीत डा रमेश पोखरियाल निशंक जैसे वरिष्ठ नेता का फिलहाल किसी औपचारिक संगठनात्मक दायित्व में नहीं होना राजनीतिक चर्चा का विषय बनना स्वाभाविक माना जा रहा है। यही तुलना भाजपा के भीतर वरिष्ठता, अनुभव और मौजूदा संगठनात्मक प्राथमिकताओं को लेकर अलग-अलग तरह के सवाल खड़े कर रही है। हालांकि संगठन में किसी नेता की भूमिका केवल पद से तय नहीं होती और पार्टी के भीतर वरिष्ठ नेताओं को विभिन्न स्तरों पर सलाहकार अथवा अन्य भूमिकाओं में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

भाजपा की राजनीति को करीब से देखने वाले विश्लेषकों का एक वर्ग इस स्थिति को केवल उपेक्षा के चश्मे से देखने के बजाय संगठन की रणनीति से जोड़कर देख रहा है। उनका मानना है कि डा रमेश पोखरियाल निशंक का राजनीतिक अनुभव इतना व्यापक है कि उन्हें कोई जिम्मेदारी देने से पहले पार्टी नेतृत्व कई स्तरों पर विचार कर सकता है। निशंक ने राज्य की राजनीति के साथ केंद्र की सत्ता और संगठनात्मक राजनीति को भी करीब से देखा है। मुख्यमंत्री से लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री तक की भूमिका निभाने के कारण उनके पास प्रशासनिक अनुभव के साथ राष्ट्रीय स्तर की राजनीतिक समझ भी है। ऐसे में पार्टी यदि उन्हें कोई जिम्मेदारी सौंपती है तो वह सामान्य संगठनात्मक पद के बजाय उनके अनुभव के अनुरूप किसी व्यापक दायित्व से जुड़ी हो सकती है। इसी वजह से कुछ राजनीतिक जानकार यह मानते हैं कि उन्हें जिम्मेदारी सौंपने में समय लगना जरूरी नहीं कि राजनीतिक उपेक्षा का संकेत हो। पार्टी नेतृत्व भविष्य की परिस्थितियों, संगठन की जरूरत और चुनावी रणनीति को ध्यान में रखते हुए उनके लिए उपयुक्त भूमिका तय कर सकता है। हालांकि दूसरी तरफ समर्थकों की बेचैनी भी अपनी जगह है, क्योंकि लगातार कई वर्षों तक सक्रिय राजनीतिक भूमिका निभाने वाले नेता को सार्वजनिक तौर पर किसी बड़ी जिम्मेदारी में नहीं देखने से स्वाभाविक रूप से सवाल उठते हैं।

हरिद्वार की राजनीति के संदर्भ में भी डा रमेश पोखरियाल निशंक की भूमिका को अलग करके नहीं देखा जा सकता। वह लोकसभा में हरिद्वार का दो बार प्रतिनिधित्व कर चुके हैं और इस क्षेत्र के साथ उनका राजनीतिक जुड़ाव लंबे समय से रहा है। वर्ष 2024 में टिकट नहीं मिलने के बाद उनके समर्थकों के बीच जिस तरह की चर्चाएं चलीं, उसने उनके भविष्य को लेकर अटकलों को और हवा दी। अब केंद्रीय संगठन में नई नियुक्तियों के बाद फिर यह सवाल उठ रहा है कि भाजपा उन्हें आने वाले समय में किस तरह उपयोग में लाएगी। उत्तराखंड में राजनीतिक गतिविधियां लगातार चुनावी दृष्टि से महत्वपूर्ण होती जा रही हैं और ऐसे दौर में वरिष्ठ नेताओं के अनुभव को लेकर संगठन की रणनीति पर नजर रहना स्वाभाविक है। निशंक की राजनीतिक पहचान केवल किसी एक क्षेत्र या एक पद तक सीमित नहीं रही है। मुख्यमंत्री के रूप में प्रदेश की राजनीति, केंद्रीय मंत्री के रूप में राष्ट्रीय स्तर की भूमिका और सांसद के रूप में संसदीय अनुभव, इन सभी पहलुओं को मिलाकर उनका राजनीतिक कद काफी बड़ा माना जाता है। इसलिए उनके समर्थक यह अपेक्षा कर रहे हैं कि पार्टी नेतृत्व भविष्य में उन्हें ऐसी जिम्मेदारी देगा, जहां उनके अनुभव और संपर्कों का व्यापक इस्तेमाल किया जा सके।

