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युवाओं के उभरते आक्रोश से बदले राजनीतिक समीकरण सत्ता और संगठन में मची अभूतपूर्व बेचैनी

उपचुनावों के नतीजों, परीक्षा घोटालों, बेरोजगारी, युवाओं की बढ़ती नाराजगी और बदलते राजनीतिक संकेतों के बीच सत्ता, संघ, कॉर्पोरेट जगत तथा विपक्ष ने तेज की नई रणनीतिक सक्रियता और जनसंपर्क की कवायद।

नई दिल्ली(सुनील कोठारी)। देश के राजनीतिक परिदृश्य में हालिया दिनों उभरी अभूतपूर्व हलचल ने सत्ता के शीर्ष प्रतिष्ठानों को हिलाकर रख दिया है। किसी ने यह कल्पना भी नहीं की थी कि बीते बारह वर्षों के अथक प्रयासों, रणनीतिक प्रचार और विशाल मीडिया तंत्र के सहारे गढ़ी गई राजनीतिक छवि इस कदर अचानक कसौटी पर आ जाएगी। दिल्ली के सत्ता गलियारों में यह मान लिया गया था कि एक केंद्रीय चेहरे और मजबूत संगठन के बल पर जनमानस को सदा के लिए प्रभाव में रखा जा सकता है। परंतु, धरातल पर जिस तेजी से समीकरण बदले हैं, उसने केंद्र सरकार, खुफिया एजेंसियों और पारंपरिक राजनीति के धुरंधरों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। व्यवस्था को अपने हिसाब से संचालित करने वाली तांकते भी इस बात का सही अनुमान नहीं लगा सकीं कि युवाओं का आक्रोश इस कदर सतह पर आ जाएगा। देश में केवल पुरानी पीढ़ी ही नहीं, बल्कि श्जेन-जीश् और श्जेन-अल्फाश् की नई पौध पूरी चेतना के साथ उठ खड़ी हुई है। व्यवस्थागत खामियों, माफिया गठबंधन और राजनीतिक फायदे के लिए चलाए जा रहे तंत्र का पर्दाफाश अब सरेआम होने लगा है, जिससे प्रशासनिक बुनियाद हिलती दिखाई दे रही है।

युवाओं की इस मुखर आवाज और संगठित तेवरों के कारण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से लेकर कॉर्पाेरेट जगत तक में भारी छटपटाहट देखी जा रही है। संघ परिवार अपनी वैचारिक पकड़ और सामाजिक प्रभाव को बचाए रखने के लिए अचानक अत्यधिक सक्रिय हो उठा है। इसी रणनीति के तहत छह तारीख को मुंबई स्थित नीता मुकेश अंबानी कल्चरल सेंटर में श्इंडिया इंटरनेशनल मूवमेंट ऑफ यूनाइटेड नेशनश् नामक संगठन के मंच से सरसंघचालक मोहन भागवत देश के नौजवानों और 11 से 19 वर्ष तक के छात्रों को संबोधित करने जा रहे हैं। इस संगठन का निर्माण सत्ता और उद्योग जगत के करीबी ऋषभ शाह ने किया है, जिसकी सलाहकार समिति में अजय पीरामल, दीपक पारिख, नादिर गोदरेज जैसी कॉर्पाेरेट हस्तियां, कांग्रेस सांसद शशि थरूर, पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़, अभिनेत्री पीटी उषा, फिल्म निर्माता करण जौहर और पूर्व सैन्य प्रमुख शामिल हैं। लगभग दो हजार से अधिक युवाओं को एकत्रित कर राष्ट्रवाद का पाठ पढ़ाने और उनकी नाराजगी को शांत करने की यह कवायद दर्शाती है कि सत्ता पक्ष और उससे जुड़ा पूंजीपति वर्ग अपनी राजनीतिक व आर्थिक ज़मीन खिसकने के खतरे को भांप चुका है।

