काशीपुर(सुनील कोठारी)। उत्तराखंड की राजनीतिक फिजाओं में आठ अगस्त को हल्द्वानी में होने वाली कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की महारैली को लेकर सरगर्मियां बेहद तेज हो चुकी हैं। पार्टी के प्रांतीय एवं केंद्रीय दिग्गज वर्ष 2027 के भावी विधानसभा चुनाव का शंखनाद करने के उद्देश्य से राज्य के कोने-कोने में जाकर कार्यकर्ताओं में नए प्राण फूंकने का भरसक प्रयास कर रहे हैं। विधानसभा स्तर पर आयोजित की जा रही इन संवाद बैठकों के माध्यम से संगठन की एकजुटता, नीतिगत मुद्दों और सत्तारूढ़ दल के खिलाफ माहौल बनाने के दावे निरंतर किए जा रहे हैं। यद्यपि धरातल पर इस पूरी कवायद का जो स्याह पहलू उभरकर सामने आ रहा है, वह बेहद चिंताजनक और मंथन योग्य है। लोकतंत्र के इस महत्वपूर्ण दौर में जनता तक अपनी विचारधारा पहुँचाने की बेताबी तो दिखती है, किंतु संवाद के सबसे सशक्त माध्यम यानी पत्रकारिता वर्ग के प्रति पार्टी का संवेदनहीन रवैया कई गंभीर सवाल खड़े करता है।
राजनीतिक बैठकों के दौरान मीडिया कर्मियों को आमंत्रित करने का उत्साह तो दिखाया जाता है, परंतु जैसे ही समाचार संकलन की प्रक्रिया आरंभ होती है, समन्वय की धज्जियां उड़ती स्पष्ट दिखाई देती हैं। विधानसभा स्तर पर कार्यरत नगर अध्यक्ष, महानगर अध्यक्ष अथवा प्रांतीय मीडिया संयोजकों का रवैया पत्रकारों के प्रति नितांत उपेक्षात्मक और असहयोगात्मक बना हुआ है। कार्यक्रम स्थलों पर अव्यवस्था का साम्राज्य इस कदर हावी रहता है कि अपने दायित्वों का निर्वहन करने पहुंचे पत्रकारों को पग-पग पर घोर व्यावहारिक असुविधाओं का सामना करना पड़ता है। विडंबना यह है कि बड़े नेताओं को अविलंब मंच से फुर्सत दिलाने की ऐसी हड़बड़ी दिखाई जाती है मानो मीडिया को बुलाना महज एक औपचारिक मजबूरी हो। जब संवाद का द्वार खोलने के बजाय दबाव की दीवार खड़ी की जाने लगे, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि पार्टी नेतृत्व जमीनी वास्तविकताओं और पारदर्शी लोकतांत्रिक मर्यादाओं से किस कदर दूर जा चुका है।
हाल ही में काशीपुर के भीतर आयोजित कांग्रेस की समीक्षा बैठक के दौरान घटी घटना इस प्रशासनिक और वैचारिक पतन की प्रत्यक्ष बानगी है। राष्ट्रीय अध्यक्ष के आगमन की तैयारियों को लेकर पहुंचे प्रदेश स्तर के दिग्गजों से जब कवरेज के उपरांत पत्रकारों ने समसामयिक मुद्दों पर प्रतिक्रिया मांगनी चाही, तो जिम्मेदार पदों पर बैठे नेता अपनी जवाबदेही से पल्ला झाड़ते नजर आए। प्रांतीय विधानमंडल में नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य जैसे गरिमामय पद पर आसीन नेतृत्व ने राज्य सरकार के पांच वर्षों के कार्यकाल एवं जनहित के ज्वलंत प्रश्नों पर अपना स्पष्ट मंतव्य व्यक्त करने के स्थान पर गेंद पूर्व लोकसभा प्रत्याशी प्रकाश जोशी के पाले में सरकाने की कोशिश की। यह टालमटोल न केवल संगठन के भीतर व्याप्त दिशाहीनता को दर्शाती है, बल्कि प्रादेशिक स्तर के गंभीर विषयों पर नेताओं की उस अनभिज्ञता अथवा कतराने की प्रवृत्ति को उजागर करती है, जो किसी भी परिपक्व राजनीतिक दल के लिए आत्मघाती सिद्ध हो सकती है।