दूसरी ओर भाजपा के मौजूदा संगठनात्मक ढांचे में नए नेतृत्व को अवसर देने और वरिष्ठ नेताओं के अनुभव का संतुलन बनाए रखने की चुनौती भी दिखाई देती है। केंद्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की नई टीम में विभिन्न राज्यों और संगठनों से जुड़े नेताओं को स्थान दिए जाने के बाद उत्तराखंड के पांच नेताओं की मौजूदगी राज्य संगठन के लिए सकारात्मक संदेश मानी जा रही है। तीर्थ सिंह रावत सहित प्रदेश के नेताओं को केंद्रीय कार्यकारिणी में जगह मिलना यह संकेत देता है कि केंद्रीय नेतृत्व उत्तराखंड को संगठनात्मक दृष्टि से महत्व दे रहा है। ऐसे में निशंक समर्थकों का यह सवाल भी चर्चा में है कि जब प्रदेश के कई नेताओं को राष्ट्रीय संगठन में अवसर दिया जा रहा है, तब वरिष्ठतम नेताओं में शामिल निशंक के लिए क्या भूमिका तय होगी। हालांकि राजनीति में किसी नेता की तत्काल नियुक्ति न होना उसके भविष्य का अंतिम संकेत नहीं माना जा सकता। पार्टी अक्सर चुनावी जरूरतों, संगठनात्मक बदलावों और राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार वरिष्ठ नेताओं को नई जिम्मेदारियां देती रही है। इसलिए वर्तमान स्थिति को अंतिम निष्कर्ष के रूप में देखने के बजाय इसे भाजपा के भीतर चल रहे व्यापक संगठनात्मक पुनर्संतुलन के हिस्से के तौर पर भी देखा जा सकता है।

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि डा रमेश पोखरियाल निशंक को भाजपा भविष्य में किस भूमिका में देखती है और क्या उनके व्यापक राजनीतिक अनुभव को संगठन किसी बड़े दायित्व के जरिए फिर सक्रिय मंच पर लाएगा। केंद्रीय टीम के गठन, महेंद्र भट्ट के लंबे प्रदेश अध्यक्षीय कार्यकाल और राज्यसभा में उनकी निरंतर भूमिका के बीच निशंक का संगठनात्मक रूप से अपेक्षाकृत शांत रहना निश्चित तौर पर राजनीतिक विमर्श को जन्म दे रहा है। उनके समर्थक अब पार्टी नेतृत्व की अगली रणनीति पर नजर बनाए हुए हैं। वहीं राजनीतिक विश्लेषक यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या भाजपा उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर कोई जिम्मेदारी दे सकती है, प्रदेश की राजनीति में वापस ला सकती है या फिर किसी चुनावी अथवा संगठनात्मक भूमिका के लिए भविष्य में उनका उपयोग करेगी। यह भी संभव माना जा रहा है कि पार्टी उनके अनुभव और वरिष्ठता को देखते हुए सामान्य पद के बजाय ऐसी जिम्मेदारी पर विचार करे, जहां उनकी प्रशासनिक समझ, संगठनात्मक अनुभव और राष्ट्रीय पहचान का अधिक प्रभावी इस्तेमाल हो सके। फिलहाल कोई आधिकारिक निर्णय सामने नहीं होने के कारण सभी संभावनाएं खुली हुई हैं। इतना जरूर है कि नितिन नवीन की नई टीम के बाद डा रमेश पोखरियाल निशंक की भूमिका को लेकर भाजपा के भीतर और बाहर चर्चा फिर गर्म हो गई है और आने वाले समय में पार्टी का अगला कदम इस राजनीतिक पहेली का जवाब दे सकता है।

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