राजनीतिक धरातल पर हाल ही में आए उपचुनावों के परिणामों ने भारतीय जनता पार्टी की रणनीतिक तैयारियों को करारा झटका दिया है। बिहार की प्रतिष्ठित पटना बांकीपुर विधानसभा सीट, जो बीते तीन दशकों से पार्टी का मजबूत किला मानी जाती थी और जहां से अध्यक्ष नितिन नवीन जीतते आ रहे थे, वहां पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। केंद्रीय नेतृत्व द्वारा स्थानीय जनभावनाओं की अनदेखी कर नीरज कुमार सिन्हा जैसे उम्मीदवार को मैदान में उतारने का फैसला आत्मघाती साबित हुआ, जिसके चलते कायस्थ मतदाताओं सहित पारंपरिक वोट बैंक छिटक गया। प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने इस असंतोष का लाभ उठाते हुए लगभग उन्नीस हजार मतों के अंतर से ऐतिहासिक जीत दर्ज की। इसी प्रकार मध्य प्रदेश की दतिया सीट पर पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटकर आशुतोष तिवारी को प्रत्याशी बनाने के दिल्ली के फैसले ने स्थानीय कैडर को निराश किया और कांग्रेस प्रत्याशी घनश्याम सिंह ने जीत हासिल कर ली। ये नतीजे स्पष्ट करते हैं कि शीर्ष नेतृत्व का अति-आत्मविश्वास अब स्थानीय स्तर पर पराजय का कारण बन रहा है।

देशभर के शैक्षणिक परिदृश्य में प्रश्नपत्र लीक होने की सिलसिलेवार घटनाओं और भ्रष्ट प्रशासनिक तंत्र ने युवाओं के भीतर गहरे असंतोष को जन्म दिया है। नीट जैसी प्रतिष्ठित परीक्षाओं में धांधली के बाद कई होनहार अभ्यर्थियों द्वारा आत्महत्या किए जाने की घटनाओं ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया है। झारखंड जैसे राज्यों में प्रतियोगी परीक्षाएं कराने का काम ऐसी निजी कंपनियों को सौंपा जा रहा है जो पूर्व में काली सूची में डाली जा चुकी हैं, जबकि नौ लाख से अधिक शिक्षित बेरोजगार रोजगार कार्यालयों के चक्कर काट रहे हैं। सरकार द्वारा शिक्षा व्यवस्था को सुधारने के स्थान पर निजीकरण और माफिया तत्वों को संरक्षण देने के आरोपों ने छात्रों के धैर्य को तोड़ दिया है। जब श्कॉकरोच जनता पार्टीश् के संस्थापक अभिजीत दीपके जैसे युवाओं ने सत्ता पक्ष से नेताओं की शैक्षणिक योग्यता और डिग्रियों पर सवाल उठाए तथा सार्वजनिक मंचों पर अपने लोन व स्कॉलरशिप के दस्तावेज प्रस्तुत किए, तो शासन व्यवस्था की नीतियों पर उठ रहे सवाल और अधिक तीखे हो गए।

संसदीय लोकतंत्र में संवाद की कमी और जनहित के मुद्दों से दूरी ने स्थिति को और अधिक विकट बना दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा वर्षों तक की गई श्परीक्षा पर चर्चाश् और श्मन की बातश् जैसे कार्यक्रमों का प्रभाव अब फीका पड़ने लगा है, क्योंकि ज़मीनी स्तर पर बुनियादी सुविधाओं, जैसे विद्यालयों में बिजली, शौचालय और योग्य शिक्षकों की नियुक्ति का अभाव जस का तस बना हुआ है। गृह मंत्री अमित शाह और केंद्रीय नेतृत्व संसद भवन की चंद दूरी पर होने के बावजूद ज्वलंत मुद्दों पर सीधी बहस से बचते नजर आ रहे हैं। इस बीच विपक्ष के नेता श्री राहुल गांधी ने युवाओं के आक्रोश को राजनीतिक मंच देते हुए आठ तारीख को प्रयागराज (इलाहाबाद) में श्जेन-जीश् के साथ सीधा संवाद स्थापित करने का निर्णय लिया है। उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि युवाओं को सम्मानजनक रोजगार और निष्पक्ष परीक्षाएं नहीं मिलीं तो सत्ता का सिंहासन डोलना तय है।

वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल यह संकेत दे रही है कि देश की राजनीति एक नए और निर्णायक परिवर्तन की ओर बढ़ रही है। जनता के भीतर बढ़ता विरोध, युवाओं की राजनीतिक एंट्री और कॉर्पाेरेट-राजनैतिक गठजोड़ के खिलाफ उठती आवाजें यह साबित कर रही हैं कि अब केवल खोखले दावों और नारों के सहारे शासन चलाना संभव नहीं होगा। यदि सत्ता प्रतिष्ठान ने समय रहते युवाओं की मांगों, पारदर्शी परीक्षा प्रणाली और रोजगार के अवसरों पर ठोस कदम नहीं उठाए, तो आने वाले समय में जन आक्रोश की यह लहर स्थापित राजनीतिक ढांचों को पूरी तरह ध्वस्त कर सकती है।

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