स्थिति तब और अधिक हास्यास्पद एवं कष्टदायक हो गई जब पत्रकारों द्वारा प्रादेशिक नेता प्रतिपक्ष से ही राज्यव्यापी सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल पूछने का आग्रह किया गया। अत्यंत अनिच्छा एवं भारी दबाव के पश्चात जब बाइट की प्रक्रिया प्रारंभ हुई, तभी कार्यक्रम में उद्घोषक की भूमिका निभा रहे कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने सीधे हस्तक्षेप करते हुए पत्रकारों को प्रश्न पूछने से रोकना शुरू कर दिया। चतुर्थ स्तंभ के प्रतिनिधियों को सार्वजनिक रूप से टोकना, सवाल दागने से मना करना और अव्यवस्था का माहौल निर्मित करना कांग्रेस की आंतरिक संवादहीनता का परिचायक है। यदि विपक्ष का शीर्ष नेतृत्व अपनी ही बैठकों में निष्पक्ष प्रश्न झेलने का साहस नहीं जुटा पा रहा है, तो वह आम जनता के बीच जाकर सशक्त संवाद स्थापित करने का दावा कैसे कर सकता है? यह घटना सिद्ध करती है कि स्थानीय स्तर पर प्रेस समन्वय प्रणाली पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है।
इस समूचे घटनाक्रम के पीछे छुपा एक मूल प्रश्न यह भी उठता है कि आखिर पत्रकारों को बुलाने के पश्चात उच्च स्तरीय नेताओं को इतनी जल्दबाजी में मुक्त कराने की बेताबी क्यों दिखाई जाती है। क्या कांग्रेस नेतृत्व को निष्पक्ष पत्रकारों के तीखे और जनसरोकारों से जुड़े चुभते सवालों का सामना करने से भय लगता है? अथवा क्या पिछले एक दशक से सत्ता से निरंतर दूर रहने के बावजूद पार्टी ने अपनी कमियों से सीख लेने के बजाय मीडिया को नियंत्रित करने का आत्मघाती रास्ता चुन लिया है? ऐसा प्रतीत होता है कि संगठन अब केवल उन्हीं गिने-चुने अथवा अनुकूल पत्रकारों के माध्यम से अपनी बात जनता तक पहुंचाना चाहता है, जो उनके लिखे पटकथा रूपी बयानों को बिना किसी प्रतिप्रश्न के ज्यों का त्यों प्रसारित कर दें। निष्पक्ष पत्रकारिता की इस तरह अनदेखी करना लोकतांत्रिक मर्यादाओं के सर्वथा विपरीत है।
वर्तमान में राज्य भर की प्रत्येक विधानसभा सीट पर कांग्रेस की संगठनात्मक स्थिति विभिन्न गुटों और आंतरिक खेमेबाजी में बुरी तरह उलझी हुई नजर आती है। वर्ष 2027 के भावी विधानसभा चुनाव को दृष्टिगत रखते हुए वरिष्ठ एवं कनिष्ठ नेता सामूहिक जनसंघर्ष की रूपरेखा तय करने के स्थान पर अपने-अपने मनपसंद और सुरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों को हथियाने की होड़ में व्यस्त हैं। इस गुटबाज़ी के कारण निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारों का लगातार अनादर किया जा रहा है, जिससे जमीनी कार्यकर्ताओं का मनोबल भी टूट रहा है। जब पार्टी के भीतर सर्वसम्मति का अभाव हो और हर कोई अपनी व्यक्तिगत महात्वाकांक्षाओं की पूर्ति में लगा हो, तब सार्वजनिक मंचों पर मीडिया के साथ किया जाने वाला असंसदीय व्यवहार संगठन की कमजोरी को सरेआम उजागर कर देता है। गुटों में बंटा संगठन कभी भी एक एकीकृत और भरोसेमंद विकल्प प्रस्तुत नहीं कर सकता।
उत्तराखंड की वर्तमान राजनीतिक पृष्ठभूमि में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार एक सुदृढ़ प्रशासनिक तंत्र और अनुशासित कैडर के साथ चुनावी समर में डटी हुई है। सत्तारूढ़ दल की आक्रामक रणनीतियों, विशाल संसाधनों और बूथ स्तरीय किलेबंदी की विशाल चुनौतियों के सम्मुख कांग्रेस की यह आंतरिक बिखराव वाली कार्यशैली अत्यंत दयनीय प्रतीत होती है। यदि कांग्रेस समझती है कि वह चौथे स्तंभ का निरंतर तिरस्कार करके, निष्पक्ष कलमकारों की आवाज दबाकर और केवल चाटुकारिता करने वाले तंत्र पर निर्भर रहकर भारतीय जनता पार्टी जैसे मजबूत प्रतिद्वंद्वी से पार पा लेगी, तो यह उसकी भारी मुगालता है। चुनाव जीतने के लिए केवल राष्ट्रीय अध्यक्षों की रैलियां आयोजित करना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि स्थानीय स्तर पर जनमाध्यमों के साथ सम्मानजनक, पारदर्शी और निरंतर संवाद स्थापित करना अनिवार्य शर्त होती है।
भारतीय लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के रूप में स्थापित पत्रकारिता वर्ग समाज और राजनीति का दर्पण होता है, जिसका अनादर करना अंततः लोकतंत्र की बुनियाद पर चोट करने के समान है। कांग्रेस को यह भलीभांति याद रखना होगा कि मीडिया का सम्मान केवल चुनाव घोषणा पत्रों या भाषणों तक सीमित रखने की वस्तु नहीं, बल्कि व्यवहारिक आचरण का हिस्सा होना चाहिए। किसी के बहकावे में आकर अथवा सांगठनिक अक्षमता के कारण संवाददाताओं का अपमान करने की यह परिपाटी पार्टी को जनमानस से और अधिक दूर धकेल देगी। यदि 2027 की चुनावी वैतरणी पार करनी है, तो कांग्रेस को अपने अहंकार, गुटबाजी और मीडिया के प्रति दुराग्रहपूर्ण दृष्टिकोण का परित्याग करना होगा। अन्यथा, दस वर्षों का सत्ता वनवास किसी नए अध्याय में बदलने के बजाय और अधिक लंबा एवं कष्टदायी साबित हो सकता है।
अतएव, कांग्रेस नेतृत्व को यह भलीभांति समझ लेना होगा कि लोकतंत्र में मीडिया की उपेक्षा और संवादहीनता का मार्ग कभी भी विजय की गारंटी नहीं बन सकता। जिन पत्रकारों की उपेक्षा और अनादर आज चुनावी बैठकों में किया जा रहा है, वही समाज और जनमानस की नब्ज को आकार देने की ताकत रखते हैं। यदि पार्टी अपने सांगठनिक अहंकार, गुटबाज़ी और पत्रकारों के प्रति इस संवेदनहीन रवैये को तुरंत दूर नहीं करती, तो सत्ता के शिखर तक पहुँचने का उसका सपना महज़ एक दिवास्वप्न बनकर रह जाएगा। 2027 के महासंग्राम से पहले अगर कांग्रेस ने अपनी इस आत्मघाती कार्यशैली में अमूलचूल सुधार नहीं किया, तो इतिहास गवाह है कि जनता और जनमाध्यमों का तिरस्कार करने वाले राजनीतिक दलों को लोकतंत्र कभी माफ नहीं करता।





